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बात बहुत समय पहले की है, राजा निकोटस अपने पड़ोसी राज्यों की सुख-सम्पदा और बढ़ता वैभव देख थोड़ा परेशान से थे| उस दिन अपने बगीचे में सैर करके उन्होंने गौर किया कि फूल रोज की भांति नहीं खिले हुए हैं|

राजा निकोटस इन सबकी वजह जानने को बड़े व्याकुल हुये, उन्होंने सभी फूलों से उनकी उदासी का कारण जानने हेतु एक-एक कर प्रश्न पूछने शुरू किये| सबसे पहले चमेली के फूल ने कहा, वह बहुत कमजोर है क्योंकि उसके पास तो गुड़हल के फूल जितनी बड़ी-बड़ी पंखुड़ियाँ नहीं हैं| राजा ने गुड़हल की ओर देखा तो वह भी गर्दन झुकाए हुए था, उसने कहा, वह इन पंखुड़ियों से बड़ा परेशान है, ये पंखुड़ियाँ बिखरी-बिखरी सी हैं, इन्हें संभालना बहुत मुश्किल है, उसकी पंखुड़ियाँ गेंदे के जैसी घनी नहीं हैं| गेंदा भी उदास सा था कि उसकी पंखुड़ियाँ बहुत छोटी हैं और उसका तना भी गुलाब जितना मजबूत नहीं है| गुलाब अपने तने पर लगे काँटों से परेशान था| इस तरह सभी फूल किसी ना किसी बात से दुखी थे|

तभी राजा की नजर पास के ही एक तालाब पर पड़ी, उस तालाब में एक सुन्दर कमल का फूल नजर आया, जो निश्चिंत था, एकदम ताजा और खिला-खिला सा था|

राजा ने बड़े ही आश्चर्य से उससे पूछा, यह तो बड़ी ही अजीब बात है ! मैं पूरे बाग़ में घूम चुका हूँ लेकिन एक से बढ़कर एक सुन्दर फूल दुखी और उदास हैं, तुम तो चारों ओर से पानी से घिरे हुए हो, क्या तुम्हे कोई कष्ट नहीं है? तुम इतने प्रसन्न नजर आ रहे हो ..आखिर इसका कारण क्या है?

कमल के पुष्प ने कहा, महाराज, बाकी फूल अपनी-अपनी विशेषता को देखने के बजाय स्वयं की दूसरों से तुलना करके दुखी हैं, जबकि मैं यह मानता हूँ कि जब मैंने इस बगीचे में जन्म लिया है तो मैं अपने गुणों से इस बगीचे को सुन्दर बनाने में अपनी तरफ से पूरा प्रयास करूँ| इसलिए मैं किसी और से अपनी तुलना करने के बजाय अपनी क्षमता के अनुसार श्रेष्ठतम बनने का प्रयास करता हूँ और प्रसन्न रहता हूँ|

कमल के पुष्प की यह बात सुनकर अन्य फूलों को अपनी कमी का एहसास हुआ, उन्होंने भी उसी समय से अपनी-अपनी महत्ता समझकर अपने गुणों को निखारने का फैसला किया|

राजा निकोटस को भी यह बात सुनकर बड़ी प्रसन्नता हुयी और उन्होंने भी अब अपनी ऊर्जा और समय को अन्य राज्यों से तुलना करने में व्यतीत करने के बजाय अपने राज्य के विकास के हित में कार्य करने में व्यतीत करने का फैसला किया|


