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एक हजार में से सिर्फ एक !



केरल के एक प्राचीन मठ का मुख्य मठ हरिद्वार(haridwar) में स्थित है | केरल मठ के मठप्रमुख बूढ़े हो रहे थे और चाहते थे कि मुख्य मठ हरिद्वार के मठाधीश, किसी सन्यासी को मठप्रमुख के रूप में भेजें | केरल मठप्रमुख ने हरिद्वार मठाधीश को सन्देश भेजा- कृपया ऐसें सन्यासी को भेजें जो केरल मठ के मठप्रमुख का पदभार संभाल सके | हरिद्वार मठाधीश ने जवाब भेजा- मैं एक हजार सन्यासियों को भेजूँगा, जो पहले पहुँच जाये, उसे मठप्रमुख बना देना| 

अगली सुबह, एक हजार नौजवान सन्यासियों को भेजा गया | उन एक हजार सन्यासियों को यह नहीं पता था कि जो भी केरल मठ पहले पहुँचेगा वो मठप्रमुख का पदभार ग्रहण करेगा; हरिद्वार मठाधीश ने उन्हें सिर्फ इतना ही कहा कि वे सभी केरल मठ के लिए प्रस्थान करें और वहाँ के मठ में रहकर अपना आगे का जीवनयापन करें|

सिर्फ जीवनयापन के लिए हरिद्वार से केरल जाना बड़ी हल्की बात थी, इसी वजह से रास्ते में जिस-जिस सन्यासी का घर आया, वह कोई ना कोई बहाना बनाकर खिसकने लगा|

प्राचीन समय में यात्रा करने में महीनों गुजर जाते थे, और फिर हरिद्वार से केरल की दूरी भी तो कई ज्यादा थी | एक महीने बाद, एक हजार सन्यासियों में से केवल बीस ही बच गये|

वे बीस एक शहर से गुजर रहे थे, वहाँ के कुछ लोग उनके पास आये और बताया कि उनके आश्रम-प्रधान की आकस्मिक मृत्यु हो गयी | किसी एक सन्यासी से उन्होंने आश्रम-प्रधान बनने के लिए गुजारिश करी, सन्यासियों की टोली से एक सन्यासी उन लोगों के साथ चला गया|

कुछ दूर आगे बढ़ने पर दूसरा शहर आया, वहाँ राजा के सन्देशवाहक आये और बोले- राजकुमारी की शादी है, जिसके लिए पांच शुद्ध सन्यासी पुरोहित चाहिए, इस तरह पांच आदमी वहीँ रुक गए|

आगे चलने पर एक सन्यासी किसी मंदिर में पुजारी बन गया और कुछ सन्यासी किसी पाठशाला में आचार्य बन गये | देखते ही देखते, वे केवल तीन ही रह गये|

केरल प्रवेश करके जैसे ही पहले शहर में पहुँचे, एक जवान युवती आयी और उसने कहा- मेरे पिताजी अभी तक व्यापार से नहीं लौटे हैं, मैं अकेली हूँ, इस वजह से काफी भयभीत हूँ | यह सुनकर एक सन्यासी उस युवती की देख-रेख के लिए रुक गया|

अब सिर्फ दो सन्यासी रह गये | जैसे ही मठ के समीप पहुँचे, एक व्यक्ति ने शास्त्रार्थ के लिए उन दोनों सन्यासियों को चुनौती दी, उन दोनों में से एक सन्यासी ने चुनौती स्वीकार करी | हालाँकि दूसरे सन्यासी ने पहले सन्यासी को शास्त्रार्थ से बचने की बात कही क्योंकि शास्त्रार्थ लम्बा खिंचने की सम्भावना थी, पर वह सन्यासी नहीं माना|

अब एक अकेला सन्यासी मठ में पहुँच गया, जिसे मठप्रमुख के रूप में पदभार सौंपा गया|

प्रिय दोस्तों, सफलता कभी यह नहीं बताती है कि वह हमें कब मिलेगी | सफलता की राह में चलने पर आपका ध्यान भ्रमित होने की कई परिस्थितियाँ बनेंगी, इन विषम परिस्थितियों में धैर्य और लक्ष्य पर नजर रखने से ही सफलता मिलेगी |