प्राचीन समय के लोग बड़े परिश्रमी होते थे, उनमें मोटापा नाम की कोई समस्या नहीं थी, जिससे उन लोगों को बीमारी भी बहुत कम लगती थी; तब इस बात से परेशान होकर, मोटापा अपनी पत्नी बीमारी के साथ भगवान के पास गया और पूछा- आपने हमें क्यों बनाया, जब इस धरती पर हमें कोई अपने पास फटकने भी नहीं देता है ?

भगवान ने कहा- एक समय आयेगा जब इस धरती पर तुम दोनों का राज होगा, धैर्य रखो |

वक़्त गुजरा, लोग आलसी होने लगे और मोटापा अपनी पत्नी बीमारी के साथ इंसानी शरीर में वास करने लगा | देखते ही देखते उनका साम्राज्य बढ़ने लगा, हर कोई मोटापा और बीमारी का शिकार हो गया |

शहरों और महानगरों में अपना राज स्थापित करने के बाद, मोटापा गाँव में भी राज करना चाहता था | एक दिन मोटापा अपनी पत्नी बीमारी के साथ गाँव की ओर आया, वहाँ उसकी मुलाकात एक किसान से हुई, जो खेत में काम करके अपनी पत्नी के साथ ख़ुशी-ख़ुशी घर जा रहा था |

उनकी ख़ुशी देख, बीमारी को जलन होने लगी और उसने अपने पति मोटापा से कहा- स्वामी, शहर में सब लोग हमसे दुखी हैं, पर यहाँ ये दोनों बहुत खुश नजर आ रहे हैं, मुझसे इनकी ख़ुशी देखी नहीं जा रही है |

मोटापा ने जोश में कहा- तुम चिंता मत करो, हम दोनों अभी इनके शरीर पर आक्रमण कर देते हैं |

ऐसा कहते ही मोटापा और बीमारी उनके शरीर में समा गये, जिससे वे दोनों किसान पति-पत्नी अचानक से सुस्त और मुरझा गये, फिर उस दिन उन्होंने आराम करके ही दिन गुजारा |

अगली सुबह किसान ने अपनी पत्नी से कहा- चलो, खेत चलते हैं |

किसान की पत्नी ने सुस्त भाव से कहा- आज रहने देते हैं, रोज-रोज भी क्या जाना !

किसान भी आराम करना चाहता था, फिर भी उसने जाने का मन बना लिया और अपनी पत्नी के साथ खेत में पहुँच गया | खेत में आकर उन्होंने देखा कि फसल-बुआई का बहुत सारा काम पड़ा हुआ है, दोनों किसान पति-पत्नी फसल-बुआई के काम में जुट गये |

घंटे भर खेत में काम करने के बाद उन दोनों किसान पति-पत्नी का शरीर पसीने से तरबतर हो गया, मोटापा और बीमारी पसीने के साथ बाहर बह गये, शरीर में फिर से चुस्ती-फुर्ती आ गयी |

मोटापा ने अपनी पत्नी बीमारी से कहा- किसान के शरीर में हमारा रहना मुश्किल है, अभी हम शहर वापस चलते हैं | जब गाँव भी शहर बन जायेंगे, तब हम इन पर फिर से हमला करेंगे |


प्रिय दोस्तों, आजकल की व्यस्त शहरी जीवनशैली में गाँव के किसान की तरह दिनभर परिश्रम करना संभव नहीं है, फिर भी हमें रोज कुछ मिनट व्यायाम और योग करके अपना पसीना बहाना चाहिए, ताकि हमारे शरीर के बुरे तत्व पसीने के साथ बाहर निकल आयें और स्वास्थ्य बना रहे | धन्यवाद|




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लाला धनीराम बहुत बड़े व्यापारी थे, शहर के अमीर लोगों में वे प्रमुख थे | अकूत धन-दौलत और सारी सुख-सुविधायें थी, लेकिन कई साल बीतने के बाद भी उनकी कोई संतान नहीं हुई |

