बल्ली गाँव के पास वाले जंगल में एक साधु बाबा रहते थे | बल्ली गाँव के लोग बाबा के भोजन-पानी की व्यवस्था कर दिया करते थे | बाबा की झोपड़ी जंगल में ऐसी जगह पर थी कि जो भी व्यक्ति जंगल में आता, बाबा की नजर उस पर पड़ जाती |

बाबा झोपड़ी के बाहर बैठकर हरी-ध्यान करते रहते थे | बाबा का एक आजीवन व्रत था कि वे एक दिन में सिर्फ तीन बार बात करते थे |

एक दिन दूर के किसी गाँव से एक चोर चोरी करके भागा-भागा बल्ली गाँव के पास वाले जंगल के समीप पहुँचा | चोर को लगा कि पुलिस से बचने के लिए जंगल में छुपना उचित है, इसलिए वह जंगल में घुसा ; जंगल में घुसते ही चोर की नजर बाबा पर पड़ी |

चोर, बाबा के समीप आकर बोला- मेरे पीछे पुलिस पड़ी है, मैं इस जंगल में छुपना चाहता हूँ | अगर पुलिस मुझे ढूँढ़ते हुए आएगी तो उन्हें मेरे बारे में कुछ मत बताना |

बाबा ने कहा- मैं झूठ नहीं बोलता, सदा सत्य बोलता हूँ |

चोर ने बाबा को धमकाकर कहा- अगर तूने मेरे बारे में किसी से भी सच बोला तो मैं तुझे जान से मार डालूँगा !

ऐसा कहकर, चोर जंगल के अंदर भाग गया |

कुछ देर बाद, बल्ली गाँव से दो चरवाहे आये | वे बाबा के लिए भोजन लेकर आये थे, उन्होंने बाबा को भोजन देकर कहा- नमस्ते बाबा, हम आपके लिए भोजन लेकर आये हैं | आप भोजन करिये, हम अपनी गाय-बकरी जंगल में चराकर वापस आते हैं |

बाबा उनसे बोलना चाहते थे कि जंगल में चोर झुपा है इसलिए संभलकर जाना, पर जैसे ही बाबा यह बोलने वाले थे, बाबा को चोर की जान से मारने की धमकी याद आ गयी और बाबा डर गए ; लेकिन बाबा ने झूठ भी नहीं बोला, बाबा ने कहा- ठीक है, संभलकर आराम से जाना, जंगल में कई तरह के खतरे छुपे रहते हैं |

बल्ली गाँव के लोग अक्सर जंगल में गाय-बकरी चराने आते थे, कभी कोई अप्रिय घटना नहीं घटी, इसलिए उन दोनों चरवाहो ने भी बाबा की नसीहत को हल्के में लिया और जंगल में अपनी गाय-बकरियों के साथ आगे बढ़ गए |

थोड़ी देर बाद, पुलिस चोर को ढूँढते हुए बल्ली गाँव के पास वाले जंगल में पहुँची | जंगल में घुसते ही पुलिस ने बाबा को देखा और बाबा के समीप आकर पूछा- क्या यहाँ कोई चोर पुलिस से बचकर भागा है? किस दिशा में भागा है?

बाबा सदा सत्य बोलते थे, लेकिन चोर की धमकी से भी डरे हुए थे, इसलिए बाबा ने कहा- जाने वाला चला गया, अंदर जाकर किस दिशा में गया इसका मुझे अंदाजा नहीं है | यह मेरे आज के दिन की आखिरी बात थी |

पुलिस जंगल में चोर को ढूँढने लगी | पुलिस ने देखा कि दो चरवाहे गाय-बकरियों के साथ हैं, पुलिस को उनमे से एक चरवाहे पर शक हुआ और वे उसे पकड़कर ले गए |

वह चरवाहा बहुत बोलता रहा कि वह चोर नहीं है, लेकिन पुलिस ने उसे नहीं छोड़ा | उसकी बेगुनाही के विषय में बाबा ही बता सकते थे, जो कि उस दिन नहीं बोल सकते थे |

अगली सुबह, पुलिस ने चरवाहे के बारे में बाबा से पूछा- क्या यह व्यक्ति ही भागा हुआ चोर है?

बाबा ने कहा- नहीं, यह तो बल्ली गाँव का रहने वाला एक चरवाहा है |

पुलिस ने बाबा को फटकारा- तो फिर तुमने स्पष्ट रूप से यह क्यों नहीं कहा था कि जंगल में दो चरवाहे और एक चोर है | अब तक तो वह चोर न जाने कहाँ भाग गया होगा !

बाबा ने सत्यवादी बनते हुए कहा- मैंने जो भी कहा, सच ही कहा |

इस बात पर चरवाहे ने लताड़ा- बाबा, आपने हमें क्यों नहीं बताया कि जंगल में एक चोर छुपा हुआ है, कम से कम हम तो इस बात से सचेत रहते |

बाबा ने सफाई दी- मैंने तुम्हें भी खतरों से सतर्क रहने के लिए आगाह किया था | आज की मेरी तीन बातें समाप्त हो गयी हैं |

पुलिस ने बाबा को डाँट लगायी- ऐसे अधूरे सत्य बोलने का क्या फायदा, जिससे सामने वाले को सिर्फ और सिर्फ गलतफहमी ही हो | इससे तुम पर कोई कैसे भरोसा करेगा ! तुम्हारे इस सदा सत्यवादी बने रहने वाले व्रत का कोई औचित्य नहीं, जब तुम्हारे सत्य वचनों में स्पष्टता नहीं है |

