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बात बहुत समय पहले की है, राजा निकोटस अपने पड़ोसी राज्यों की सुख-सम्पदा और बढ़ता वैभव देख थोड़ा परेशान से थे| उस दिन अपने बगीचे में सैर करके उन्होंने गौर किया कि फूल रोज की भांति नहीं खिले हुए हैं|

राजा निकोटस इन सबकी वजह जानने को बड़े व्याकुल हुये, उन्होंने सभी फूलों से उनकी उदासी का कारण जानने हेतु एक-एक कर प्रश्न पूछने शुरू किये| सबसे पहले चमेली के फूल ने कहा, वह बहुत कमजोर है क्योंकि उसके पास तो गुड़हल के फूल जितनी बड़ी-बड़ी पंखुड़ियाँ नहीं हैं| राजा ने गुड़हल की ओर देखा तो वह भी गर्दन झुकाए हुए था, उसने कहा, वह इन पंखुड़ियों से बड़ा परेशान है, ये पंखुड़ियाँ बिखरी-बिखरी सी हैं, इन्हें संभालना बहुत मुश्किल है, उसकी पंखुड़ियाँ गेंदे के जैसी घनी नहीं हैं| गेंदा भी उदास सा था कि उसकी पंखुड़ियाँ बहुत छोटी हैं और उसका तना भी गुलाब जितना मजबूत नहीं है| गुलाब अपने तने पर लगे काँटों से परेशान था| इस तरह सभी फूल किसी ना किसी बात से दुखी थे|

तभी राजा की नजर पास के ही एक तालाब पर पड़ी, उस तालाब में एक सुन्दर कमल का फूल नजर आया, जो निश्चिंत था, एकदम ताजा और खिला-खिला सा था|

राजा ने बड़े ही आश्चर्य से उससे पूछा, यह तो बड़ी ही अजीब बात है ! मैं पूरे बाग़ में घूम चुका हूँ लेकिन एक से बढ़कर एक सुन्दर फूल दुखी और उदास हैं, तुम तो चारों ओर से पानी से घिरे हुए हो, क्या तुम्हे कोई कष्ट नहीं है? तुम इतने प्रसन्न नजर आ रहे हो ..आखिर इसका कारण क्या है?

कमल के पुष्प ने कहा, महाराज, बाकी फूल अपनी-अपनी विशेषता को देखने के बजाय स्वयं की दूसरों से तुलना करके दुखी हैं, जबकि मैं यह मानता हूँ कि जब मैंने इस बगीचे में जन्म लिया है तो मैं अपने गुणों से इस बगीचे को सुन्दर बनाने में अपनी तरफ से पूरा प्रयास करूँ| इसलिए मैं किसी और से अपनी तुलना करने के बजाय अपनी क्षमता के अनुसार श्रेष्ठतम बनने का प्रयास करता हूँ और प्रसन्न रहता हूँ|

कमल के पुष्प की यह बात सुनकर अन्य फूलों को अपनी कमी का एहसास हुआ, उन्होंने भी उसी समय से अपनी-अपनी महत्ता समझकर अपने गुणों को निखारने का फैसला किया|

राजा निकोटस को भी यह बात सुनकर बड़ी प्रसन्नता हुयी और उन्होंने भी अब अपनी ऊर्जा और समय को अन्य राज्यों से तुलना करने में व्यतीत करने के बजाय अपने राज्य के विकास के हित में कार्य करने में व्यतीत करने का फैसला किया|


प्रिय दोस्तों, अक्सर हम अपनी तुलना दूसरों से कर उदास और दुखी हो जाते हैं, जिससे हमारी कार्यक्षमता पर बड़ा नकारात्मक असर पड़ता है| हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हर इंसान में अपनी-अपनी काबिलियत होती है| हमें अपने गुणों को अच्छे से समझकर उनमें निखार करते रहना चाहिए, ना कि दूसरों से तुलना कर अपने अन्दर के गुणों की महत्ता को कम आँककर उनको नजरअंदाज करना चाहिए| तुलना करना गलत नहीं है यदि वह सकारात्मक तुलना है, जो कि हम अपनी कमियों को सुधारने के लिए करते हैं| दूसरों को हराने और नीचा दिखाने की तुलना सदैव हमारे अन्दर ईर्ष्या, असुरक्षा और निराशा के भाव उत्पन्न करती है जो कि हमारी सफलता में बाधक हैं| बदलतीसोच (badaltisoch.com) दूसरों से तुलना करने के बजाय अपने अंदरूनी गुणों को पहचानकर उनको सदैव निखारते रहने का ही सन्देश देती है| धन्यवाद|




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सिंहगढ़ और मानपुर दो पड़ोसी राज्य थे| सिंहगढ़ नाम के अनुरूप मानपुर से अधिक शक्तिशाली था| एक बार दोनों राज्यों में सीमा विवाद बढ़ गया, जब बात आपसी सहमति से नहीं बनी तो नौबत युद्ध तक पहुँच गयी| दोनों राज्यों ने युद्ध करने का निश्चय किया|

पहले के समय में राजा-महाराजा युद्ध में जाने से पहले अपने राज्य के ज्योतिषगुरु से अपने भविष्य-फल को जानते थे, तो सिंहगढ़ और मानपुर के राजा भी अपने-अपने राज्यों के ज्योतिष गुरुओं के पास गये| सिंहगढ़ के ज्योतिष गुरु ने कहा, महाराज ! आपकी जीत निश्चित है ऐसा आपका भाग्यफल है| यह सुनकर सिंहगढ़ का राजा बहुत अधिक प्रसन्न हुआ| वहीँ मानपुर के ज्योतिष गुरु ने कहा, राजन ! आपकी हार के आसार नजर आ रहे हैं, आपके ग्रहों की दशा ठीक नहीं लग रही है, आप अपने और अपनी प्रजा के बचाव के लिए समुचित साधन जुटा लें| हो सके तो आप स्वयं ही हार मान लें, इससे युद्ध-हानि भी नहीं होगी|

