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समझदार बहू



सुरेश परिवार का सबसे बड़ा लड़का था| सुरेश की शादी के अगले दिन जब वह अपनी पत्नी को परिवार के सभी सदस्यों से मिलाता है तो उसकी पत्नी सुदर्शनी को यह आभास होता है कि 21 लोगों के बड़े परिवार में सभी को साथ लेकर चलना आसान काम नहीं होगा|

शादी के कुछ दिन बाद, सुरेश जब सुदर्शनी से पूछता है कि- “ क्या वह खुश है? “

तो सुदर्शनी बड़े ही शांत भाव और चेहरे पे मुस्कान लिए कहती है कि - “ वह तो बहुत ही खुश है|”
यह सुनकर सुरेश को बड़ा ही ताजुब्ब होता है क्योंकि कई बार उसने अपनी आँखों के सामने बड़ी ताई जी और छोटी चाची को सुदर्शनी पर टोंट कसते हुए देखा था| फिर इतने बड़े परिवार में सुबह से लेकर शाम तक काम ही काम होता है तो वह पूछ ही बैठा कि- “ सुबह से लेकर शाम तक घर का काम करके और फिर कभी-कभी बड़ी ताई जी और छोटी चाची जी की बातों से तुम्हे बुरा तो नहीं लगता?| “


इस पर सुदर्शनी चेहरे पर हल्की सी मुस्कान लिए कहती है कि- “ नहीं उसे कभी भी किसी की बात का कोई बुरा नहीं लगता| ” सुरेश उसकी इस सहनशीलता के पीछे का राज पूछता है तो सुदर्शनी कहती है कि- “उसके साथ दिन भर में जैसा भी होता है और इस घर में जैसा भी माहोल दैनिक जीवन में रहता है, वह सब अपनी डायरी में लिखती है| फिर जब उसकी डायरी पूरी हो जायेगी तब वह इसका एक उपन्यास बनायेगी| वह यहाँ रहके बहुत खुश है क्योंकि इतने बड़े परिवार में उसको अपने उपन्यास के लिए विभिन्न पात्र मिल गए हैं| इसलिए वह सभी पात्रों के बारे में और उनके व्यवहार के बारे में अपने उपन्यास में लिखती है|

अगले दिन सुरेश परिवार में सबको बताता है कि सुदर्शनी एक उपन्यास लिख रही है जिसमे वह हम सभी के व्यवहार के बारे में और दिन भर के कामों के बारे में लिखती है|

यह सुनते ही सब के मन में एक ही बात आती है कि उन्हें इस उपन्यास में अपने पात्र को सबसे अच्छा दिखाना है| उस दिन से सब बहुत अच्छा आचरण करते हैं| सब एक दूसरे के साथ हंसी-खुशी रहते हैं| सुदर्शनी को भी अब टोंट नहीं सुनने पड़ते थे| ना बड़ों की आपस में बोलचाल होती थी और ना बच्चों का आपस में झगडा होता था क्योंकि सबको अपने पात्र और व्यवहार को उपन्यास में सबसे अच्छा दिखाना था|

धीरे धीरे उन्हें ऐसे ही रहने की आदत पड़ गई| फिर कई दिनों के बाद, एक दिन सबने सुदर्शनी से पूछा कि उसका यह उपन्यास कब पूरा होगा? तो सुदर्शनी ने बड़े ही प्यार से कहा कि बहुत जल्दी पूरा होने वाला है| कई बार पूछने पर सुदर्शनी ऐसे ही बात को आगे बड़ा दिया करती थी|

एक दिन सुरेश ने सुदर्शनी से अकेले में पूछा कि- “ तुम्हारा उपन्यास कब पूरा होगा?,अब तो बहुत दिन हो गए हैं| आखिर तुम वह उपन्यास कब लिखती हो, ना तो कभी किसी ने तुम्हे वह उपन्यास लिखते हुए देखा है और न कहीं पे तुमने वह उपन्यास छुपा के रखा है| “

तब सुदर्शनी ने उसे बताया कि वह कोई उपन्यास नहीं लिखती| यह तो उसने परिवार के सभी सदस्यों को एक साथ जोड़ के रखने के लिए कहा था, ताकि सब अपना व्यवहार सुधार लें और सब हंसी-खुशी रहें| अब जब सब कुछ ठीक हो गया है तो यह बात सबको बतानी चाहिए कि कोई भी उपन्यास नहीं है|

अगले दिन जब उसने यह बात सबको बताई तो सभी लोगों ने उसका बहुत धन्यवाद दिया कि उसने अपनी इस समझदारी से सभी को एक प्यार भरे रिश्ते में बांध दिया और इस प्रकार सुदर्शनी ने अपनी समझदारी और सूझ-बूझ से विपरीत परिस्थतियों को भी अपने अनुकूल बना दिया था|

प्रिय दोस्तों, इसी प्रकार हमारे जीवन में कई विपरीत परिस्थतियाँ आती हैं पर इस बात का सदैव ध्यान रहे की हम अपनी सूझ-बूझ और समझदारी से उन परिस्थतियों को अपने अनुकूल बना के अपना जीवन आसान बना सकते हैं|
धन्यवाद|

इस लेख के बारे में हमे अपनी राय भेजने के लिए जरुर लिखियेगा| धन्यवाद|