बाबा का सिर शर्म से नीचे झुक गया, पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी |

प्रिय दोस्तों, जो भी कहो, जितना भी कहो, हमेशा स्पष्ट रूप से अपनी बात कहो | अस्पष्ट बोला हुआ सत्य सिर्फ गलतफहमी पैदा करता है, जिससे कई नुकसान हो सकते हैं और आप दूसरों का भरोसा खो सकते हो | अतः सदैव स्पष्ट रूप से अपनी बात कहो | धन्यवाद|




एक बार एक प्रसिद्ध मूर्तिकार राजा अकबर से मिलने आया | मूर्तिकार ने राजा को तीन मूर्तियाँ देकर कहा- महाराज, ये तीन मूर्तियाँ मेरी बनाई सभी मूर्तियों में सर्वश्रेष्ठ हैं | आप इन्हें स्वीकार करें और सँभाल कर रखें |

राजा अकबर, साहित्य और कलाप्रेमी थे | उन्हें मूर्तिकार की बनाई मूर्तियाँ बेहद पसंद आयी, उन्होंने तीनों मूर्तियों को स्वीकार किया और मूर्तिकार को सौ सोने की मुहरें देकर विदा किया |

राजा अकबर ने तीनों मूर्तियों की देखभाल और सफाई के लिए एक कर्मचारी लगा दिया, जो हर रोज़ तीनों मूर्तियों पर लगी धूल साफ करता था |

एक दिन सफाई करते हुए, कर्मचारी से एक मूर्ति जमीन पर गिरकर टूट गयी |

जब यह बात राजा को पता चली, तो कर्मचारी को बंदी बना लिया गया | क्योंकि मूर्ति राजा को अत्यंत प्रिय थी, इसलिए कर्मचारी की इस गलती के लिए उसके दोनों हाथ काटने की सजा सुनाई गयी |

हाथ कटने से पहले कर्मचारी ने राजा से विनती करी कि वह आखिरी बार बाकी बची दोनों मूर्तियों को अपने हाथों से छूना चाहता है |

कर्मचारी की विनती स्वीकार कर ली गयी | कर्मचारी जैसे ही मूर्तियों के समीप आया, उसने बाकी बची दोनों मूर्तियों को जमीन पर पटककर तोड़ दिया |

राजा को यह देखकर बहुत ज्यादा गुस्सा आया, उन्होंने कर्मचारी के इस कृत्य के लिए उसे म्रत्युदंड की सजा सुनाई |

राजा अकबर के ख़ास मन्त्री बीरबल को जब यह पूरा वाकया पता चला, तो वे तुरंत कर्मचारी के पास आये और उससे पूछा- तुमने जानबूझकर बाकी बची दो मूर्तियाँ क्यों तोड़ी ?

कर्मचारी ने शालीनतापूर्वक जवाब दिया- हे अमात्य ! मूर्तियाँ चीनी मिट्टी की बनी हुई थी, आज नहीं तो कल, किसी न किसी के हाथ से बाकी बची दो मूर्तियों ने भी अवश्य टूटना था | भविष्य में अनजाने से मूर्ति टूटने पर किसी अन्य व्यक्ति को सजा न मिले, इसलिए मैंने बाकी बची दोनों मूर्तियों को स्वयं तोड़कर सारा दोष अपने ऊपर ले लिया |

बीरबल, कर्मचारी की भावनायें समझ गए थे कि उसने जानबूझकर मूर्ति नहीं तोड़ी थी | बीरबल ने कर्मचारी को बचाने के लिए एक युक्ति निकाली, वे एक बड़े से पात्र में चीनी मिट्टी लेकर राजा के समीप आकर बोले- महाराज, यह चीनी मिट्टी बहुत कीमती है, इसे मैंने बड़े जतन से हासिल किया है, कृपया आप इसे स्वीकार करें |

राजा अकबर ने मजाकिया लहजे में कहा- बीरबल, इस चीनी मिट्टी में ऐसा क्या ख़ास है, जो यह कीमती हो गयी ?

बीरबल ने जवाब दिया- महाराज, इसमें ऐसा तो कुछ भी ख़ास नहीं है, बस मुझे लगता है कि यह चीनी मिट्टी कीमती है |

राजा ने डाँटकर कहा- बीरबल, तुम ऐसी बेवकूफों जैसी हरकत कैसे कर सकते हो ! चीनी मिट्टी से ज्यादा कीमती, चीनी मिट्टी से बने बर्तन और मूर्तियाँ होती हैं |

बीरबल ने समझाते हुए कहा- महाराज, मैं भी तो आपको यही समझाना चाहता हूँ कि जिस प्रकार चीनी मिट्टी से अधिक मूल्यवान चीनी मिट्टी से बनी मूर्तियाँ हैं, उसी प्रकार कर्मचारी के किये कार्यों से अधिक महत्वपूर्ण उन कार्यों के पीछे की मंशा है | पहली बार कर्मचारी से मूर्ति अनजाने में टूट गयी थी, लेकिन दूसरी बार कर्मचारी ने बाकी बची दो मूर्तियाँ इसलिए तोड़ी क्योंकि उसके ह्रदय में जनहितैषी की भावना थी ; भविष्य में चीनी मिट्टी की नाजुक मूर्तियाँ टूटने पर कोई अन्य दंड का भागी न बनें इसलिए उसने स्वयं ही मूर्तियाँ तोड़ दी | ऐसे व्यक्ति को दंड देने का क्या अर्थ जो दूसरों की भलाई के विषय में सोचता है !