शांति वार्ता विफल होने और युद्ध तय होने के बाद युद्ध से पहले ही हार मानना एक बहुत ही बड़ा अपमान समझा जाता था| मानपुर के राजा ने ज्योतिष गुरु की इस भविष्यवाणी पर गंभीर रूप से विचार करते हुए अपनी सेना को फिर से संगठित किया, दिन-रात मानपुर में युद्ध अभ्यास होने लगा| मानपुर के युवा राजा के आह्वान पर बढ़-चढ़कर कर सेना में सम्मलित हुए और युद्ध से पहले ही दिन-रात के कठोर युद्ध अभ्यास से मानपुर की सेना ने अपनी सैन्य कमजोरियों की बारीकियों को समझ कर उनमें सुधार किया|

उधर सिंहगढ़ में युद्ध से पहले ही अपनी निश्चित विजय की कल्पना में जश्न का माहौल तैयार हो गया, रात भर नाच-गाना और जलसे होने लगे| सब को लगने लगा कि उनकी जीत तो निश्चित है| सिंहगढ़ की बलशाली सेना भी अपने राजा के साथ इन सब का आनंद लेने लगी|

तय दिन में युद्ध का बिगुल बजा, भयंकर और भीषण युद्ध होने लगा| कमजोर दिखने वाली मानपुर की सेना ने अदम्य साहस का परिचय दिया| मानसिक रूप से अपनी जीत मान चुकी सिंहगढ़ की सेना का मनोबल युद्ध-भूमि में मानपुर की सेना के युद्ध कौशल के सामने घुटने टेक चुका था| सिंहगढ़ के राजा ने अपनी पराजय स्वीकार कर ली|

युद्ध में पराजय पाकर सिंहगढ़ का राजा क्रोधित होकर अपने राज्य के ज्योतिष गुरु के पास पहुंचा और कहा, गुरुजी ! आपने तो कहा था कि मेरी जीत निश्चित है, फिर मैं पराजित कैसे हुआ?

ज्योतिष गुरु ने कहा, महाराज ! आपके भाग्य में जीत निश्चित थी लेकिन युद्ध की परिस्थितियों में आपने जश्न का माहौल कर दिया तो आपका भाग्य भी सो गया, वहीँ मानपुर के राजा ने भाग्य का साथ ना होते हुए भी कठोर मेहनत करी| उनकी कठोर मेहनत देख कर भाग्य को ना चाहते हुए भी उनका साथ देना पड़ा| उन्होंने ना केवल युद्ध में विजय हासिल करी बल्कि नियति पर भी विजय प्राप्त कर सोये हुए भाग्य को जगाया है| भाग्य भी मेहनती का ही साथ देता है यदि आप थोड़ी सी भी मेहनत करते तो पराजय का मुँह ना देखना पड़ता|

ज्योतिष गुरु की बात सुनकर सिंहगढ़ के राजा को अपनी भूल का एहसास हुआ, उन्होंने अपने किये पर माफ़ी मांगी और भविष्य में कभी भी भाग्य के भरोसे ना बैठने का निश्चय किया|

प्रिय दोस्तों, भविष्य फल के द्वारा अपना भाग्य जानने की रूचि हम सब को होती है पर केवल भाग्य के भरोसे बैठने मात्र से ही जीवन में कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता| भाग्य केवल रास्ता दिखाता है, उन रास्तों पर चलने से ही मंजिल मिलेगी| आप अपनी तकदीर में लिखी कहानी को अपने हिसाब से बदल सकते हो| बदलतीसोच (badaltisoch.com) भाग्य के सहारे ना बैठकर कुछ कर गुजरने की ही सलाह देना चाहेगा| धन्यवाद|




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यह कहानी सत्य घटना है| मोनू एक सम्पन्न परिवार से था, माता-पिता की इकलौती संतान होने के कारण उसे बड़े ही लाड-प्यार से पाला गया था| छोटी-छोटी गलतियों को नजरअंदाज करने से धीरे-धीरे उसे गलतियाँ करने की आदत पड़ गई और बुरी संगत में पड़ के वह बिगड़ गया| कॉलेज पूरा करने के बाद, हाथ में डिग्री होते हुए भी दिन भर दोस्तों के साथ आवारागर्दी करना ही उसका काम था|

जब माता-पिता को एहसास हुआ तब तक काफी देर हो चुकी थी, अब उसे किस तरह से जिम्मेदार और सही दिशा में लाया जाये माता-पिता हर रोज इसी चिंता में डूबे रहते थे|

एक दिन जब मोनू की किसी जिद को माता-पिता ने पूरा नहीं किया तो मोनू अगले दिन सुबह ही अपने दोस्तों के साथ चले गया| उसने अपने पिताजी को एक मैसेज किया, जब तक उसकी बात नहीं मानी जायेगी तब तक वह घर नहीं आयेगा| माता-पिता दोनों ही इस मैसेज से बड़े ही चिंतित और परेशान थे|

शाम को मोनू अपने दोस्तों के साथ पार्क में बैठ कर सिगरेट का नशा कर रहा था, तभी एक छोटे से बच्चे ने उनके पास आकर कहा, भैया ! मेरे पिताजी की तबियत खराब है, कुछ रुपये दे दो|