धनीराम को इस बात से कोई परेशानी नहीं थी, ना ही उनकी पत्नी को कोई परेशानी थी कि उनकी कोई संतान नहीं है; वे अपने दैनिक काम सुचारु रूप से करते और दान-पुण्य के काम में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे | मगर धनीराम की माँ को यह बात बड़ी खलती थी, वो तो हरदम चिंता में घुले जाती थी; आये दिन किसी ज्योतिष, हकीम-डॉक्टर को धनीराम से मिलवाने ले आती थी | धनीराम अपनी माँ को दुखी नहीं करना चाहते थे, इसलिए वो सबसे मिलते थे, पर करते अपने ही मन की थे |

ऐसे ही एक दिन उनकी माँ किसी पंडित को धनीराम से मिलवाने ले आयी |

पंडित ने सब देखभाल के कहा- लाला जी, आपके भाग्य में संतान सुख नहीं है, फिर भी आप पुत्र कामना हेतू पुत्रेष्टि यज्ञ करवा लेंगे तो संतान प्राप्ति हो जायेगी |

धनीराम शांत स्वभाव के आदमी थे, मुस्कराकर बोले- पंडित जी, आपका उपाय जरूर लाभकारी होगा, पर कुछ दिनों पहले ही मुझे विचार आया और मुझे लगा, मेरी संपत्ति और वंश को सँभालने के लिये बहुत सारी संतानों की आवश्यकता पड़ेगी | ऐसी संतानें जो शिक्षित-सज्जन हो, जो समाज के लिए आदर्श हो, जो देश-समाज का नाम रोशन करे | ऐसी संतानें मुझे बिना पूजा-पाठ के ही मिलने वाली हैं |

पंडित जी ने असमंजस भाव से पूछा- लाला जी, मैं आपकी बात समझा नहीं ! बिना पूजा-पाठ किये ऐसा कोई योग आपके भाग्य में नजर नहीं आ रहा है, ऐसा कैसे संभव है ?

धनीराम बोले- संभव है, आप थोड़ा धैर्य रखिये, आपके सवाल का जवाब कुछ दिनों में मिल जायेगा |

लाला धनीराम ने शहर में पड़ी अपनी कई बीघा जमीन में ‘नवभारत’ नाम का एक विशाल विद्यालय बनवाया, उस विद्यालय को अपनी सारी संपत्ति दान में दे दी | विद्यालय में पढ़ने वाला हर विद्यार्थी लाला जी की संतान समान हो गया | धनीराम का उन बच्चों के साथ और उन बच्चों का धनीराम के साथ, पिता-संतान जैसा रिश्ता बन गया |

इस तरह लाला जी को कई संतानें एक साथ मिल गयी और शिक्षा की अलग ही ज्योत जलने लगी |


प्रिय दोस्तों, धनीराम जैसा काम हर कोई कर सके ये संभव नहीं है, लेकिन आप अपनी संतान को अच्छी से अच्छी शिक्षा देने का प्रयास जरूर करें | सुशिक्षित संतानें ही परिवार-समाज-देश की पहचान और सम्मान हैं | शिक्षा में किया खर्च, कभी बेकार नहीं होगा | धन्यवाद|




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एक गरीब सब्जी वाला सब्जी बेचने शहर जाया करता था, रास्ते में एक जंगल पड़ता था, जिसे पार करने के बाद शहर आता था |

एक सुबह वह जंगल के रास्ते शहर जा रहा था, रास्ते में उसने देखा कि कुछ लोग एक सुनहरे मोर को पकड़ के ले जा रहे हैं और वो मोर इंसानी भाषा में बचाओ-बचाओ चिल्ला रहा है |

वह सब्जी वाला उस मोर को बचाने के लिए उन लोगों से भिड़ गया और मोर को आजाद करा लिया | इस बात से गुस्साए उन लोगों ने सब्जी वाले को अधमरा होने तक पीटा और उसे जंगल में ही छोड़कर, मोर को ढूँढने लगे, लेकिन फिर वो मोर नहीं मिला |

शाम तक मोर को ढूँढने के बाद वे लोग भी अपने घर चले गये | उन लोगों के जाने के बाद मोर आया और सब्जी वाले से बोला- मैं स्वर्ण-समुदाय का मोर हूँ; तुमने अपनी जान पर खेलकर मेरी जान बचायी है, मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूँ ?

