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तुम्हे ये कभी समझ नहीं आने वाला



एक बार की बात है, एक बिखरे हुये बाल और सूखे शरीर वाला भिखारी-साधू, किसी धार्मिक विद्वान आचार्य के आश्रम में उनके पास पहुँचा | आचार्य उस वक्त कुछ पढ़ रहे थे|

साधू ने आचार्य से पूछा- तुम क्या पढ़ रहे हो? क्या मुझे थोड़ा भोजन मिलेगा खाने को!

आचार्य ने साधू को साधारण अनपढ़ भिखारी समझ के मजाक बनाते हुये कहा- मैं जो पढ़ रह हूँ वो तुम्हारी समझ से कोसों दूर है, तुम्हे ये कभी समझ नहीं आने वाला; मैं तुम्हारे लिए भोजन लेके आता हूँ, तुम सिर्फ अपना पेट भरो|

आचार्य जैसे ही भोजन लेने अन्दर गए, साधू किताबों को उठाकर, पास के एक तालाब में एक-एक करके डालने लगा|

आचार्य अन्दर से भोजन लेकर आये, उन्होंने साधू को तालाब में किताबें डालते हुये देखा | आचार्य भागते हुये आये, साधू को डांट-फटकार लगायी और तालाब से सारी किताबें निकाल लाये| मगर सारी किताबें सूखी थी, उनमें पानी की एक बूँद तक नहीं लगी थी; आचार्य यह देख बड़ा अचंभित हुये|

आचार्य ने साधू से पूछा- यह सब तुमने क्या किया? क्या तुम मुझे भी सिखा सकते हो!

साधू ने शांत भाव से कहा- इसे तुम कभी नहीं समझ पाओगे, तुम सिर्फ पढ़ते रहो, यह तुम्हारी समझ से कई जन्मों दूर है|

ऐसा सुनके आचार्य को अपनी भूल का एहसास हो गया, उन्होंने साधू के पैर पकड़ के उनसे माफ़ी मांगी और कभी भी अपने ज्ञान को दूसरों से श्रेष्ठ ना समझने की प्रतिज्ञा ली, फिर साधू की खूब सेवा-आदर करके उन्हें अपने आश्रम से विदा किया|

साधू ने वर्षों के तप से जो ज्ञान लिया था वो आचार्य को सिखाना संभव नहीं था, उन्होंने आचार्य के उज्जवल भविष्य के लिए आशीर्वाद दिया और आगे निकल पड़े|

प्रिय दोस्तों, हमारे जीवन में भी कई बार ऐसे क्षण आते हैं जब हम अपने ज्ञान को दूसरों की तुलना में अधिक समझ लेते हैं, हम सोचते हैं हमे जो आता है वो दूसरे को कभी नहीं आ सकता | जबकि ऐसा कुछ नहीं है, यह सिर्फ इंसानी अभिमान है | क्या पता दूसरे को जो आता हो वो हमें कभी ना आ पाए! ज्ञान असीमित है, उसकी परिभाषा चंद किताबें नहीं बता सकती, इसलिए कभी भी अपने ज्ञान के अभिमान की वजह से खुद को श्रेष्ठ ना मान के, दूसरों के ज्ञान को भी महत्व देना चाहिए, और एक जिज्ञासु की तरह सदैव सीखने को तत्पर रहना चाहिए| बदलतीसोच(badaltisoch.com) आपके ज्ञान के सागर की गहराई निरंतर बढ़ते रहने की कामना करती है|  धन्यवाद|




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