मोनू और उसके बिगड़े दोस्त उस बच्चे को देख हँसने लगे, उनमें से एक लड़के ने मजाक बनाते हुए कहा, क्या हो गया तेरे पिता को? कहाँ है तेरा पिता?, चल दिखा हमें, हम भी तो देखें|

वह मासूम सा बच्चा उन सबको पार्क के बाहर ले जाता है जहाँ सड़क के किनारे पर बहुत ही दुबली-पतली काया वाला एक मजदूर बड़ी मेहनत से पत्थर तोड़ रहा था| बच्चे ने उदास होकर अपने पिता की तरफ इशारा करके कहा, वो मेरे पिताजी हैं, उनको पिछले दस दिनों से बुखार है| डॉक्टर ने जो दवाइयाँ लिखी हैं वो बहुत ही महँगी हैं, उनकी महँगी दवाइयों के लिए मैं लोगों से रूपया माँग रहा हूँ, अगर आप कुछ मदद कर सकते हो तो आपका मुझ पर बहुत एहसान होगा|

उसकी बातें सुनकर मोनू ने बड़े ही गंभीर स्वर में कहा, क्या तुझे लगता है, मांगे हुए थोड़े रुपयों से तेरे पिता का इलाज अच्छे तरीके से हो पायेगा?

वो बच्चा बड़े ही शांत भाव से कहता है, मेरा काम अपने पिताजी की सेवा करना है, वो मेहनत-मजदूरी करके हमारा घर चला रहे हैं, उनकी इतनी आमदनी नहीं है कि वह अपनी महँगी दवाइयाँ ला सकें| मेरे से जितना हो सकेगा मैं उतनी कोशिश करूँगा|

यह सुनकर मोनू की आँख में आंसू आ गये, उसने अपनी जेब के सारे रुपये दे दिए और मन ही मन सोचने लगा, इस गरीब बच्चे को अपने पिता की कितनी चिंता है जिन्होंने शायद ही कभी इसकी कोई इच्छा पूरी करी हो, फिर भी यह अपने पिता की सेवा को तत्पर है, इसके माता-पिता को अपने बच्चे पर बड़ा गर्व होगा| और एक मैं हूँ जिसे बचपन से लेकर आज तक किसी चीज कि कोई भी कमी उसके माता-पिता ने नहीं होने दी, तब भी वह हमेशा अपने माता-पिता से जिद करता रहता है, कभी उसने अपने माता-पिता के सुख-दुःख के बारे में नहीं सोचा, क्या पता उन्हें भी उसकी जरुरत हो, यह सोच उसे आज अपने ऊपर बड़ी ग्लानी हुई| उसने उसी समय से गन्दी आदतें और बुरी संगत छोड़ने का फैसला किया और अपने दोस्तों को भी अच्छे रास्तों पर चलने को कहा|

घर आकर मोनू ने अपने माता-पिता से अपनी गन्दी आदतों और व्यवहार के लिए माफ़ी मांगी| उस दिन से मोनू के जीवन में बड़ा ही सकारात्मक परिवर्तन आ गया| आवारा घूमने वाला मोनू आज एक कंपनी में चीफ मैनेजर के पद पर कार्यरत है| आज भी जब मोनू उस नन्हे बच्चे को याद करता है तो उसके लिए दुआएं करता है जिसने उसके जीवन को एक नयी और सकारात्मक दिशा दी| आज मोनू के माता-पिता भी उस पर गर्व करते हैं|


प्रिय दोस्तों, अक्सर कई बार हम अपनी छोटी-छोटी मांगो की वजह से अपने माता-पिता से शिकायतें पाल लेते हैं, पर दोस्तों हमारे माता-पिता अपने सामर्थ्य से कई गुना अधिक हमारा ध्यान रखते हैं| वो हमारी खुशियों के लिए अपनी खुशियों का त्याग कर देते हैं| वो खुद कष्ट में रहेंगे पर हमें कष्ट नहीं होने देंगे, फिर अगर हम उनके कष्टों को नहीं समझेंगे तो कौन समझेगा? हमारे लिए उन्होंने कष्ट खाये हैं तो हमें भी तो कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे उन्हें हम पर गर्व हो| बदलतीसोच (badaltisoch.com) की यही पुकार चलो कुछ ऐसा करें कि हमारे माता-पिता के अनकहे कष्टों के बदले हम उन्हें हमारे ऊपर गर्व करने का मौका दे सकें| धन्यवाद|




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एक बार की बात है, नरेन्द्रपुर गाँव में भयंकर सूखा पड़ गया| त्राहि-त्राहि मच गयी, गाँव के सभी कुएँ, तालाब और पानी के स्रोत सूख गये| इंसान और जानवर पानी के लिए तड़पने लगे| सबकी उम्मीद आसमान की तरफ थी कि बारिश होगी और सूखा खत्म हो जायेगा, पर धीरे-धीरे उम्मीदें टूटने लग गयी| बचा हुआ पानी भी खत्म होने लग गया था| इंसान का जीवन पानी के बिना अकल्पनीय है, दैनिक जीवन के सभी कार्य पानी पर निर्भर हैं| इस घोर विकट स्थिति में सब लोगों ने गाँव छोड़ने का निश्चय किया, अपने-अपने सगे-सम्बन्धियों और पशुओं के साथ सब अपनी-अपनी समझ से किसी उपयुक्त स्थान की ओर चल पड़े|