राजा अकबर को अपनी भूल का एहसास हुआ, उन्होंने दूसरों की भलाई के विषय में सोचने वाले उस कर्मचारी को तुरंत बंधन मुक्त कर दिया, साथ ही साथ बीरबल के तार्किक सुझाव के लिए बीरबल का धन्यवाद दिया |

प्रिय दोस्तों, जो व्यक्ति दूसरों की भलाई के विषय में सोचकर कार्य करते हैं, उनके कष्ट दूर करने के लिए भगवान कोई न कोई मदद अवश्य भेजते हैं | अतः दूसरों की भलाई के लिए कर्म करने से पीछे न हटें | धन्यवाद|




किसी गाँव में एक किसान रहता था, वह रोज सुबह गाँव के कुँए से पीने का पानी लेने जाता | कुँए पर पहुँचकर, दो बाल्टी पानी भरता और उन्हें एक डंडे में बाँधकर अपने कंधे पर लटकाते हुए घर वापस आता |

उन दो बाल्टी में से एक बाल्टी फूटी हुई थी, घर पहुँचते-पहुँचते फूटी हुई बाल्टी का पानी आधा ही रह जाता, जिस वजह से किसान को दो बार पानी लेने जाना पड़ता |

रास्ते में जो कोई भी किसान को फूटी हुई बाल्टी में पानी ले जाते हुए देखता, वो नसीहत देता कि फूटी हुई बाल्टी का छेद बंद कर दो या दूसरी नई बाल्टी ले आओ | लेकिन किसान हर बार यह कहकर बात टाल देता कि उसने छेद बंद करने की बहुत कोशिश की, पर नाकाम रहा और नई बाल्टी लाकर क्या करना जब इस बाल्टी से काम चल रहा है |

धीरे-धीरे, लोग किसान की फूटी हुई बाल्टी को देखकर मजाक बनाने लगे, लेकिन किसान ने उनकी बातों पर जरा भी ध्यान नहीं दिया |

एक सुबह, किसान की पत्नी ने देखा कि गाँव के लोग किसान की फूटी बाल्टी का मजाक बना रहे हैं, इसलिए किसान के घर आने पर उसने परेशान होकर समझाया- आप फूटी बाल्टी का प्रयोग मत किया करो, लोग आपकी मजाक बनाते हैं ; फिर आपको पानी लेने दो चक्कर भी तो जाना पड़ता है, फालतू की मेहनत करना और लोगों की मजाक बनना कोई अच्छी बात तो नहीं है !

अपनी पत्नी की परेशानी देख, किसान ने बताया- मैं तो जानबूझकर फूटी हुई बाल्टी का प्रयोग करता हूँ |

पत्नी ने असमंजस होकर पूछा- भला ऐसा क्यों ?

किसान ने समझाया- क्या तुमने ध्यान दिया ! हमारे घर के रास्ते में जितने भी फूल खिले हुए हैं, वे सब फूटी बाल्टी की बदौलत ही हैं | मुझे पता है कि बाल्टी फूटी हुई है, मैं बाल्टी में आयी इस कमी को जानता हूँ, लेकिन मैंने कमी पर ध्यान देने के बजाय इसका लाभ उठाया | मैंने रास्ते के दोनों तरफ रंग-बिरंगे फूलों के बीज बो दिए थे ; पहली बार पानी लाते समय, मैं बाल्टी को बायें कंधे पर रखता हूँ और दूसरी बार पानी लाते समय दायीं तरफ रखता हूँ, इससे फूटी बाल्टी से रिसते हुए पानी ने उन फूलों को सींचा और रास्ते को इतने खूबसूरत फूलों से सजा दिया | तुम्हीं बताओ, अगर मैं भी लोगों की तरह फूटी हुई बाल्टी को बेकाम का मानकर फेंक देता, तो क्या रास्ते में सुंदर-सुंदर फूल खिल पाते ? हालाँकि मेहनत थोड़ी ज्यादा लगी, पर मेहनत का सुंदर फल भी तो मिला और फूटी बाल्टी का सही सदुपयोग भी हुआ है |

किसान की बात सुनकर, उसकी पत्नी की शंका-परेशानी दूर हो गयी और उसने किसान की मेहनत के लिए आभार व्यक्त किया |

प्रिय दोस्तों, हम सभी के अंदर कोई न कोई कमी अवश्य होती है, कमियों से निराश होने के बजाय यदि कमियों को पहचानकर स्वयं के हुनर का सही सदुपयोग किया जाए तो हम अपनी कमियों पर विजय हासिल कर सफलता अर्जित करेंगे | धन्यवाद|





यह कहानी सत्य घटना पर आधारित है | मुंबई शहर में सुरेन्द्र नाम का एक व्यक्ति रहता था, जो टैक्सी चलाता था |

सुरेन्द्र की मासिक आय ज्यादा नहीं थी, जिस वजह से स्वयं, पत्नी, तीन बच्चों और बूढ़ी माँ सहित छः आदमियों के परिवार का गुजर-बसर करना आसान काम नहीं था | 

आर्थिक स्थिति ठीक न होने की वजह से सुरेन्द्र बड़ा परेशान रहता था, वह ज्यादा से ज्यादा रुपये कमाना चाहता था, लेकिन कितनी भी मेहनत कर ले, दस-बारह हज़ार से ज्यादा की आमदनी नहीं हो पाती थी |

एक शाम सुरेन्द्र अपने घर जा रहा था, उस दिन उसकी कोई ख़ास कमाई नहीं हुई थी, इसलिए वह थोड़ा उदास था; तभी उसने देखा, सड़क किनारे खड़ा एक जेंटलमैन टैक्सी के लिए पुकार रहा था |

