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लकड़ियों का गट्ठर गिरता क्यों नहीं?




“ संत तुमरी “ कुम्हार थे और प्रतिदिन की तरह मिट्टी के बर्तन बना रहे थे| काशी के एक बड़े विद्वान् महंत प्रकाश अपने दल के साथ उधर से गुजर रहे थे तो वे संत तुमरी से मिलने के लिए उनके पास पहुंचे| महंत जी ने संत जी के ज्ञान और संतभाव की ख्याति को सुना था| वह सोच रहे थे कि संत जी का अनूठा वेश-विन्यास होगा| लेकिन उन्होंने देखा कि संत जी तो अत्यंत साधारण वेश में हैं, कपड़ों में कहीं-कहीं पर मिट्टी के दाग भी हैं| बातचीत करने पर उन्हें पता चला कि संत जी तो व्यवहार में भी अत्यधिक सरल और सामान्य हैं और दिन-भर दुनियादारी के कामों में व्यस्त रहते हैं| जब महंत जी से रहा न गया, तो उन्होंने पूछ ही लिया, आप दिन भर बर्तन बनाते रहते हैं तो ईश्वर का स्मरण कब करते हैं?

संत जी, महंत जी को अपने साथ लेकर झोपड़ी से बाहर आये|

संत जी बोले, यहाँ खड़े रहो| तुम्हारे सवाल का जवाब देता नहीं, दिखाता हूँ| संत जी ने उन्हें दिखाया कि एक औरत लकड़ियों का बड़ा सा गट्ठर सर पर रखकर जंगल से लौट रही थी| उसके चेहरे पर प्रसन्नता और चाल में रफ़्तार थी| लकड़ियों के गट्ठर को पकड़ नहीं रखा था, फिर भी वह पूरी तरह संभली हुई थी|

संत जी ने महंत जी से कहा, उस औरत को देखो| वह अपने ही धुन में चली जा रही है| शायद उसका पति काम से घर आया होगा| उसके लिए भोजन पकाने हेतु वह लकड़ियाँ लेकर जा रही है| अब बताओ कि उसे उन लकड़ियों के गट्ठर की याद होगी या नहीं?

महंत जी ने जवाब दिया, उसे उस गट्ठर की याद नहीं होती, तो अब तक तो वह नीचे गिर चुकी होती|

सुनते ही संत जी तपाक से बोले, यह साधारण-सी औरत सिर पर लकड़ियों का गट्ठर रखकर आराम से घर जा रही है| मजे से अपनी ही धुन में खोयी हुई है, फिर भी गट्ठर का ख्याल उसके मन में बराबर बना हुआ है| अब भी तुम समझते हो कि परमात्मा के स्मरण के लिए मुझे अलग से वक़्त निकालने की जरुरत है? मिट्टी के बर्तन बनाने का काम शरीर करता है, आत्मा नहीं| इसलिए ये शरीर भी आनंदमय होकर बर्तन बनाते रहता है|

प्रिय दोस्तों, प्रभु के स्मरण के लिए पूजा-पाठ करना ही जरुरी नहीं है| दैनिक कार्य करते हुए ह्रदय से परमात्मा के सच्चे स्मरण मात्र से ही प्रभु प्रसन्न हो जाते हैं|