उसी गाँव में एक आचार्य अपने तीन बेटों के साथ रहते थे, जब उन्हें भी लगा कि अब यहाँ रहकर बारिश की उम्मीद करना उचित नही है तो उन्होंने भी अपने तीन बेटों के साथ सबसे अंत में गाँव छोड़ने का फैसला किया| दूर-दूर तक कोई जानवर तक नही दिखाई दे रहा था, आस-पास के गाँव भी सारे खाली हो गये थे|

कई मील पैदल चलने के बाद वे एक गाँव के समीप पहुंचे ही थे कि उनका सबसे छोटा बेटा प्यास से बेहाल होकर और चलने में असमर्थता दिखाते हुये वहीँ पर बेहोश हो गया| आचार्य ने अपने पहले बेटे को तुरंत पानी की व्यवस्था करने को कहा| थोड़ी देर चलने के बाद पहले बेटे ने देखा कि गाँव के बाहर एक नदी बह रही है जहाँ बहुत सारे लोग कपड़े धो रहे थे, कुछ लोग नहा रहे थे, और कुछ लोग अपने पशुओं को साफ़ कर रहे थे तो नदी का पानी काफी गन्दा सा दिख रहा था| उसको लगा कि ऐसा गन्दा पानी ले जाना ठीक नही है और पानी के लिए वह गाँव की तरफ चल पड़ा|

काफी देर तक जब वह नहीं आया तो आचार्य ने बेहोश पड़े बेटे को देखकर दूसरे बेटे को पानी लेने भेजा, कुछ ही देर बाद दूसरा बेटा पानी ले आया| आचार्य ने उस बेहोश पड़े बेटे पर पानी छिड़का, उसके होश में आने के बाद उसे पानी पिलाया गया, खुद भी पिया और इस प्रकार उस बेहोश बेटे की जान पे जान आयी| तभी पहले वाला बेटा पानी लेकर दौड़ता हुआ आया|

आचार्य ने पहले बेटे से पूछा, तुम्हें पानी लाने में इतनी देर क्यों हो गयी? पहले बेटे ने जवाब दिया, पिताजी! नदी का पानी गन्दा था तब इस वजह से मैं पानी लेने गाँव की ओर चल पड़ा| तब आचार्य ने आश्चर्य में दूसरे बेटे से पूछा, वह फिर इतनी जल्दी पानी लेकर कैसे आ गया? दूसरे बेटे ने कहा, पिताजी! पहले मैंने भी यही सोचा था कि पानी तो बहुत गन्दा है फिर तुरंत ही मैंने सोचा कि क्यों ना ऊपर की तरफ चला जाये और जब मैं नदी के ऊपर की तरफ चलता गया तो मैंने देखा कि ऊपर से तो पानी साफ़ ही आ रहा था, जहाँ से गाँव के अन्य लोग भी पानी भर रहे थे| मैं भी जल्दी से वहीं से पानी लेकर आ गया|

आचार्य ने यह सुनते ही तीनों बेटों को समझाते हुए कहा, विपरीत परिस्थितियों में हम जैसा फैसला लेते हैं वही हमारे भविष्य का निर्धारण करता है| विपरीत परिस्थितियाँ इंसान के तन और मन दोनों को हिला देती हैं लेकिन अपनी समझदारी और कौशल से हम इन मुश्किल परिस्थितियों पर विजय पा सकते हैं| बस हमे अपने दिमाग को शांत रखना होगा और सबसे सुगम उपाय ढूँढ इन हालातों से निकलने की तरकीब सोचनी चाहिए| यदि जीवन में एक मुश्किल आती है तो उसके ढेर सारे उपाय भी होते हैं, यह तो आप पर निर्भर करता है कि आप कौन सा वाला उपाय चुनकर इन कठोर हालातों से पार पा सकते हो|


प्रिय दोस्तों, मुश्किल वक़्त कभी भी बोल कर नहीं आता, जीवन की इन मुश्किल घड़ियों में हम जैसा फैसला लेते हैं वही हमारे आगे के जीवन की दिशा निर्धारित करता है| तभी तो आपने देखा होगा कि एक ही जैसी परिस्थितियों में कुछ लोग टूट कर बिखर जाते हैं और कुछ इतिहास ही बना देते हैं| यदि आप भी किसी मुश्किल वक़्त से गुजर रहे हो तो एक बार ठन्डे दिमाग से सोचो, उस परेशानी का समाधान भी जरुर आस-पास ही होगा| बदलतीसोच (badaltisoch.com) इस कहानी के माध्यम से यह बताना चाहती है कि आप भी अपने मुश्किल वक़्त में सही फैसले लें, ताकि आप हर मुश्किल हालातों का डट कर सामना करके उन पर विजय हासिल कर सकें| धन्यवाद|




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आज की भागमभाग जीवनशैली एवं भौतिक सुख-साधनों को जुटाने में माता-पिता दोनों ही इतने व्यस्त हो गये हैं कि उन्हें यह भी ध्यान नहीं रहता कि हमें अपने बच्चों को भी समय देना है, उनकी समस्यायें सुननी है, समझनी है और निदान भी करना है|

आज बच्चों और अभिभावकों के बीच बढ़ती संवादहीनता ही बच्चों में कई प्रकार की बुराइयाँ ला रही है| होता यह है कि माता-पिता दोनों ही नौकरी पेशा होने के कारण थक कर घर आते हैं और बच्चों के जिज्ञासा से भरे प्रश्नों का जवाब संतोषजनक देने के बजाय उन्हें चुप करा देते हैं|  जिससे बच्चा अपने जिज्ञासा भरे प्रश्नों को अपने सहपाठियों से पूछता है चूँकि दूसरा बच्चा भी उसी की हमउम्र होता है इसलिए वह भी अपनी उम्र के हिसाब से बतायेगा| इस प्रकार बच्चों पर सहपाठियों का प्रभाव जल्दी पड़ता है और इसी वजह से जल्दी ही दोस्तों के प्रभाव में आकर उचित-अनुचित के अभाव में बुरी आदतों के शिकार होने की सम्भावना अत्यधिक बड़ जाती है| जिससे कि नशा और धूम्रपान जैसी बुरी आदतें बच्चों में स्कूल समय से ही पनपने लगी हैं|