सुरेन्द्र ने जेंटलमैन के सामने टैक्सी लगाकर पूछा- नमस्ते सर, कहाँ जाना है आपको? मेरी टैक्सी में बैठिये, मैं आपको वहाँ छोड़ दूँगा |

जेंटलमैन, सुरेन्द्र की टैक्सी में बैठा और पता बताकर, चलने को कहा |

सुरेन्द्र, बातूनी, मिलनसार और सज्जन व्यक्ति था | सुरेन्द्र और जेंटलमैन बातें करते हुए आगे बढ़ रहे थे |

बातों ही बातों में जेंटलमैन ने सुरेन्द्र के व्यवहार, परिवार और आय के विषय में पता कर लिया था, फिर प्रस्ताव देते हुए पूछा- अगर तुम दस हजार रुपये प्रतिदिन कमाओ तो कैसा रहेगा? मेरे साथ काम करोगे तो आराम से दस-पन्द्रह हज़ार रुपये प्रतिदिन कमा सकते हो |

सुरेन्द्र ने जेंटलमैन से उत्साहपूर्वक पूछा- ऐसा कौन सा काम है, जो एक दिन में दस-पंद्रह हज़ार रुपये कमा कर दे?

जेंटलमैन ने सुरेन्द्र को एक सफ़ेद थैली दिखाकर कहा- मेरा एक आदमी रोज तुम्हें इस तरह की सफ़ेद थैलियों से भरा बैग देगा, अगर तुम बैग को सही-सलामत पहुँचाते हो तो तुम्हें हाथों-हाथ पाँच हज़ार रुपये दिए जायेंगे | इस तरह तुम जितनी बार बैग को सही पते पर पहुँचाओगे, तुम्हें उतनी बार पाँच हज़ार रुपये दिए जायेंगे |

सुरेन्द्र ने मन ही मन सोचा- अगर एक दिन में तीन बैग भी सही पते पर पहुँचाऊंगा, तो एक दिन में पंद्रह हज़ार रुपये कमा सकता हूँ |

यह सोचकर, सुरेन्द्र ने आव देखा ना ताव, बिना कुछ सवाल-जवाब किए सीधे सहमति जाहिर कर दी |

सुरेन्द्र की सहमति पर जेंटलमैन ने बताया- तुम्हें बैग कहाँ से मिलेगा और कहाँ देना है, इस बात की जानकारी तुम्हें तुम्हारे मोबाइल नंबर पर मिल जाएगी | पर ध्यान रहे, जब भी तुम बैग छोड़ने जाओगे तब अपनी टैक्सी में सवारी बिठाने की भूल मत करना !

सुरेन्द्र ने हाँ में हाँ मिलायी | इस तरह सीधा-साधा सुरेन्द्र, रुपये कमाने के लालच में सफ़ेद थैलियों से भरे बैग को दिए गए पते पर पहुँचाने का काम करने लगा; वह इस बात से अनजान था कि वे सफ़ेद थैलियाँ कुछ और नहीं, एक प्रतिबंधित ड्रग्स की थी |

सुरेन्द्र प्रतिदिन दस से पंद्रह हज़ार रुपये तक कमाने लगा, उसका रुपये कमाने का लालच और बढ़ने लगा | सुरेन्द्र रुपये कमाने के लालच में अँधा था, वह भूल गया कि जेंटलमैन ने उसे बैग छोड़ते समय किसी सवारी को टैक्सी में बिठाने से मना किया था, सो एक दिन जब वह थैलियों से भरा बैग छोड़ने जा रहा था तो रास्ते में उसने एक व्यक्ति को अपनी टैक्सी में बिठा दिया |

सुरेन्द्र के बातूनी और मिलनसार व्यवहार की वजह से उस व्यक्ति ने बातों ही बातों में अगली सीट पर रखे बैग के बारे में पूछ दिया | सुरेन्द्र ने भोलेपन से कहा- यूँ ही किसी का कुछ सामान छोड़ने जा रहा हूँ |

वह व्यक्ति नारकोटिक्स विभाग में ड्रग इंस्पेक्टर था, जो शहर में ड्रग्स गिरोह को पकड़ने के लिए सामान्य इंसान के वेश में गस्त लगा रहा था | इंस्पेक्टर को सुरेन्द्र पर शक हुआ, तो उसने अपने साथियों को बुलाकर सुरेन्द्र की छानबीन करी और सुरेन्द्र पकड़ा गया |

जब सुरेन्द्र पकड़ा गया, तो वह गिड़गिड़ाने लगा कि वह बेक़सूर है, उसे जेंटलमैन और उसके गिरोह की कोई जानकारी नहीं थी, क्योंकि रुपये कमाने के लालच में उसने कुछ नहीं पूछा था |

इंस्पेक्टर इस बात को समझ गया था कि ड्रग्स गिरोह ने सीधे-साधे सुरेन्द्र को रुपये कमाने का लालच देकर अपने झांसे में फंसाया है | फिर इंस्पेक्टर ने सुरेन्द्र को सफ़ेद थैलियों के बारे में बताया और उसी जगह जाने दिया जहाँ वह बैग छोड़ने जा रहा था, इस तरह इंस्पेक्टर ने सुरेन्द्र के साथ मिलकर ड्रग्स गिरोह को रंगे हाथ पकड़ा |

हालांकि ड्रग इंस्पेक्टर की नेकी और इंसानों को समझने की वजह से सुरेन्द्र को माफ़ कर दिया गया, लेकिन उस दिन के बाद सुरेन्द्र कभी भी दुबारा रुपये कमाने के लालच में नहीं पड़ा |