प्रिय दोस्तों, अक्सर हम अपनी तुलना दूसरों से कर उदास और दुखी हो जाते हैं, जिससे हमारी कार्यक्षमता पर बड़ा नकारात्मक असर पड़ता है| हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हर इंसान में अपनी-अपनी काबिलियत होती है| हमें अपने गुणों को अच्छे से समझकर उनमें निखार करते रहना चाहिए, ना कि दूसरों से तुलना कर अपने अन्दर के गुणों की महत्ता को कम आँककर उनको नजरअंदाज करना चाहिए| तुलना करना गलत नहीं है यदि वह सकारात्मक तुलना है, जो कि हम अपनी कमियों को सुधारने के लिए करते हैं| दूसरों को हराने और नीचा दिखाने की तुलना सदैव हमारे अन्दर ईर्ष्या, असुरक्षा और निराशा के भाव उत्पन्न करती है जो कि हमारी सफलता में बाधक हैं| बदलतीसोच (badaltisoch.com) दूसरों से तुलना करने के बजाय अपने अंदरूनी गुणों को पहचानकर उनको सदैव निखारते रहने का ही सन्देश देती है| धन्यवाद|




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सिंहगढ़ और मानपुर दो पड़ोसी राज्य थे| सिंहगढ़ नाम के अनुरूप मानपुर से अधिक शक्तिशाली था| एक बार दोनों राज्यों में सीमा विवाद बढ़ गया, जब बात आपसी सहमति से नहीं बनी तो नौबत युद्ध तक पहुँच गयी| दोनों राज्यों ने युद्ध करने का निश्चय किया|

पहले के समय में राजा-महाराजा युद्ध में जाने से पहले अपने राज्य के ज्योतिषगुरु से अपने भविष्य-फल को जानते थे, तो सिंहगढ़ और मानपुर के राजा भी अपने-अपने राज्यों के ज्योतिष गुरुओं के पास गये| सिंहगढ़ के ज्योतिष गुरु ने कहा, महाराज ! आपकी जीत निश्चित है ऐसा आपका भाग्यफल है| यह सुनकर सिंहगढ़ का राजा बहुत अधिक प्रसन्न हुआ| वहीँ मानपुर के ज्योतिष गुरु ने कहा, राजन ! आपकी हार के आसार नजर आ रहे हैं, आपके ग्रहों की दशा ठीक नहीं लग रही है, आप अपने और अपनी प्रजा के बचाव के लिए समुचित साधन जुटा लें| हो सके तो आप स्वयं ही हार मान लें, इससे युद्ध-हानि भी नहीं होगी|

शांति वार्ता विफल होने और युद्ध तय होने के बाद युद्ध से पहले ही हार मानना एक बहुत ही बड़ा अपमान समझा जाता था| मानपुर के राजा ने ज्योतिष गुरु की इस भविष्यवाणी पर गंभीर रूप से विचार करते हुए अपनी सेना को फिर से संगठित किया, दिन-रात मानपुर में युद्ध अभ्यास होने लगा| मानपुर के युवा राजा के आह्वान पर बढ़-चढ़कर कर सेना में सम्मलित हुए और युद्ध से पहले ही दिन-रात के कठोर युद्ध अभ्यास से मानपुर की सेना ने अपनी सैन्य कमजोरियों की बारीकियों को समझ कर उनमें सुधार किया|

उधर सिंहगढ़ में युद्ध से पहले ही अपनी निश्चित विजय की कल्पना में जश्न का माहौल तैयार हो गया, रात भर नाच-गाना और जलसे होने लगे| सब को लगने लगा कि उनकी जीत तो निश्चित है| सिंहगढ़ की बलशाली सेना भी अपने राजा के साथ इन सब का आनंद लेने लगी|

तय दिन में युद्ध का बिगुल बजा, भयंकर और भीषण युद्ध होने लगा| कमजोर दिखने वाली मानपुर की सेना ने अदम्य साहस का परिचय दिया| मानसिक रूप से अपनी जीत मान चुकी सिंहगढ़ की सेना का मनोबल युद्ध-भूमि में मानपुर की सेना के युद्ध कौशल के सामने घुटने टेक चुका था| सिंहगढ़ के राजा ने अपनी पराजय स्वीकार कर ली|

युद्ध में पराजय पाकर सिंहगढ़ का राजा क्रोधित होकर अपने राज्य के ज्योतिष गुरु के पास पहुंचा और कहा, गुरुजी ! आपने तो कहा था कि मेरी जीत निश्चित है, फिर मैं पराजित कैसे हुआ?