एक तो एकल परिवार ऊपर से माता-पिता दोनों का घर से बाहर रहना, बच्चा सदैव घर आकर अपनी माँ को देखना, उससे बातें करना ज्यादा पसंद करता है| परन्तु आजकल की भौतिक सुख साधनों से परिपूर्ण संपन्न जीवनशैली के निर्वाह के लिए पति-पत्नी दोनों का रोजगार करना भी आवश्यक हो गया है, पर जो माँ गृहणी हैं उन्हें भी ध्यान रखना होगा कि बच्चे को घर में अकेला ना छोड़ा जाये| अपने बाजार के कार्य और अन्य घरेलू कार्यों का इस प्रकार निपटारा किया जाये कि घर मे बच्चों की परवरिश पर ध्यान दिया जा सके| बच्चा घर में अकेला रहने पर बुरी आदतों की गिरफ्त में जल्दी आता है क्योंकि उसे पता है कि घर में उसे देखने वाला कोई नहीं है|

घर में माता-पिता को बच्चे से धैर्य-पूर्वक व्यवहार करना होगा, उसकी बातचीत का दायरा बढ़ाकर उसकी समस्यायें सुननी होंगी और उनका समाधान निकालना होगा ताकि बच्चा अपने को उपेक्षित व असुरक्षित ना महसूस करे|

ध्यान रहे ! माता-पिता का साथ बच्चे को सदैव सुरक्षा की भावना प्रदान करता है, उसके आत्मविश्वास को बढ़ाता है और उसे अच्छा करने के लिए प्रेरित करता है| आप बच्चे को महंगी चीजें मत दीजिये, केवल उसका साथ दीजिये, उससे बात कीजिये, उसके लिए एक अच्छे माता-पिता बनिए| बच्चे से दिखावा मत कीजिये, उसे सरल और सहज इंसान बनने दीजिये यही सबसे बड़ी जमा पूंजी है|

ऊँचा पद, ऊँची सोसाइटी, ऊँचा रहन-सहन, समाज में ऊँचा स्थान पाने की होड़ में अपने बच्चों के मन में अपने लिए जगह कम ना होने दें| आखिर हम इतनी भागमभाग क्यों कर रहे हैं? जरा सोचो? जिन बच्चों के लिए कर रहे हैं वह भी तो खुश रहें, तभी तो वह जीवन में आगे बढ़ पायेंगे| आप बच्चे को समय दीजिये फिर देखिये वह एक दिन बहुत बड़ा आदमी ना सही, एक अच्छा इंसान जरुर बनेगा|


प्रिय दोस्तों, माता-पिता होने के नाते अपने बच्चों से मधुर सम्बन्ध बनायें और माता-पिता आपस में भी संबंधों में मधुरता बनाये रखें| बच्चों की दुनिया माता-पिता से शुरू होती है| उसके अन्दर सकारात्मक उर्जा का संचार होने दें, फिर देखिये उसे सरल और सफल बनने से कोई नहीं रोक सकता| बदलतीसोच (badaltisoch.com) सभी माता-पिता और उनके बच्चों के उज्जवल भविष्य की कामना करता है| धन्यवाद|




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गोपाल एक अच्छे घर का लड़का था| उसके माता-पिता ने कभी उसके लिए किसी चीज की कोई कमी ना रखी थी| उसके अन्दर वैसे तो कोई कमी ना थी पर उसका व्यवहार बहुत ही गुस्सैल था, छोटी-छोटी बात पर अपना आपा खो देता था| उसकी इन्हीं आदतों की वजह से कई बार उसकी दूसरों से लडाईयाँ हो जाती और वह उन्हें भला-बुरा कह देता|

आस पड़ोस और स्कूल से कई बार शिकायतें आने के कारण परेशान होकर उसके पिता ने एक दिन उसे अपने पास बुलाया और प्यार से कहा, “ बेटा, अब जब भी तुम्हें गुस्सा आये तो तुम गुस्सा करने के बाद आस-पास मौजूद पेड़-पौधों से एक पत्ती तोड़ देना और पत्ती तोड़ते समय मेरी बात ध्यान करना कि आखिर गुस्से का कारण क्या था?| ध्यान रहे, यह काम पूरी ईमानदारी से करना, मैं रोज शाम को तुमसे पूछूँगा कि तुमने कितनी बार गुस्सा किया? फिर तुम मुझे उतनी ही पत्ती देना| “ गोपाल अपने पिताजी की इस बात पर सहमत हो गया|

पहले दिन गोपाल को तीस बार गुस्सा आया तो उसने शाम को पिताजी के पूछने पर तीस पत्तियाँ पिताजी को दे दी| उसके पिताजी ने एक शब्द कुछ ना कहा और चुपचाप पत्तियां पकड़ ली| धीरे-धीरे पत्तियों की संख्या घटने लगी| पहले वह गुस्सा करता तो अपनी ही धुन में बिना सोचे समझे रहता था, अब जब वह गुस्सा करता तो पत्तियाँ तोड़ते समय वह अपने पिताजी के बारे में जरुर सोचा करता था| बार-बार पिताजी की बात को याद करके उसे अपने व्यवहार की कमी और गुस्से के कारण के बारे में सोचने का समय मिल जाता| धीरे-धीरे उसका अपने गुस्से पर काबू बढ़ने लगा, और फिर एक दिन ऐसा आया जब उसने शाम को पिताजी को एक भी पत्ती नहीं दी|