प्रिय दोस्तों, रुपये कमाने की इच्छा हम सभी की होती है, लेकिन धन-दौलत कमाने का शॉर्टकट रास्ता हमेशा बेईमानी और गलत कामों का होता है | धन-दौलत कमाने के लालच में बिना सोचे-समझे कार्य कभी न करें | धन्यवाद|





एक जंगल में जामुन का पेड़ था; उसके बगल में साल का हज़ार वर्ष पुराना पेड़ था, जो बहुत घना और विशाल था |

साल के पेड़ को स्वयं की आयु, स्वास्थ्य और मजबूती पर बड़ा अभिमान था; वह अपने पड़ोसी जामुन के पेड़ से सीधे मुँह बात तक नहीं करता था |

एक बार, लाल चींटियों का सरदार, घोंसला बनाने के लिए उचित जगह की तलाश करते हुए साल के पेड़ के पास आकर विनम्र भाव से पूछने लगा- हे महान साल वृक्ष ! आपकी शाखाएं बहुत विशाल हैं, आपका तना बहुत मजबूत है, क्या मैं आपके पेड़ के नीचे अपना घोंसला बना सकता हूँ? आपके पेड़ की छाया में मेरा और मेरे दोस्तों का परिवार सुरक्षित रहेगा |

साल का पेड़ रौब दिखाते हुए बोला- ऐसा सोचना भी मत ! यहाँ से चले जाओ, अपना घोंसला कहीं और बनाओ |

बगल में खड़े जामुन के पेड़ ने साल के पेड़ से निवेदन किया- साल भाई, बना लेने दो इसे अपना घोंसला | तुम्हारे पेड़ की छाया में इसका परिवार धूप-बारिश, आँधी-तूफ़ान से बचा रहेगा |

साल का पेड़, जामुन के पेड़ पर बिगड़ते हुए बोला- तुम बीच में क्यों बोल रहे हो? अगर तुम्हें इस पर इतनी ही दया आ रही है, तो तुम अपने नीचे इसे जगह दे दो |

जामुन का पेड़ इस बात से सहमत हो गया और लाल चींटियों के सरदार ने जामुन के पेड़ का धन्यवाद करते हुए उसके नीचे अपना घोंसला बना दिया |

कुछ दिन बाद, वहाँ चार लकड़हारे आये और आपस में बातचीत करने लगे |

उनमें से एक बोला- इस जामुन के पेड़ को काट देते हैं |

तभी, दूसरे व्यक्ति ने सचेत किया- रुको ! जामुन के पेड़ के नीचे लाल चींटियाँ हैं, लाल चींटियाँ बहुत खतरनाक डंक मारती हैं, इसलिए इसे संभलकर काटना होगा |

इस बात पर, तीसरे व्यक्ति ने सुझाव दिया- क्यों ना हम जामुन के पेड़ के बजाय इसके बगल वाले साल के पेड़ को काटते हैं | साल का पेड़ बहुत विशाल है, इसका तना बहुत मजबूत है, हमें ढेर सारी इमारती लकड़ी मिल जायेगी, जिससे हमें बहुत मुनाफा होगा | जामुन का पेड़ काटकर इतना फायदा नहीं होगा, हम साल के पेड़ को काटते हैं, यह ज्यादा बेहतर रहेगा |

तीसरे व्यक्ति के सुझाव से चारों सहमत हो गए |

वे लोग जैसे ही साल के पेड़ को काटने लगे, साल का पेड़ जोर-जोर से बचाने की गुहार लगाने लगा |

तब लाल चींटियों ने लकड़हारों पर हमला कर, उन्हें वहाँ से भागने को मजबूर कर दिया |

जान बचने के बाद, जब साल के पेड़ ने लाल चींटियों का धन्यवाद करना चाहा, तो लाल चींटियों के सरदार ने कहा- धन्यवाद हमारा नहीं, धन्यवाद तो जामुन के पेड़ का करो | अगर यह हमें आपकी रक्षा करने को नहीं कहते, तो हम कभी आपकी रक्षा नहीं करते |

साल के पेड़ का सारा अभिमान चूर-चूर हो गया था, उसने जामुन के पेड़ से अतीत में किये अपने अभिमानपूर्ण बुरे बर्ताव के लिए क्षमा माँगी |

जामुन के पेड़ ने विनम्र भाव से बड़प्पन दिखाते हुए उसे माफ़ कर दिया |

प्रिय दोस्तों, कभी-कभी हमारी लोकप्रियता और बड़े होने का अहसास हमें घमंडी और क्रूर बना देता है, जिससे हम अपने प्रिय लोगों से दूर हो जाते हैं | सदैव अभिमान से बचना चाहिए | धन्यवाद|




  
प्रसिद्ध बहुशास्त्र ज्ञानी लियोनार्डो डा विन्ची को अपना कामकाज देखने के लिए एक युवक की जरुरत थी, इस विषय में उन्होंने अपने कुछ मित्रों से कहा |

कुछ दिन बाद, एक मित्र ने दो युवकों को लियोनार्डो के पास भेजा | पहला युवक बहुत पढ़ा-लिखा था, उसके पास कई उच्च स्तरीय सर्टिफिकेट और डिग्रियाँ थी जबकि दूसरा युवक सामान्य पढ़ा-लिखा था |

जब दोनों युवक लियोनार्डो से मिले, तो कई सारी डिग्रियाँ होने के बावजूद लियोनार्डो ने पहले युवक को नौकरी पर नहीं रखा, बल्कि दूसरा युवक जिसके पास कोई ख़ास बड़ी डिग्री नहीं थी, उसे नौकरी पर रख लिया |

जब लियोनार्डो के मित्र को यह बात पता चली, तो उसने लियोनार्डो से पूछा- क्या मैं जान सकता हूँ कि तुमने एक सामान्य डिग्रीधारी युवक को नौकरी पर क्यों रखा जबकि मैंने एक उच्च स्तरीय डिग्रीधारी युवक को भी तुम्हारे पास भेजा था ?

