A+ A-

सिंहगढ़ और मानपुर का युद्ध



सिंहगढ़ और मानपुर दो पड़ोसी राज्य थे| सिंहगढ़ नाम के अनुरूप मानपुर से अधिक शक्तिशाली था| एक बार दोनों राज्यों में सीमा विवाद बढ़ गया, जब बात आपसी सहमति से नहीं बनी तो नौबत युद्ध तक पहुँच गयी| दोनों राज्यों ने युद्ध करने का निश्चय किया|

पहले के समय में राजा-महाराजा युद्ध में जाने से पहले अपने राज्य के ज्योतिषगुरु से अपने भविष्य-फल को जानते थे, तो सिंहगढ़ और मानपुर के राजा भी अपने-अपने राज्यों के ज्योतिष गुरुओं के पास गये| सिंहगढ़ के ज्योतिष गुरु ने कहा, महाराज ! आपकी जीत निश्चित है ऐसा आपका भाग्यफल है| यह सुनकर सिंहगढ़ का राजा बहुत अधिक प्रसन्न हुआ| वहीँ मानपुर के ज्योतिष गुरु ने कहा, राजन ! आपकी हार के आसार नजर आ रहे हैं, आपके ग्रहों की दशा ठीक नहीं लग रही है, आप अपने और अपनी प्रजा के बचाव के लिए समुचित साधन जुटा लें| हो सके तो आप स्वयं ही हार मान लें, इससे युद्ध-हानि भी नहीं होगी|

शांति वार्ता विफल होने और युद्ध तय होने के बाद युद्ध से पहले ही हार मानना एक बहुत ही बड़ा अपमान समझा जाता था| मानपुर के राजा ने ज्योतिष गुरु की इस भविष्यवाणी पर गंभीर रूप से विचार करते हुए अपनी सेना को फिर से संगठित किया, दिन-रात मानपुर में युद्ध अभ्यास होने लगा| मानपुर के युवा राजा के आह्वान पर बढ़-चढ़कर कर सेना में सम्मलित हुए और युद्ध से पहले ही दिन-रात के कठोर युद्ध अभ्यास से मानपुर की सेना ने अपनी सैन्य कमजोरियों की बारीकियों को समझ कर उनमें सुधार किया|

उधर सिंहगढ़ में युद्ध से पहले ही अपनी निश्चित विजय की कल्पना में जश्न का माहौल तैयार हो गया, रात भर नाच-गाना और जलसे होने लगे| सब को लगने लगा कि उनकी जीत तो निश्चित है| सिंहगढ़ की बलशाली सेना भी अपने राजा के साथ इन सब का आनंद लेने लगी|

तय दिन में युद्ध का बिगुल बजा, भयंकर और भीषण युद्ध होने लगा| कमजोर दिखने वाली मानपुर की सेना ने अदम्य साहस का परिचय दिया| मानसिक रूप से अपनी जीत मान चुकी सिंहगढ़ की सेना का मनोबल युद्ध-भूमि में मानपुर की सेना के युद्ध कौशल के सामने घुटने टेक चुका था| सिंहगढ़ के राजा ने अपनी पराजय स्वीकार कर ली|

युद्ध में पराजय पाकर सिंहगढ़ का राजा क्रोधित होकर अपने राज्य के ज्योतिष गुरु के पास पहुंचा और कहा, गुरुजी ! आपने तो कहा था कि मेरी जीत निश्चित है, फिर मैं पराजित कैसे हुआ?

ज्योतिष गुरु ने कहा, महाराज ! आपके भाग्य में जीत निश्चित थी लेकिन युद्ध की परिस्थितियों में आपने जश्न का माहौल कर दिया तो आपका भाग्य भी सो गया, वहीँ मानपुर के राजा ने भाग्य का साथ ना होते हुए भी कठोर मेहनत करी| उनकी कठोर मेहनत देख कर भाग्य को ना चाहते हुए भी उनका साथ देना पड़ा| उन्होंने ना केवल युद्ध में विजय हासिल करी बल्कि नियति पर भी विजय प्राप्त कर सोये हुए भाग्य को जगाया है| भाग्य भी मेहनती का ही साथ देता है यदि आप थोड़ी सी भी मेहनत करते तो पराजय का मुँह ना देखना पड़ता|

ज्योतिष गुरु की बात सुनकर सिंहगढ़ के राजा को अपनी भूल का एहसास हुआ, उन्होंने अपने किये पर माफ़ी मांगी और भविष्य में कभी भी भाग्य के भरोसे ना बैठने का निश्चय किया|

प्रिय दोस्तों, भविष्य फल के द्वारा अपना भाग्य जानने की रूचि हम सब को होती है पर केवल भाग्य के भरोसे बैठने मात्र से ही जीवन में कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता| भाग्य केवल रास्ता दिखाता है, उन रास्तों पर चलने से ही मंजिल मिलेगी| आप अपनी तकदीर में लिखी कहानी को अपने हिसाब से बदल सकते हो| बदलतीसोच (badaltisoch.com) भाग्य के सहारे ना बैठकर कुछ कर गुजरने की ही सलाह देना चाहेगा| धन्यवाद|




जरुर पढ़ें :