कई हफ़्तों तक जब उसने शाम को पिताजी को एक भी पत्ती ना दी तो एक बार फिर उसके पिताजी ने उसे अपने पास बुलाया और कहा, “ बेटा, जाओ इन पत्तियों को फिर से उन्ही पेड़ों पर लगा दो|”

अपने पिताजी की इस बात को सुनकर गोपाल ने बड़े ही आश्चर्य से पिताजी की तरफ देखकर कहा, “ पिताजी यह कैसे संभव है, यह तो अब निर्जीव हो चुकी हैं और मुझे याद भी नही है कि कौन सी पत्ती किस पेड़-पौधे से तोड़ी है|

यह सुनते ही, गोपाल के पिताजी ने उसे समझाते हुए कहा, “ बेटा, जिस प्रकार यह पत्तियां अब दोबारा उन पेड़ों पर नहीं लग सकती और निर्जीव हो गई हैं, उसी प्रकार जिन लोगों पर तुमने बेवजह गुस्सा किया, उनके और तुम्हारे संबंधों पर भी कहीं ना कहीं कोई आघात जरुर लगा होगा, जिसने क्या पता उनसे तुम्हारे सम्बन्ध निर्जीव कर दिए हों| तुम्हें याद नही होगा कि तुमने किसके साथ कब?कैसा? बुरा व्यवहार किया पर जिसके साथ तुमने बुरा व्यवहार किया उसे जरुर याद होगा| “ उस दिन गोपाल को अपने व्यवहार पर बड़ी शर्मिंदगी महसूस हुई और उसने आगे कभी बेवजह किसी पर गुस्सा ना करने का प्रण लिया|

प्रिय दोस्तों, दैनिक जीवन में हम अपनी दैनिक समस्याओं की वजह से कई बार छोटी-छोटी बातों में दूसरों पर बेवजह गुस्सा कर देते हैं| जिससे हमारी छवि कहीं ना कहीं जरुर धूमिल होती है और रिश्तों में तनाव के पल भी आ जाते हैं| बदलतीसोच(badaltisoch.com) की ओर से आप सभी से यही गुजारिश है कि बेवजह गुस्से को न्योता ना दें| यदि कभी बेवजह गुस्सा आ भी जाये तो तुरंत अपने अहम् को एक किनारे करके अपने बुरे व्यवहार के लिए माफ़ी मांग लें, और अपने रिश्तों की मिठास को सदैव बनाये रखें| धन्यवाद|




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एक साधु प्रतिदिन प्रातः काल सूर्योदय से पहले शारीरिक क्रियाओं से निवृत होकर नदी किनारे सभी पत्थरों से भिन्न दिखने वाले एक बड़े से सफ़ेद पत्थर पर खड़े होकर ध्यान करते थे| एक प्रातः जब वह अपनी शारीरिक स्वच्छता कर उस पत्थर के समीप पहुंचे तो उन्होंने देखा कि वहां पर पहले से एक साधु ध्यान मुद्रा में बैठा हुआ है| वह साधु प्रतीक्षा करने लगा कि उस पत्थर से वह नया साधु हटे तो वह अपना ध्यान लगाये|

कुछ देर प्रतीक्षा करने पर भी जब वह साधु नहीं उठे, तब पुराने साधु ने नये साधु से प्रार्थना की, महात्मा जी, नित्य प्रति मैं इस पत्थर पर खड़े होकर अपनी साधना करता हूँ, आप कृपया कर किसी दूसरे स्थान को ग्रहण करें ताकि मैं अपनी साधना को प्रारंभ कर सकूँ| नये साधु ने पुराने साधु की बात पर जरा भी ध्यान ना दिया और अपने ध्यान में आंखे बंद करके बैठा रहा| पुराना साधु कुछ देर और रुका रहा, उसने पुनः वही प्रार्थना दोहरायी और आखिर में जब फिर से कोई जवाब ना पाया, तो उतावला होकर पुराने साधु ने नये साधु का हाथ पकड़कर उन्हें पत्थर से नीचे उतारने की कोशिश करी| ध्यान भंग होने से नये साधु को तिलमिलाहट हुयी और उन्होंने पुराने साधु को धक्का दे दिया|

पुराने साधु ने पुनः वही बात दोहरायी तो नये साधु ने क्रोध में कहा, क्या यह पत्थर तुम यहाँ लाये थे?, जब इस पत्थर के सृजनकर्ता तुम नहीं हो तो तुम्हारा इस पर कैसा अधिकार? तुम स्वयं जाकर कोई दूसरा पत्थर क्यों नहीं ढूँढ लेते?