सब्जी वाला अपनी अंतिम साँसें गिन रहा था, वो बोला- मेरा बचना मुश्किल है; मेरा घर यहाँ से थोड़ा दूर है, वहाँ मेरी पत्नी और दो बेटे हैं, तुम उनके लिए कुछ कर सकते हो तो कर दो !

वो स्वर्ण-मोर सीधे उसके घर गया, और सारा घटनाक्रम सुनाकर उसकी पत्नी से बोला- आपके पति मेरी जान बचाते हुए कुर्बान हो गये, इसलिए मैं आप लोगों की मदद के लिए हर रात आपको एक सोने का पंख दूँगा |

जो चला गया वो तो वापिस नहीं आ सकता था, पर रोज एक सोने का पंख मिलने से उनकी आर्थिक स्थिति सुधरने लगी |

स्वर्ण-मोर का भी उनके साथ मन लगने लगा, एक दिन उसने कहा- जब मैं मर जाऊँगा, तब मुझे जलाना या दफनाना मत, खा देना ! इससे तुम्हारे बाल सोने के हो जायेंगे, फिर तुम्हें कभी गरीबी नहीं झेलनी पड़ेगी |

ऐसा सुनकर सब्जी वाले की पत्नी के मन में लालच आ गया, उसने मन ही मन सोचा-  रोज-रोज एक पंख के लिए इंतजार करने से अच्छा, क्यों ना इस मोर को आज रात ही मार के खा दिया जाये |

उस रात जब वो स्वर्ण-मोर सोने का पंख देने आया, सब्जी वाले की पत्नी ने अपने दोनों बेटों के साथ मिलकर स्वर्ण-मोर को दबोच लिया और ख़ुशी-ख़ुशी मार के खा गये, इस लालच में कि उनके बाल सोने के बन जायेंगे |

सुबह तक भी कुछ नहीं हुआ, कई दिनों तक जब कुछ नहीं हुआ तो वे समझ गये कि उनसे ऐसी गलती हो गयी जिसकी कीमत चुकाना नामुमकिन है |

दरअसल उस स्वर्ण-मोर ने कहा था, जब वह मर जायेगा, यानी प्राकृतिक रूप से मर जायेगा, ना कि मार दिया जायेगा |

प्रिय दोस्तों, बुरे दिनों के बाद अच्छे दिन जरूर आते हैं, उन अच्छे दिनों को संयम से संभालकर रखना चाहिए, अगर आप लालच में अंधे होकर काम करोगे तो अच्छे दिन बदलने में देर नहीं लगती | धन्यवाद|




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अरब देश में फैदयान नाम के एक मौलवी थे, वे जगह-जगह जाकर ज्ञान-धर्म का प्रचार करते थे | बड़े ही धार्मिक और नेकदिल थे, अपने काम के बदले कुछ भी मेहनताना नहीं लेते थे, जो भी अपनी इच्छा से कुछ दे देता उसे अपने नीतिगत नियमों को ध्यान में रखकर स्वीकार करते थे |

एक दिन किसी गाँव में धार्मिक सभा को सम्बोधित करने के बाद वे एक पेड़ के नीचे अपने शिष्यों के साथ बैठे थे, तभी वहाँ रहीमा नाम की दाई आयी |

दाई ने अपना परिचय दिया और एक कटोरा आगे बढ़ाकर निवेदन किया- मौलवी जी, मैं आप के लिये घर के बने पकवान लेकर आयी हूँ, आप इन्हें कबूल करें |

मौलवी फैदयान ने कहा- पाकीजा बानो(श्रेष्ठ स्त्री), मुझे अभी भूख नहीं है, मैंने थोड़ी देर पहले अपने शागिर्द(शिष्य) का लाया हुआ भोजन हजम कर लिया है, पेट पूरा भरा है |

मौलवी जी ने ऐसे भाव से कहा जैसे वे इस समय कुछ भी खाने में अक्षम थे |

दाई ने कहा- मौलवी जी, अबकी बार तो आपने भोजन कर लिया है, पर अगली बार मैं पहले से बताकर आऊँगी ताकि आप मेरे बने पकवान कबूल करें |

