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चाय की महक



“ भोलाराम " एक मोची था| वह रोड के किनारे बैठकर लोगों के जूते पोलिश और ठीक किया करता था| उसका बेटा मणिराम स्कूल से आने के बाद अपने पिता की मदद किया करता था| उनका परिवार निम्न वर्ग का था जिसे आये दिन कोई ना कोई परेशानियों का सामना करना पड़ता था| एक दिन शाम को काम से वापिस लौटने के बाद उसके बेटे ने अपने बुरे दिनों से तंग आकर अपने पिता से कहा, पिताजी बहुत कठिन जीवन है हमारा ! मै भीतर ही भीतर टूट रहा हूँ| जब तक एक मुसीबत का निपटारा होता है तब तक एक नयी मुसीबत सामने खड़ी हो जाती है| ऐसा जीवन कब तक चलता रहेगा?

अपने बेटे कि बात सुनकर भोलाराम उठा, और सामने रखे मिट्टी के चूल्हे पर तीन बर्तनों में पानी भरकर गरम करने रख दिया| जब पानी उबलने लगा, तो उन्होंने एक बर्तन में आलू, दूसरे में कंद, और तीसरे में चाय-पत्ती डाली|

कुछ देर बाद भोलाराम ने चूल्हे से तीनों बर्तन निकालकर एक तरफ रख दिये| आलू और कंद को निकालकर एक साथ रखा और चाय के पानी को एक गिलास में डाल दिया| फिर उन्होंने मणिराम से पूछा, बेटा बताओ कि यह सब क्या हैं?

बेटे ने कहा, आलू, कंद, और चाय हैं| यह सुनकर भोलाराम ने कहा, इन सब को करीब से छूकर देखो! बेटे ने आलू को उठाकर देखा, वे नरम हो गये थे| कंद थोडा सख्त हो गये थे और चाय से ताज़ी महक उठ रही थी| सबको अच्छी तरह से देखने के बाद वह भोलाराम की तरफ कौतूहल से देखने लगा|

तब भोलाराम ने उसे समझाया, आलू, कंद और कॉफ़ी तीनों को एक ही तरह से खोलते हुए पानी में डाला गया था, लेकिन हर एक ने गरम पानी का अपनी तरह से सामना किया| आलू पहले तो कठोर और मजबूत थे, लेकिन खोलते पानी में वे नरम हो गये| कंद कुछ कमजोर थे, मगर गरम पानी में वे कठोर हो गये| और चाय की तो बात ही अलग है| उबलते पानी ने तो उसे पूरा बदल ही डाला, उसे ऐसा महकदार बना दिया जो कि बहुत तरोताजा और खुशनुमा एहसास देती है|

भोलाराम ने पूछा, अब तुम मुझे बताओ कि जब मुसीबतें तुम्हे चारों और से घेरे रहती हैं, तो तुम उनका कैसे सामना करते हो? तुम इन तीनों में से क्या हो? और क्या बनना पसंद करोगे?

प्रिय दोस्तों, वक़्त बदलता रहता है, हमारे जीवन में अच्छा और बुरा समय आता जाता रहता है,कभी-कभी मुश्किलें बहुत भारी और बड़ी लगती हैं, इन मुश्किलों का सामना करना चाहिए, न कि हिम्मत हारकर बैठ जाना चाहिए| फिर जो आपमें निखार आयेगा, उसकी चमक और महक चारों और फैलेगी|