लियोनार्डो ने बताया- मित्र, जिस युवक का मैंने चयन किया है, उसके पास पहले डिग्रीधारी युवक से ज्यादा बड़ी डिग्रियाँ हैं |

मित्र ने असमंजस भाव से पूछा- लेकिन मैंने तो उसके पास सामान्य डिग्रियाँ ही देखी थी !

लियोनार्डो ने समझाया- मित्र, चयनित युवक ने मेरे कमरे में आने से पूर्व मुझसे अनुमति मांगी | अंदर आने के बाद, वह तब तक शांति से खड़ा रहा जब तक कि मैंने उसे बैठने को नहीं कहा | मैंने उससे जो भी सवाल पूछे उसने बिना घुमाए-फिराए उनके संक्षिप्त जवाब दिए और बातचीत खत्म होने के बाद, मेरी इजाजत लेकर नम्रतापूर्वक चला गया | उसने कोई खुशामद नहीं करी, न ही किसी की सिफारिश लेकर आया था, ज्यादा पढ़ा-लिखा न होने के बावजूद उसे स्वयं की योग्यता और ईमानदारी पर पूर्ण विश्वास था, ऐसी कीमती डिग्रियाँ बहुत कम लोगों के पास होती हैं | उधर पहले युवक के पास इनमें से कोई भी विशेषता नहीं थी, वह सीधा कमरे में चला आया, बिना आज्ञा कुर्सी पर बैठ गया और अपनी योग्यता के विषय में बात करने के बजाय तुमसे अपनी जान-पहचान के बारे में बताने लगा, अब तुम ही बताओ कि उसकी उच्च डिग्रियों की क्या कीमत है ?

मित्र के पास कोई जवाब नहीं था, उसे लियोनार्डो की बात अच्छे से समझ आ गयी थी |

प्रिय दोस्तों, अच्छा व्यवहार और आचरण से सम्पन्न व्यक्ति सबसे बड़ा डिग्रीधारी होता है, क्योंकि अच्छा आचरण और मेहनती बनना किसी उच्च डिग्री हासिल करने से कम नहीं है | धन्यवाद|



   
चीन के पश्चिमी जंगलों में जंगली मुर्गे-मुर्गियों का एक झुण्ड रहता था, उनमें से एक मुर्गा हमेशा अपनी सुंदरता की वजह से उदास रहता था | वह मुर्गा जब दूसरे पंछियों को देखता, उसे अपने मटमैले-काले रंग पर बहुत शर्म महसूस होती |

उसी जंगल में सुनहरे तीतरों का एक झुण्ड भी रहता था | जब वह मुर्गा, सुनहरे तीतरों के झुण्ड को देखता तो वह उनके आकर्षक और खूबसूरत सुनहरे रंग को देखकर बेहद प्रभावित हो जाता, फिर मन ही मन सोचने लगता- हे भगवान, तुमने इन्हें इतना सुंदर रंग-रूप दिया है | काश ! तू मुझे भी ऐसा ही सुंदर रंग-रूप देता तो कितना अच्छा होता |

एक दिन उस मुर्गे ने जंगल में बहुत से सुनहरे पंख बिखरे हुए देखे, जो सुनहरे तीतरों के खेलने-कूदने की वजह से गिर गए थे |

यह देखकर वह मुर्गा बेहद खुश हो गया और मन ही मन सोचने लगा- इन सुंदर सुनहरे पंखों को लगाकर मैं भी सुंदर रंग-रूप का मालिक बन जाऊँगा |

यह ख्याल मन में आते ही उसने सुनहरे तीतरों के बिखरे पंख उठाये और उन्हें अपनी पूँछ के आस-पास सजा दिया | इसके बाद मुर्गा इतराते हुए जंगल में घूमने लगा |

जंगल में जो भी पंछी उसे देखता, वह मन ही मन उस पर खूब हँसता |

उस मुर्गे को उसके झुण्ड और परिवार के अन्य मुर्गे-मुर्गियों ने बहुत समझाया कि सुंदर दिखने का ऐसा झूठा नाटक करना छोड़ दे और अपने वास्तविक रंग-रूप से ही प्यार करे |

परन्तु उस मुर्गे पर उनकी बातों का कोई असर नहीं हुआ, उसे लगा कि वे सब उसका सुंदर रंग-रूप देखकर ईर्ष्या कर रहे हैं, इसलिए फालतू की नसीहत दे रहे हैं |

कुछ देर बाद, वह मुर्गा जंगल में घूमते-घूमते सुनहरे तीतरों के झुण्ड के पास पहुँचा और मन ही मन सोचने लगा कि सुनहरे तीतर उसके सुंदर रंग-रूप की तारीफें करेंगे |

पर उसे देखते ही सुनहरे तीतरों ने जोर का ठहाका लगाया |

एक सुनहरे तीतर ने उपहास उड़ाते हुए कहा- देखो इस बेवकूफ मुर्गे को ! यह हमारे गिरे हुए पंखों को लगाकर हमारी नक़ल कर रहा है | आओ, इस नकलची मुर्गे को अपनी चोंचों और पंजों से सबक सिखाते हैं |