मौलवी जी ने मुस्कराकर सहमती जतायी |

दाई के चले जाने के बाद, एक शिष्य ने मौलवी जी से पूछा- मौलवी जी, वो दाई इतने प्यार से पकवान लेकर आयी थी, आपने कबूल क्यों नहीं किया? फिर आपने कुछ खाया भी तो नहीं है |

इस पर मौलवी जी ने समझाते हुए कहा- तुम्हारी बात वाजिब है; हकीम, दाईयों जैसे शरीफों(सज्जनों) से कुछ भी लेना मेरे गैरत(स्वाभिमान) के खिलाफ है, वे लोग इस दुनिया के दुःख-दर्द को अपनी आँखों से देखते हैं, ऊपर वाले की तरह लोगों की मदद का काम करते हैं, फिर अपना मेहनताना पाते हैं | मैं उनकी कमाई से कुछ भी कबूल नहीं सकता, वे लोग इज्जतमंद होते हैं |

इस तरह मौलवी जी ने अपने शिष्यों को लोगों का सम्मान करना सिखाया |


प्रिय दोस्तों, हमारे आस-पास भी कई ऐसे लोग हैं जो समाज हित का काम करके अपनी आजीविका कमा रहे हैं, ऐसे लोग समाज के दर्द-कष्ट को कम करने का काम करते हैं ; उनका सम्मान कीजिये, वे सम्मान-योग्य हैं | धन्यवाद|




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यह कहानी महाभारत से ली गयी है| श्रीकृष्ण, कौरवों और पांडवों की संधि का विचार लेकर हस्तिनापुर की ओर रवाना हुए |

महाराज धृतराष्ट्र को जब यह ज्ञात हुआ कि वासुदेव हस्तिनापुर आने वाले हैं, तो उन्होंने उनके स्वागत के लिये भव्य तैयारियाँ शुरू कर दी | हस्तिनापुर में सबसे सुन्दर भवन दु:शासन का था, जिसे महाराज के आदेश पर वासुदेव के लिये खाली कर दिया गया और ऐसे भव्य तरीके से सजाया गया मानो सारी सुन्दरता उसी भवन में खिल उठी हो | दुर्योधन के मन में प्रेम नहीं था, पर वह अपने पिता की आज्ञा पालन करते हुए दिखावटी प्रसन्नता से श्रीकृष्ण के स्वागत में जुटा था |

द्वारकाधीश श्रीकृष्ण का रथ हस्तिनापुर पहुँचा; दुर्योधन और उसके भाईयों ने राजधानी के मुख्य द्वार पर आकर श्रीकृष्ण का स्वागत किया |

श्रीकृष्ण के लिए सजाये गये भवन के समीप पहुँचते ही दुर्योधन ने कहा- गोविन्द, आप इस सुन्दर भवन में पधारें, इसे अति महत्वपूर्ण रूप से आपके लिए सजाया गया है, आप यहाँ जलपान और विश्राम कीजिये |

श्रीकृष्ण बोले- दुर्योधन, तुम्हारे मनोहर स्वागत के लिये धन्यवाद ! परन्तु मैं यहाँ एक संधिदूत बनकर आया हूँ, और एक दूत का परम धर्म है कि जब तक उसका कार्य संपन्न नहीं हो जाता, तब तक वह दूसरे पक्ष के यहाँ कुछ भी ग्रहण नहीं करता |

ऐसा सुनकर दुर्योधन को बुरा लगा, फिर भी स्वयं के भावों को नियंत्रित करके पूछा- गोविन्द, आप हमारे सम्बन्धी भी हो, आप हमारा निवेदन क्यों नहीं स्वीकार रहे हैं ?