पुराने साधु को नये साधु का इस प्रकार अकड़पन देखकर क्रोध आ गया| उसने भी नये साधु को जोर का धक्का देकर पत्थर से हटा दिया| अब तो दोनों साधु आपस में भिड गए| दोनों साधुओं में जमकर जोर आजमाइश होने लग गयी, फिर धीरे-धीरे बात गुत्थमगुत्थी तक पहुँच गयी| नये साधु ने पुराने साधु को दबोच लिया और उसके ऊपर चढ़ गया|

सुबह-सुबह उधर से राजा के सिपाही गुजर रहे थे, वे उन दोनों को पकड़कर राजा के पास न्याय के लिए ले गये| दोनों साधुओं का पूरा वृतांत और दलीलें सुनकर राजा बड़ा आश्चर्यचकित हुआ कि आखिर यह दोनों एक पत्थर के लिए क्यों लड़ बैठे| राजा ने बड़ी दुविधा के स्वर में कहा, मुझे तो यही समझ नहीं आता कि आखिर आप दोनों में से साधु कौन है? क्योंकि आप दोनों तो सामान्य मनुष्यों की भांति लड़ रहे हो|

यह बात सुनकर दोनों साधु अपने इस कृत्य पर बड़े लज्जित हुये| दोनों ने एक-दूसरे से क्षमा मांगी और उसी दिन से धैर्य, सत्य, क्षमा, दया, विनम्रता और विशालता आदि साधुता के गुणों को अपनाकर वे दोनों सच्चे साधु बन गए|


प्रिय दोस्तों, साधु वेश से नहीं बल्कि सदगुणों से बनता है| विचारों में पवित्रता, वाणी में मृदुता, मन में संयम, क्षमा, और दया जैसे साधुता के गुणों वाला सामान्य मनुष्य भी साधु तुल्य है| धन्यवाद|




“ भोलाराम " एक मोची था| वह रोड के किनारे बैठकर लोगों के जूते पोलिश और ठीक किया करता था| उसका बेटा मणिराम स्कूल से आने के बाद अपने पिता की मदद किया करता था| उनका परिवार निम्न वर्ग का था जिसे आये दिन कोई ना कोई परेशानियों का सामना करना पड़ता था| एक दिन शाम को काम से वापिस लौटने के बाद उसके बेटे ने अपने बुरे दिनों से तंग आकर अपने पिता से कहा, पिताजी बहुत कठिन जीवन है हमारा ! मै भीतर ही भीतर टूट रहा हूँ| जब तक एक मुसीबत का निपटारा होता है तब तक एक नयी मुसीबत सामने खड़ी हो जाती है| ऐसा जीवन कब तक चलता रहेगा?

अपने बेटे कि बात सुनकर भोलाराम उठा, और सामने रखे मिट्टी के चूल्हे पर तीन बर्तनों में पानी भरकर गरम करने रख दिया| जब पानी उबलने लगा, तो उन्होंने एक बर्तन में आलू, दूसरे में कंद, और तीसरे में चाय-पत्ती डाली|

कुछ देर बाद भोलाराम ने चूल्हे से तीनों बर्तन निकालकर एक तरफ रख दिये| आलू और कंद को निकालकर एक साथ रखा और चाय के पानी को एक गिलास में डाल दिया| फिर उन्होंने मणिराम से पूछा, बेटा बताओ कि यह सब क्या हैं?

बेटे ने कहा, आलू, कंद, और चाय हैं| यह सुनकर भोलाराम ने कहा, इन सब को करीब से छूकर देखो! बेटे ने आलू को उठाकर देखा, वे नरम हो गये थे| कंद थोडा सख्त हो गये थे और चाय से ताज़ी महक उठ रही थी| सबको अच्छी तरह से देखने के बाद वह भोलाराम की तरफ कौतूहल से देखने लगा|

तब भोलाराम ने उसे समझाया, आलू, कंद और कॉफ़ी तीनों को एक ही तरह से खोलते हुए पानी में डाला गया था, लेकिन हर एक ने गरम पानी का अपनी तरह से सामना किया| आलू पहले तो कठोर और मजबूत थे, लेकिन खोलते पानी में वे नरम हो गये| कंद कुछ कमजोर थे, मगर गरम पानी में वे कठोर हो गये| और चाय की तो बात ही अलग है| उबलते पानी ने तो उसे पूरा बदल ही डाला, उसे ऐसा महकदार बना दिया जो कि बहुत तरोताजा और खुशनुमा एहसास देती है|

भोलाराम ने पूछा, अब तुम मुझे बताओ कि जब मुसीबतें तुम्हे चारों और से घेरे रहती हैं, तो तुम उनका कैसे सामना करते हो? तुम इन तीनों में से क्या हो? और क्या बनना पसंद करोगे?

प्रिय दोस्तों, वक़्त बदलता रहता है, हमारे जीवन में अच्छा और बुरा समय आता जाता रहता है,कभी-कभी मुश्किलें बहुत भारी और बड़ी लगती हैं, इन मुश्किलों का सामना करना चाहिए, न कि हिम्मत हारकर बैठ जाना चाहिए| फिर जो आपमें निखार आयेगा, उसकी चमक और महक चारों और फैलेगी|




“ संत तुमरी “ कुम्हार थे और प्रतिदिन की तरह मिट्टी के बर्तन बना रहे थे| काशी के एक बड़े विद्वान् महंत प्रकाश अपने दल के साथ उधर से गुजर रहे थे तो वे संत तुमरी से मिलने के लिए उनके पास पहुंचे| महंत जी ने संत जी के ज्ञान और संतभाव की ख्याति को सुना था| वह सोच रहे थे कि संत जी का अनूठा वेश-विन्यास होगा| लेकिन उन्होंने देखा कि संत जी तो अत्यंत साधारण वेश में हैं, कपड़ों में कहीं-कहीं पर मिट्टी के दाग भी हैं| बातचीत करने पर उन्हें पता चला कि संत जी तो व्यवहार में भी अत्यधिक सरल और सामान्य हैं और दिन-भर दुनियादारी के कामों में व्यस्त रहते हैं| जब महंत जी से रहा न गया, तो उन्होंने पूछ ही लिया, आप दिन भर बर्तन बनाते रहते हैं तो ईश्वर का स्मरण कब करते हैं?