यह सुनते ही सभी तीतर मुर्गे पर टूट पड़े और मार-मारकर उसे अधमरा कर दिया |

मुर्गा भागा-भागा अपने झुण्ड के पास पहुँचा और सुनहरे तीतरों की शिकायत करने लगा- बचाओ, सुनहरे तीतरों ने बेवजह मुझ पर हमला कर दिया है |

इस बात पर एक बुजुर्ग मुर्गे ने समझाया- बेटा, गलती उनकी नहीं, गलती तुम्हारी है | हमने तुम्हें पहले ही समझाया था कि दिखावटी रंग-रूप के चक्कर में मत पड़ो, तुम जैसे हो उसी में सुंदर दिखते हो, लेकिन तुम नहीं माने | तुमने सुनहरे तीतरों के पंख लगाकर उनकी नक़ल उतारने के साथ स्वयं के रंग-रूप का भी अपमान किया है | जो जीव दूसरी प्रजाति के जीवों के रंग-रूप की नक़ल करने में लगा रहता है, वह सिर्फ अपमान ही पाता है |

उस अधमरे मुर्गे को अपनी गलती का अहसास हो चुका था, उसने उसी समय से बाहरी दिखावटी रंग-रूप की सुंदरता का मोह त्याग दिया |

प्रिय दोस्तों, ईश्वर ने हमें जिस रंग-रूप में बनाया है, उसी में संतुष्ट रहकर अपने कर्मों पर ध्यान देना चाहिए ; कर्मों की सुंदरता, रंग-रूप की सुंदरता से अधिक श्रेष्ठ होती है | धन्यवाद |





रमेश एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता था, अभी हाल ही में रमेश का तबादला लखनऊ से दिल्ली हो गया था, वह अपने परिवार सहित दिल्ली के एक मोहल्ले में किराये के मकान में शिफ्ट हो गया |

दिल्ली में शिफ्ट होने की अगली सुबह रमेश और उसके परिवार के सदस्यों ने देखा कि बगल पड़ोसी शर्मा जी के यहाँ से जोर-जोर से चिल्लाने और लड़ने-झगड़ने की आवाजें आ रही थी |

किसी अनहोनी की आशंका से रमेश ने बाहर आकर एक अन्य पड़ोसी गुप्ता जी से लड़ाई-झगड़े का कारण पूछा, तो गुप्ता जी ने अनजान भाव से कहा- रमेश जी, ये रोज की कहानी है, इस ओर ध्यान मत दीजिए |

उस सुबह तो रमेश ने सामान्य पारिवारिक तनाव समझकर अपने कानों में परदा डाल दिया, लेकिन जब अगले दो दिन तक शर्मा जी के घर से सुबह-शाम लड़ने-झगड़ने और जोर-जोर से चिल्लाने की आवाजें आती रही, तो रमेश को यह सब देख-सुनकर अच्छा नहीं लगता था |

रमेश का पारिवारिक माहौल शांत और आनंदमय था, लेकिन पड़ोस में होने वाला सुबह-शाम का लड़ाई-झगड़ा भी तो सुना नहीं जाता था |

पड़ोस का अशांत माहौल, रमेश के दोनों बेटों के लिए भी एकदम नया था ; इसलिए तीसरे दिन जब रमेश ऑफिस से घर आया तो उसके छोटे बेटे ने पूछा- पापा, हमारे पड़ोसी इतना लड़ते-झगड़ते क्यों हैं ?

बड़े बेटे ने समझदारी दिखाते हुए कहा- क्योंकि क्रोध में इंसान मानसिक शांति खो देता है, इसलिए ये लोग लड़ते-झगड़ते-चिल्लाते हैं |

छोटे बेटे ने तपाक से पूछा- जब ये लोग एक ही घर में रहते हैं, फिर ये अपनी बातें धीमी आवाज में भी कर सकते हैं, इन्हें इतना चिल्लाने की क्या जरुरत है ?

इस सवाल पर रमेश ने दोनों बेटों को पास बुलाकर समझाया- जब दो व्यक्ति एक-दूसरे से नाराज होते हैं, तो वे एक-दूसरे पर गुस्सा करते हैं जिससे उनके दिलों के बीच दूरी बढ़ने लगती है, इस अवस्था में एक-दूसरे को बिना चिल्लाये नहीं सुना जा सकता है ; वे जितना ज्यादा गुस्सा करेंगे उनके दिलों के बीच की दूरी उतनी ज्यादा बढ़ जाएगी और उन्हें उतना ही ज्यादा चिल्लाना पड़ेगा, गुस्सा करने पर वे एक-दूसरे की भावनाओं को नहीं समझ पाते हैं और फिर एक-दूसरे से लड़ते-झगड़ते हैं | लेकिन यदि वे गुस्सा नहीं करते, एक-दूसरे के साथ प्रेम से रहते हैं, तब उन्हें एक-दूसरे पर चिल्लाना नहीं पड़ता, बल्कि वे आपस में धीरे-धीरे बातें करते हैं, क्योंकि उनके दिल एक-दूसरे के करीब होते हैं, वे एक–दूसरे की भावनाओं को समझते हैं और लड़ते-झगड़ते नहीं हैं | और जब वे एक-दूसरे से बेहद प्रेम करते हैं, तब वे बोलते भी नहीं हैं, बिना कहे नजरों ही नजरों में एक-दूसरे की भावनायें समझ जाते हैं | इसलिए अपने परिवार वालों और मित्रों के साथ हमेशा इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि तुम्हारे दिल हमेशा एक-दूसरे के करीब बने रहें ; ऐसा व्यवहार और कर्म मत करो जिससे तुम्हारे दिलों की बीच की दूरी बढ़ जाए, नहीं तो एक समय ऐसा आता है जब दिलों के बीच की दूरी इतनी अधिक बढ़ जाती है कि चिल्लाने पर भी दूसरे को तुम्हारी बातें और भावनायें समझ नहीं आती |