श्रीकृष्ण ने जवाब दिया- दुर्योधन, भूख से अत्यंत व्याकुल मनुष्य कहीं भी भोजन कर सकता है, परन्तु जिसे भूख ना हो, वह भोजन तभी स्वीकार करता है जब सामने वाले के ह्रदय में उसके प्रति प्रेम हो | भूख से मैं व्याकुल नहीं हूँ और तुम्हारे ह्रदय में मुझे अपने लिए प्रेम नजर नहीं आ रहा है |

ऐसा कहकर द्वारकानाथ का रथ राजभवन की तरफ मुड़ गया, दु:शासन का भवन जिसे भव्य रूप से सजाया गया था, उसकी तरफ उन्होंने देखा तक नहीं |


प्रिय दोस्तों, भूख न होने पर उसी जगह भोजन किया जाता है जहाँ से प्रेम मिलता है | खासकर भगवान प्रेम के भूखे हैं, वे किसी सांसारिक सुख के भूखे नहीं होते हैं | धन्यवाद|




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सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य की वीरता को किसी परिचय की जरूरत नहीं है और उनके महामंत्री कौटिल्य(चाणक्य) की राजनीतिक कुटिलता के बारे में भी कहने की जरूरत नहीं है, फिर भी एक बार वे दोनों भूल कर बैठे जिससे उन्हें हार का मुँह देखना पड़ा |

चाणक्य ने नन्दवंश का पूर्णतः नाश करने की शपथ ली थी, उन्होंने चन्द्रगुप्त मौर्य के साथ मिलकर नन्द की राजधानी पाटलिपुत्र पर धावा बोल दिया, भीषण युद्ध हुआ| नन्द को हराना इतना आसान नहीं था, चन्द्रगुप्त मौर्य की पराजय हो गयी |

चाणक्य और चन्द्रगुप्त वन-वन भटकने लगे, कुछ दिनों तक ऐसे ही भटकते हुए वो एक झोपड़ी के पास पहुँचे |

आवाज लगायी, अन्दर से एक वृद्ध महिला निकली |

चन्द्रगुप्त ने पूछा- माई, भोजन मिलेगा ?

वृद्ध महिला गरीब थी, मगर सज्जन और उदार थी | उसने उन दोनों को झोपड़ी में बिठाया, फिर अपने सामर्थ्य के हिसाब से आवभगत करने लगी |

वृद्धा इस बात से बिल्कुल अनजान थी कि उसके यहाँ चन्द्रगुप्त मौर्य और चाणक्य आये हैं, उसने उन दोनों के लिए खिचड़ी बनाकर, परोसी |

चन्द्रगुप्त मौर्य बहुत भूखे थे, उन्होंने पहला निवाला पकड़ने के लिए अपना हाथ थाली के बीच में डाला और जोर से बोले- आह! यह तो बहुत गरम है |

वृद्धा ने मजाक भाव से कहा- अरे बेटा, तू भी मुझे चन्द्रगुप्त जैसा ही मूर्ख लग रहा है|

वृद्धा की जुबान पर अपना नाम सुनते ही चन्द्रगुप्त ने उत्सुकता से पूछा- माई, चन्द्रगुप्त ने क्या मूर्खता करी है, जो तुम मुझे उसके जैसा कह रही हो ?

वृद्धा ने हँसकर कहा- देख बेटा, चन्द्रगुप्त भी तेरी तरह है, जैसे तू अभी अपनी भूख मिटाने के लिये उतावला है, वैसे ही वो भी राजा बनने के लिये बड़ा उतावला है| तुझे खिचड़ी खानी है तो किनारे से खा, जहाँ पर ठंडी है, कहाँ बीच में हाथ डाल रहा है! हाथ तो जलेगा ही| ऐसा ही वो चन्द्रगुप्त है, नन्द को जीतने के लिये किनारे से आता, सीधा पाटलिपुत्र पर हमला बोल पड़ा, हारना तो था ही ; अब हार के भाग गया |

वृद्धा की बात सुनकर, चन्द्रगुप्त को अपनी गलती मालूम पड़ी | गलती सुधारी, चाणक्य ने कूटनीतिक जाल बिछाया, और किनारों से जीतते हुए अंत में नन्द वंश का नाश कर दिया |


प्रिय दोस्तों, उतावलापन हमारी दूरदर्शिता पर ग्रहण लगा देता है | अगर आपकी मंजिल बड़ी है तो उतावलापन त्यागकर, शांत मन से रणनीति बनाकर छोटे-छोटे पड़ावों को पार करके मंजिल तक पहुँचना आसान रहेगा| धन्यवाद|