ज्योतिष गुरु ने कहा, महाराज ! आपके भाग्य में जीत निश्चित थी लेकिन युद्ध की परिस्थितियों में आपने जश्न का माहौल कर दिया तो आपका भाग्य भी सो गया, वहीँ मानपुर के राजा ने भाग्य का साथ ना होते हुए भी कठोर मेहनत करी| उनकी कठोर मेहनत देख कर भाग्य को ना चाहते हुए भी उनका साथ देना पड़ा| उन्होंने ना केवल युद्ध में विजय हासिल करी बल्कि नियति पर भी विजय प्राप्त कर सोये हुए भाग्य को जगाया है| भाग्य भी मेहनती का ही साथ देता है यदि आप थोड़ी सी भी मेहनत करते तो पराजय का मुँह ना देखना पड़ता|

ज्योतिष गुरु की बात सुनकर सिंहगढ़ के राजा को अपनी भूल का एहसास हुआ, उन्होंने अपने किये पर माफ़ी मांगी और भविष्य में कभी भी भाग्य के भरोसे ना बैठने का निश्चय किया|

प्रिय दोस्तों, भविष्य फल के द्वारा अपना भाग्य जानने की रूचि हम सब को होती है पर केवल भाग्य के भरोसे बैठने मात्र से ही जीवन में कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता| भाग्य केवल रास्ता दिखाता है, उन रास्तों पर चलने से ही मंजिल मिलेगी| आप अपनी तकदीर में लिखी कहानी को अपने हिसाब से बदल सकते हो| बदलतीसोच (badaltisoch.com) भाग्य के सहारे ना बैठकर कुछ कर गुजरने की ही सलाह देना चाहेगा| धन्यवाद|




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यह कहानी सत्य घटना है| मोनू एक सम्पन्न परिवार से था, माता-पिता की इकलौती संतान होने के कारण उसे बड़े ही लाड-प्यार से पाला गया था| छोटी-छोटी गलतियों को नजरअंदाज करने से धीरे-धीरे उसे गलतियाँ करने की आदत पड़ गई और बुरी संगत में पड़ के वह बिगड़ गया| कॉलेज पूरा करने के बाद, हाथ में डिग्री होते हुए भी दिन भर दोस्तों के साथ आवारागर्दी करना ही उसका काम था|

जब माता-पिता को एहसास हुआ तब तक काफी देर हो चुकी थी, अब उसे किस तरह से जिम्मेदार और सही दिशा में लाया जाये माता-पिता हर रोज इसी चिंता में डूबे रहते थे|

एक दिन जब मोनू की किसी जिद को माता-पिता ने पूरा नहीं किया तो मोनू अगले दिन सुबह ही अपने दोस्तों के साथ चले गया| उसने अपने पिताजी को एक मैसेज किया, जब तक उसकी बात नहीं मानी जायेगी तब तक वह घर नहीं आयेगा| माता-पिता दोनों ही इस मैसेज से बड़े ही चिंतित और परेशान थे|

शाम को मोनू अपने दोस्तों के साथ पार्क में बैठ कर सिगरेट का नशा कर रहा था, तभी एक छोटे से बच्चे ने उनके पास आकर कहा, भैया ! मेरे पिताजी की तबियत खराब है, कुछ रुपये दे दो|

मोनू और उसके बिगड़े दोस्त उस बच्चे को देख हँसने लगे, उनमें से एक लड़के ने मजाक बनाते हुए कहा, क्या हो गया तेरे पिता को? कहाँ है तेरा पिता?, चल दिखा हमें, हम भी तो देखें|