इस तरह रमेश ने अपने दोनों बेटों को जीवन की नेक सीख के साथ हमेशा प्रेम से रहने का संदेश दिया | कुछ दिन बाद, रमेश अपने परिवार सहित शहर की किसी दूसरी शांत जगह में शिफ्ट हो गया |

प्रिय दोस्तों, हमेशा ऐसे व्यवहार और कर्मों से बचना चाहिए जिससे एक-दूसरे के प्रति नाराजगी और क्रोध पैदा हो जाए, क्योंकि क्रोध रिश्तों में दरार पैदा करता है ; क्रोध जितना बढ़ता रहेगा, रिश्तों की दरार खाई में बदलती रहेगी | धन्यवाद|




एक व्यक्ति बहुत धनवान था ; धन-दौलत, शान-शौकत सब कुछ था, पर उस व्यक्ति के पास समय की बहुत कमी थी, उससे मिलने के लिए भी समयादेश लेना पड़ता था, यहाँ तक कि उसके पास अपने घर वालों के साथ उठने-बैठने का भी पर्याप्त समय नहीं था |

एक दिन अकस्मात उसकी मृत्यु हो गयी, पति की मृत्यु पर उसकी पत्नी बहुत दुखी थी | उसकी मृत्यु को महीने गुजर गए लेकिन उसकी पत्नी का दुःख बिल्कुल भी कम नहीं हुआ | अमूमन, अथाह सुख-सुविधाओं के बीच इंसान अपना दुःख भूल जाता है लेकिन उसकी पत्नी के साथ ऐसा नहीं हुआ |

एक दिन उसकी सहेली ने उसे सहारा देते हुए कहा- होनी को कौन टाल सकता है, अब अपना और अपने बेटे के भविष्य के विषय में सोचो | हम सब तुम्हारे साथ हैं, बस तुम इस दुःख से निकलकर नए जीवन की शुरुआत करो |

उसने कहा- मैं अपने पति की मृत्यु पर इतनी दुखी नहीं हूँ, मृत्यु तो एक दिन प्रत्येक इंसान को आती है |

सहेली ने चौंककर पूछा- तो फिर किस बात से दुखी हो ?

उसने बताया- उनकी मृत्यु के बाद एक सवाल मेरे मन में आया, जो मुझे दुखी कर रहा है, जिसका जवाब किसी के पास नहीं है |

सहेली ने हौसला देते हुए पूछा- मुझे बताओ क्या बात है ? दुःख बाँटने से कम होता है |

उसने कहा- जिस दिन मेरी शादी हुई, मैं बहुत खुश थी कि अपने पति के साथ ख़ुशी-ख़ुशी नई जिंदगी की शुरुआत करूँगी, उस समय हम इतने अमीर नहीं थे लेकिन मुझे इस बात से कोई समस्या नहीं थी, जितना भी था मैं उसी में खुश रहने के ख्वाब देखती थी | शादी के अगले दिन ही यह ख्वाब कहीं खो गया | सुबह सात बजे वो ऑफिस चले जाते थे, रात को ग्यारह बजे आते थे, हर दिन की यही दिनचर्या थी, उन पर धन-दौलत कमाने का भूत सवार था | मैंने बहुत समझाया, पर वह नहीं माने ; धन-दौलत के अमीर बन गए, लेकिन समय के गरीब हो गए | मुश्किल से वह रोज मेरे साथ सिर्फ आधा या एक घंटा ही ढंग से बातें कर पाते थे, प्रतिदिन लगभग एक घंटा के हिसाब से साल में 365 घंटे हुए | मेरी शादी को 24 साल हो गए, अगर हिसाब लगाया जाए तो उन्होंने सिर्फ मेरे साथ एक साल का ही समय व्यतीत किया | उस एक साल में मैं उनसे पूरी बातें भी नहीं कर पायी, मुझे उनसे जो बातें करनी थी वो आज मेरे दिमाग में घूमती रहती हैं | उनकी कमाई हुई धन-दौलत तो यहीं रह गयी, पर वो चले गए | छोटी-छोटी खुशियाँ जो हमें साथ बितानी चाहिए थी, जो मेरे जीवन का ख्वाब था, वो ख्वाब सिर्फ ख्वाब ही रह गया | दुनिया की नजर में मेरा वैवाहिक जीवन 24 साल का था, पर वास्तव में वह सिर्फ एक साल का ही था | उस एक साल के वैवाहिक जीवन की अधूरी बातें अब कभी पूरी नहीं हो सकती, दुःख सिर्फ इतना है | क्या धन-दौलत इसकी भरपाई कर सकता है ? सवाल बस इतना ही है !

यह सुनकर सहेली की आँखों से आंसू निकल आये, क्योंकि उसके पास भी इस सवाल का जवाब नहीं था |

प्रिय दोस्तों, धन-दौलत और भौतिक साधन कमाने के चक्कर में अपने परिवार की छोटी-छोटी खुशियों को नजरअंदाज मत कीजिये, क्योंकि आपके जाने के बाद धन-दौलत की कमी तो पूरी हो सकती है लेकिन आपकी कमी कभी पूरी नहीं हो सकती | धन्यवाद|


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