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मोहनलाल मध्यमवर्गीय परिवार से था, मध्यमवर्गीय परिवार की दैनिक समस्यायें अक्सर उसके जीवन में भी आती रहती थी, ये छोटी-छोटी समस्यायें उसे परेशान कर देती थी| इसी वजह से वह किसी भी ख़ुशी-पर्व का आनंद नहीं ले पाता था, हर समय अपनी चिंता में डूबा रहता था| उसकी इस उदासीनता की वजह से उसका पूरा परिवार उदासीनता की गहराई में समाता जा रहा था|

बरसात का मौसम था, मोहनलाल शाम के समय अपने घर के आँगन में बैठा हुआ था| तभी उसकी नजर आँगन में जल रही लाइट पर पड़ी, जिसके चारों तरफ बहुत सारे छोटे-छोटे पतंगे फड़फड़ा कर उड़ रहे थे, और कुछ-बहुत जमीन पर मरे पड़े थे|

मोहनलाल ने मन ही मन मजाक बनाते हुये कहा- ये पतंगे भी चंद मिनटों के लिए जीते हैं और उसमे भी लाइट के चारों तरफ चिपकते रहते हैं|

उसी समय एक छोटा सा पतंगा, मोहनलाल के कंधे पर आकर बैठा|

मोहनलाल ने हीन भाव से कहा- जा, तू भी जा और लाइट पर चिपक जा|

पतंगा ने पूछा- तुम इतने परेशान क्यों हो ?

मोहनलाल ने उदासीन भाव से कहा- मेरे जीवन में कई छोटी-छोटी परेशानियाँ हैं, उदास-परेशान ना रहूँ तो क्या करूँ ! तेरा जन्म तो सिर्फ खाने और उड़ने के लिए हुआ है, तुझे क्या पता इंसानी परेशानियों के बारे में |

पतंगा बोला- इंसान की कमी यही है, उसे खुश रहना नहीं आता| तुम्हें पता है, हमारा जीवन कुछ घंटों-मिनटों का होता है; सुबह तक हम सभी मर जायेंगे, यह बात हम सभी जानते हैं, फिर भी हम अपने जीवन को ख़ुशी-ख़ुशी जीते हैं, हर सेकेण्ड को जी-भर के जीते हैं| हम जन्म लेते हैं, फिर अपने परिवार के साथ रोशनी की ख़ोज में पूरे हर्ष-उल्लास के साथ निकल पड़ते हैं, यही हमारा कर्म है, जिसे हम ख़ुशी-ख़ुशी करते हैं| जैसे ही रोशनी मिलती है, हमारे लिए उत्सव शुरू हो जाता है|

मोहनलाल ने उपहास उड़ाया- लोग तुम पर हँसते हैं, तुम्हारा जन्म सिर्फ जलने के लिए हुआ है|

पतंगा बोला- हमें पता है रोशनी की गर्मी हमारे पंख जला देगी, लोग हम पर हँसेंगे, मजाक बनायेंगे, बेवकूफ कहेंगे; पर हम जिंदादिल हैं, हम आज में जीते हैं और यही हमें हौसला देता है| हम हमेशा खुश रहते हैं, चाहे हमारा जीवन चंद सेकेण्ड का ही क्यों ना रह गया हो |

और ऐसा कहकर वह पतंगा लाइट की तरफ उड़ गया |

मोहनलाल को उस दिन अहसास हुआ, वह अपनी छोटी-छोटी चिंता और परेशानियों में इस तरह उलझा हुआ है कि उसकी खुशियाँ कहीं खो गयी हैं |

तब से मोहनलाल हर पल खुश रहने लगा, परेशानियाँ तो उसके जीवन में आगे भी आती रही, पर तब वह परेशानियों के समाधान ख़ुशी-खुशी निकालना सीख गया था |


