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मजदूर का बुखार



यह कहानी सत्य घटना है| मोनू एक सम्पन्न परिवार से था, माता-पिता की इकलौती संतान होने के कारण उसे बड़े ही लाड-प्यार से पाला गया था| छोटी-छोटी गलतियों को नजरअंदाज करने से धीरे-धीरे उसे गलतियाँ करने की आदत पड़ गई और बुरी संगत में पड़ के वह बिगड़ गया| कॉलेज पूरा करने के बाद, हाथ में डिग्री होते हुए भी दिन भर दोस्तों के साथ आवारागर्दी करना ही उसका काम था|

जब माता-पिता को एहसास हुआ तब तक काफी देर हो चुकी थी, अब उसे किस तरह से जिम्मेदार और सही दिशा में लाया जाये माता-पिता हर रोज इसी चिंता में डूबे रहते थे|

एक दिन जब मोनू की किसी जिद को माता-पिता ने पूरा नहीं किया तो मोनू अगले दिन सुबह ही अपने दोस्तों के साथ चले गया| उसने अपने पिताजी को एक मैसेज किया, जब तक उसकी बात नहीं मानी जायेगी तब तक वह घर नहीं आयेगा| माता-पिता दोनों ही इस मैसेज से बड़े ही चिंतित और परेशान थे|

शाम को मोनू अपने दोस्तों के साथ पार्क में बैठ कर सिगरेट का नशा कर रहा था, तभी एक छोटे से बच्चे ने उनके पास आकर कहा, भैया ! मेरे पिताजी की तबियत खराब है, कुछ रुपये दे दो|

मोनू और उसके बिगड़े दोस्त उस बच्चे को देख हँसने लगे, उनमें से एक लड़के ने मजाक बनाते हुए कहा, क्या हो गया तेरे पिता को? कहाँ है तेरा पिता?, चल दिखा हमें, हम भी तो देखें|

वह मासूम सा बच्चा उन सबको पार्क के बाहर ले जाता है जहाँ सड़क के किनारे पर बहुत ही दुबली-पतली काया वाला एक मजदूर बड़ी मेहनत से पत्थर तोड़ रहा था| बच्चे ने उदास होकर अपने पिता की तरफ इशारा करके कहा, वो मेरे पिताजी हैं, उनको पिछले दस दिनों से बुखार है| डॉक्टर ने जो दवाइयाँ लिखी हैं वो बहुत ही महँगी हैं, उनकी महँगी दवाइयों के लिए मैं लोगों से रूपया माँग रहा हूँ, अगर आप कुछ मदद कर सकते हो तो आपका मुझ पर बहुत एहसान होगा|

उसकी बातें सुनकर मोनू ने बड़े ही गंभीर स्वर में कहा, क्या तुझे लगता है, मांगे हुए थोड़े रुपयों से तेरे पिता का इलाज अच्छे तरीके से हो पायेगा?

वो बच्चा बड़े ही शांत भाव से कहता है, मेरा काम अपने पिताजी की सेवा करना है, वो मेहनत-मजदूरी करके हमारा घर चला रहे हैं, उनकी इतनी आमदनी नहीं है कि वह अपनी महँगी दवाइयाँ ला सकें| मेरे से जितना हो सकेगा मैं उतनी कोशिश करूँगा|

यह सुनकर मोनू की आँख में आंसू आ गये, उसने अपनी जेब के सारे रुपये दे दिए और मन ही मन सोचने लगा, इस गरीब बच्चे को अपने पिता की कितनी चिंता है जिन्होंने शायद ही कभी इसकी कोई इच्छा पूरी करी हो, फिर भी यह अपने पिता की सेवा को तत्पर है, इसके माता-पिता को अपने बच्चे पर बड़ा गर्व होगा| और एक मैं हूँ जिसे बचपन से लेकर आज तक किसी चीज कि कोई भी कमी उसके माता-पिता ने नहीं होने दी, तब भी वह हमेशा अपने माता-पिता से जिद करता रहता है, कभी उसने अपने माता-पिता के सुख-दुःख के बारे में नहीं सोचा, क्या पता उन्हें भी उसकी जरुरत हो, यह सोच उसे आज अपने ऊपर बड़ी ग्लानी हुई| उसने उसी समय से गन्दी आदतें और बुरी संगत छोड़ने का फैसला किया और अपने दोस्तों को भी अच्छे रास्तों पर चलने को कहा|

घर आकर मोनू ने अपने माता-पिता से अपनी गन्दी आदतों और व्यवहार के लिए माफ़ी मांगी| उस दिन से मोनू के जीवन में बड़ा ही सकारात्मक परिवर्तन आ गया| आवारा घूमने वाला मोनू आज एक कंपनी में चीफ मैनेजर के पद पर कार्यरत है| आज भी जब मोनू उस नन्हे बच्चे को याद करता है तो उसके लिए दुआएं करता है जिसने उसके जीवन को एक नयी और सकारात्मक दिशा दी| आज मोनू के माता-पिता भी उस पर गर्व करते हैं|


प्रिय दोस्तों, अक्सर कई बार हम अपनी छोटी-छोटी मांगो की वजह से अपने माता-पिता से शिकायतें पाल लेते हैं, पर दोस्तों हमारे माता-पिता अपने सामर्थ्य से कई गुना अधिक हमारा ध्यान रखते हैं| वो हमारी खुशियों के लिए अपनी खुशियों का त्याग कर देते हैं| वो खुद कष्ट में रहेंगे पर हमें कष्ट नहीं होने देंगे, फिर अगर हम उनके कष्टों को नहीं समझेंगे तो कौन समझेगा? हमारे लिए उन्होंने कष्ट खाये हैं तो हमें भी तो कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे उन्हें हम पर गर्व हो| बदलतीसोच (badaltisoch.com) की यही पुकार चलो कुछ ऐसा करें कि हमारे माता-पिता के अनकहे कष्टों के बदले हम उन्हें हमारे ऊपर गर्व करने का मौका दे सकें| धन्यवाद|




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