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साधु लड़े पत्थर के लिए



एक साधु प्रतिदिन प्रातः काल सूर्योदय से पहले शारीरिक क्रियाओं से निवृत होकर नदी किनारे सभी पत्थरों से भिन्न दिखने वाले एक बड़े से सफ़ेद पत्थर पर खड़े होकर ध्यान करते थे| एक प्रातः जब वह अपनी शारीरिक स्वच्छता कर उस पत्थर के समीप पहुंचे तो उन्होंने देखा कि वहां पर पहले से एक साधु ध्यान मुद्रा में बैठा हुआ है| वह साधु प्रतीक्षा करने लगा कि उस पत्थर से वह नया साधु हटे तो वह अपना ध्यान लगाये|

कुछ देर प्रतीक्षा करने पर भी जब वह साधु नहीं उठे, तब पुराने साधु ने नये साधु से प्रार्थना की, महात्मा जी, नित्य प्रति मैं इस पत्थर पर खड़े होकर अपनी साधना करता हूँ, आप कृपया कर किसी दूसरे स्थान को ग्रहण करें ताकि मैं अपनी साधना को प्रारंभ कर सकूँ| नये साधु ने पुराने साधु की बात पर जरा भी ध्यान ना दिया और अपने ध्यान में आंखे बंद करके बैठा रहा| पुराना साधु कुछ देर और रुका रहा, उसने पुनः वही प्रार्थना दोहरायी और आखिर में जब फिर से कोई जवाब ना पाया, तो उतावला होकर पुराने साधु ने नये साधु का हाथ पकड़कर उन्हें पत्थर से नीचे उतारने की कोशिश करी| ध्यान भंग होने से नये साधु को तिलमिलाहट हुयी और उन्होंने पुराने साधु को धक्का दे दिया|

पुराने साधु ने पुनः वही बात दोहरायी तो नये साधु ने क्रोध में कहा, क्या यह पत्थर तुम यहाँ लाये थे?, जब इस पत्थर के सृजनकर्ता तुम नहीं हो तो तुम्हारा इस पर कैसा अधिकार? तुम स्वयं जाकर कोई दूसरा पत्थर क्यों नहीं ढूँढ लेते?

पुराने साधु को नये साधु का इस प्रकार अकड़पन देखकर क्रोध आ गया| उसने भी नये साधु को जोर का धक्का देकर पत्थर से हटा दिया| अब तो दोनों साधु आपस में भिड गए| दोनों साधुओं में जमकर जोर आजमाइश होने लग गयी, फिर धीरे-धीरे बात गुत्थमगुत्थी तक पहुँच गयी| नये साधु ने पुराने साधु को दबोच लिया और उसके ऊपर चढ़ गया|

सुबह-सुबह उधर से राजा के सिपाही गुजर रहे थे, वे उन दोनों को पकड़कर राजा के पास न्याय के लिए ले गये| दोनों साधुओं का पूरा वृतांत और दलीलें सुनकर राजा बड़ा आश्चर्यचकित हुआ कि आखिर यह दोनों एक पत्थर के लिए क्यों लड़ बैठे| राजा ने बड़ी दुविधा के स्वर में कहा, मुझे तो यही समझ नहीं आता कि आखिर आप दोनों में से साधु कौन है? क्योंकि आप दोनों तो सामान्य मनुष्यों की भांति लड़ रहे हो|

यह बात सुनकर दोनों साधु अपने इस कृत्य पर बड़े लज्जित हुये| दोनों ने एक-दूसरे से क्षमा मांगी और उसी दिन से धैर्य, सत्य, क्षमा, दया, विनम्रता और विशालता आदि साधुता के गुणों को अपनाकर वे दोनों सच्चे साधु बन गए|


प्रिय दोस्तों, साधु वेश से नहीं बल्कि सदगुणों से बनता है| विचारों में पवित्रता, वाणी में मृदुता, मन में संयम, क्षमा, और दया जैसे साधुता के गुणों वाला सामान्य मनुष्य भी साधु तुल्य है| धन्यवाद|