प्रिय दोस्तों, जीवन में परेशानियाँ आती रहेंगी, पर आज जो वक़्त है यह फिर नहीं आएगा; क्यों ना इस वक़्त को खुश रहके गुजारा जाये, बजाय उदास और दुखी रहके| यकीन मानिये जब आप हमेशा खुश रहोगे, आपको जीवन की हर समस्या का समाधान अपने आप मिलने लगेगा| हर वजह में खुशियाँ ढूँढिये| धन्यवाद|




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बात सृष्टि के शुरुआत की है, उस समय पृथ्वी अपने अक्ष पर नहीं घूमती थी| पृथ्वी के आधे हिस्से में सूर्य का वास था और आधे हिस्से में चन्द्र(चन्द्रमा) का वास था|

भगवान ने पृथ्वी पर जीवन की रचना की|

सूर्य पक्ष में दिन भर उजाला रहता था, वहाँ के जीव-जंतु पूरा दिन काम करते रहते, खाना खाते फिर दौड़-भाग-काम में लग जाते; इससे वे जल्दी-जल्दी दुर्बल होकर मरने लगे|

उधर चन्द्र पक्ष में हमेशा रात रहती थी, वहाँ के जीव-जंतु आराम फरमाते रहते, कुछ काम नहीं करते| यहाँ तक कि वे अपने भोजन के लिए भी मेहनत नहीं करते, बिना भोजन के उनका शरीर घटने लगा और वे भी जल्दी-जल्दी मरने लगे|

भगवान यह सब देख बड़ा चिंतित हुये|

भगवान ने सूर्य पक्ष वाले जीव-जंतुओं को बुलाकर पूछा- तुम दिन भर काम क्यों करते रहते हो ?

उन्होंने कहा- हमारे स्वामी सूर्य हमेशा हमारे सिर पर सवार रहते हैं, इसलिये हम काम करते रहते हैं, काम हमें प्रिय है|

फिर भगवान ने चन्द्र पक्ष वाले जीव-जंतुओं को बुलाकर पूछा- तुम हमेशा आराम ही क्यों करते रहते हो ?

उन्होंने कहा- हमारे स्वामी चन्द्र कभी आते हैं, कभी नहीं आते, कभी गायब ही हो जाते हैं| वो भी आराम करते रहते हैं, इसलिये हम भी आराम करते रहते हैं, आराम हमें प्रिय है|

दोनों के तर्क वाजिब थे, भगवान की चिंता और बढ़ गयी|

भगवान ने सूर्य को बुलाया और पूछा- तुम्हारे लोग काम ही करते रहते हैं, तुम उन्हें आराम करने के लिए क्यों नहीं बोलते ?

सूर्य ने कहा- मैंने खुद कभी आराम नहीं किया, मुझे क्या पता आराम क्या होता है !

फिर भगवान ने चन्द्र को बुलाया और पूछा- तुम अपने लोगों को काम करने के लिए क्यों नहीं बोलते हो?

चन्द्र ने कहा- काम क्या होता है, यह तो मुझे पता ही नहीं है !

सूर्य-चन्द्र भी भगवान की समस्या का हल नहीं निकाल पाए, तब भगवान ने पृथ्वी को बुलाया और सारा घटनाक्रम सुनाकर पूछा- क्या तुम्हारे पास इस समस्या का कोई हल है ?

पृथ्वी ने कहा- जब काम और आराम दोनों होगा तभी जीवन सही ढंग से चलेगा, यही इस समस्या का हल है|

काम और आराम बारी-बारी से कैसे होगा इस विषय में गहन सोचा गया, फिर सूर्य और चन्द्र से आधे-आधे दिन अपनी जगह बदलने को कहा तो उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया| तब पृथ्वी को कहा गया कि उन्हें ही अपने अक्ष पर इस प्रकार घूमते रहना है जिससे आधे दिन सूर्य दिखे और आधे दिन चन्द्र| इस तरह दिन-रात शुरू हुये, सभी जीव-जंतु दिन में काम करने के बाद रात को आराम करने लगे और पृथ्वी पर जीवन सुचारु रूप से चलने लगा|


प्रिय दोस्तों, काम और आराम का सही सामंजस्य जीवन के लिए जरूरी है| काम और आराम दोनों को महत्व देने से आपका जीवन व्यवस्थित रूप से चलेगा| धन्यवाद|




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