संत जी, महंत जी को अपने साथ लेकर झोपड़ी से बाहर आये|

संत जी बोले, यहाँ खड़े रहो| तुम्हारे सवाल का जवाब देता नहीं, दिखाता हूँ| संत जी ने उन्हें दिखाया कि एक औरत लकड़ियों का बड़ा सा गट्ठर सर पर रखकर जंगल से लौट रही थी| उसके चेहरे पर प्रसन्नता और चाल में रफ़्तार थी| लकड़ियों के गट्ठर को पकड़ नहीं रखा था, फिर भी वह पूरी तरह संभली हुई थी|

संत जी ने महंत जी से कहा, उस औरत को देखो| वह अपने ही धुन में चली जा रही है| शायद उसका पति काम से घर आया होगा| उसके लिए भोजन पकाने हेतु वह लकड़ियाँ लेकर जा रही है| अब बताओ कि उसे उन लकड़ियों के गट्ठर की याद होगी या नहीं?

महंत जी ने जवाब दिया, उसे उस गट्ठर की याद नहीं होती, तो अब तक तो वह नीचे गिर चुकी होती|

सुनते ही संत जी तपाक से बोले, यह साधारण-सी औरत सिर पर लकड़ियों का गट्ठर रखकर आराम से घर जा रही है| मजे से अपनी ही धुन में खोयी हुई है, फिर भी गट्ठर का ख्याल उसके मन में बराबर बना हुआ है| अब भी तुम समझते हो कि परमात्मा के स्मरण के लिए मुझे अलग से वक़्त निकालने की जरुरत है? मिट्टी के बर्तन बनाने का काम शरीर करता है, आत्मा नहीं| इसलिए ये शरीर भी आनंदमय होकर बर्तन बनाते रहता है|

प्रिय दोस्तों, प्रभु के स्मरण के लिए पूजा-पाठ करना ही जरुरी नहीं है| दैनिक कार्य करते हुए ह्रदय से परमात्मा के सच्चे स्मरण मात्र से ही प्रभु प्रसन्न हो जाते हैं|







“ आचार्य वैरागी  पद्मनाभं  पूरे देश की लम्बी पदयात्रा पर थे| भिन्न-भिन्न स्थानों पर जाकर उन्होंने उन क्षेत्रों के विद्वानों से शास्त्रार्थ कर उन्हें हराया| केरल से अपनी यात्रा कर वह बिहार के महिष्मति नगर पहुंचे| वहां के प्राचीन मंदिर में दर्शन और साधना कर वह अपने पुराने मित्र “ आचार्य चैतन्य स्वामी “ से मिलने पहुंचे| उन दिनों आचार्य चैतन्य नगर के विद्वानों में उच्च स्थान रखते थे| आचार्य स्वामी के घर पर विद्या और तप का अदभुत माहौल प्रतिदिन रहता था| नगर के विद्वान जन उनसे विभिन्न विषयों पर चर्चा-परिचर्चा किया करते थे|

आचार्य वैरागी के विषय में पूरे नगर में चर्चा चल पड़ी थी कि वे विभिन्न क्षेत्रों के विद्वानों से शास्त्रार्थ कर उन्हें हरा कर महिष्मति नगर पहुंचे हैं| आचार्य चैतन्य स्वामी को आचार्य वैरागी ने शास्त्रार्थ के लिए कहा| आचार्य चैतन्य गृहस्थ थे, संतोष ही उनका परम धर्म था| शास्त्रार्थ में उनकी इतनी रूचि ना थी| वे परब्रह्म ज्ञान को निश्छल भाव से नगर को निरंतर देते रहते थे| शास्त्रार्थ कर अपनी श्रेष्ठता साबित करने की उनकी कोई लालसा ना थी, पर पुराने मित्र के आग्रह पर उन्होंने निमंत्रण स्वीकार कर लिया| महीनों तक शास्त्रार्थ चला, पूरे नगर में उत्सुकता थी कि शास्त्रार्थ में कौन विजयी होगा?| अंततः आचार्य चैतन्य हारते हुये नजर आने लगे|

आचार्य चैतन्य को हारता देख उनकी पत्नी “ वैष्णवी देवी ” ने आचार्य वैरागी से कहा : आचार्य, अभी तो आपने आधे ही अंग पर विजय प्राप्त करी है| भारतीय जीवन में पति-पत्नी दोनों एक ही जीवन और सत्ता का निर्वहन करते हैं, यदि आप मुझे भी शास्त्रार्थ में पराजित कर सके तो ही आप पूर्ण रूप से विजय के हक़दार होंगे| आचार्य वैरागी ने वैष्णवी देवी की शास्त्रार्थ चुनौती को सहर्ष स्वीकार किया| वैष्णवी देवी ने कई प्रश्न किये महीनों तक शास्त्रार्थ चलता रहा| वैष्णवी देवी ने गृहस्थ से सम्बंधित प्रश्न पूछे पर आचार्य तो बाल-ब्रह्मचारी थे| गृहस्थ के गूढ़ प्रश्नों में वो उलझ गए और अंततः उन्होंने स्वयं की हार स्वीकार कर ली| इस प्रकार आचार्य वैरागी ने गृहस्थ स्त्री की महत्ता और शक्ति को पहचाना|

प्रिय दोस्तों, पत्नी को पति का आधा अंग मान कर ही विद्वानों और देवों ने पत्नी को पति की अर्धांग्नी का दर्जा दिया है| गृहस्थ जीवन जीने वाले पुरुष की अर्धशक्ति अर्धांग्नी को बदलतीसोच नमन करता है|


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