वह मासूम सा बच्चा उन सबको पार्क के बाहर ले जाता है जहाँ सड़क के किनारे पर बहुत ही दुबली-पतली काया वाला एक मजदूर बड़ी मेहनत से पत्थर तोड़ रहा था| बच्चे ने उदास होकर अपने पिता की तरफ इशारा करके कहा, वो मेरे पिताजी हैं, उनको पिछले दस दिनों से बुखार है| डॉक्टर ने जो दवाइयाँ लिखी हैं वो बहुत ही महँगी हैं, उनकी महँगी दवाइयों के लिए मैं लोगों से रूपया माँग रहा हूँ, अगर आप कुछ मदद कर सकते हो तो आपका मुझ पर बहुत एहसान होगा|

उसकी बातें सुनकर मोनू ने बड़े ही गंभीर स्वर में कहा, क्या तुझे लगता है, मांगे हुए थोड़े रुपयों से तेरे पिता का इलाज अच्छे तरीके से हो पायेगा?

वो बच्चा बड़े ही शांत भाव से कहता है, मेरा काम अपने पिताजी की सेवा करना है, वो मेहनत-मजदूरी करके हमारा घर चला रहे हैं, उनकी इतनी आमदनी नहीं है कि वह अपनी महँगी दवाइयाँ ला सकें| मेरे से जितना हो सकेगा मैं उतनी कोशिश करूँगा|

यह सुनकर मोनू की आँख में आंसू आ गये, उसने अपनी जेब के सारे रुपये दे दिए और मन ही मन सोचने लगा, इस गरीब बच्चे को अपने पिता की कितनी चिंता है जिन्होंने शायद ही कभी इसकी कोई इच्छा पूरी करी हो, फिर भी यह अपने पिता की सेवा को तत्पर है, इसके माता-पिता को अपने बच्चे पर बड़ा गर्व होगा| और एक मैं हूँ जिसे बचपन से लेकर आज तक किसी चीज कि कोई भी कमी उसके माता-पिता ने नहीं होने दी, तब भी वह हमेशा अपने माता-पिता से जिद करता रहता है, कभी उसने अपने माता-पिता के सुख-दुःख के बारे में नहीं सोचा, क्या पता उन्हें भी उसकी जरुरत हो, यह सोच उसे आज अपने ऊपर बड़ी ग्लानी हुई| उसने उसी समय से गन्दी आदतें और बुरी संगत छोड़ने का फैसला किया और अपने दोस्तों को भी अच्छे रास्तों पर चलने को कहा|

घर आकर मोनू ने अपने माता-पिता से अपनी गन्दी आदतों और व्यवहार के लिए माफ़ी मांगी| उस दिन से मोनू के जीवन में बड़ा ही सकारात्मक परिवर्तन आ गया| आवारा घूमने वाला मोनू आज एक कंपनी में चीफ मैनेजर के पद पर कार्यरत है| आज भी जब मोनू उस नन्हे बच्चे को याद करता है तो उसके लिए दुआएं करता है जिसने उसके जीवन को एक नयी और सकारात्मक दिशा दी| आज मोनू के माता-पिता भी उस पर गर्व करते हैं|


प्रिय दोस्तों, अक्सर कई बार हम अपनी छोटी-छोटी मांगो की वजह से अपने माता-पिता से शिकायतें पाल लेते हैं, पर दोस्तों हमारे माता-पिता अपने सामर्थ्य से कई गुना अधिक हमारा ध्यान रखते हैं| वो हमारी खुशियों के लिए अपनी खुशियों का त्याग कर देते हैं| वो खुद कष्ट में रहेंगे पर हमें कष्ट नहीं होने देंगे, फिर अगर हम उनके कष्टों को नहीं समझेंगे तो कौन समझेगा? हमारे लिए उन्होंने कष्ट खाये हैं तो हमें भी तो कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे उन्हें हम पर गर्व हो| बदलतीसोच (badaltisoch.com) की यही पुकार चलो कुछ ऐसा करें कि हमारे माता-पिता के अनकहे कष्टों के बदले हम उन्हें हमारे ऊपर गर्व करने का मौका दे सकें| धन्यवाद|




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