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वे लोग इज्जतमंद हैं



अरब देश में फैदयान नाम के एक मौलवी थे, वे जगह-जगह जाकर ज्ञान-धर्म का प्रचार करते थे | बड़े ही धार्मिक और नेकदिल थे, अपने काम के बदले कुछ भी मेहनताना नहीं लेते थे, जो भी अपनी इच्छा से कुछ दे देता उसे अपने नीतिगत नियमों को ध्यान में रखकर स्वीकार करते थे |

एक दिन किसी गाँव में धार्मिक सभा को सम्बोधित करने के बाद वे एक पेड़ के नीचे अपने शिष्यों के साथ बैठे थे, तभी वहाँ रहीमा नाम की दाई आयी |

दाई ने अपना परिचय दिया और एक कटोरा आगे बढ़ाकर निवेदन किया- मौलवी जी, मैं आप के लिये घर के बने पकवान लेकर आयी हूँ, आप इन्हें कबूल करें |

मौलवी फैदयान ने कहा- पाकीजा बानो(श्रेष्ठ स्त्री), मुझे अभी भूख नहीं है, मैंने थोड़ी देर पहले अपने शागिर्द(शिष्य) का लाया हुआ भोजन हजम कर लिया है, पेट पूरा भरा है |

मौलवी जी ने ऐसे भाव से कहा जैसे वे इस समय कुछ भी खाने में अक्षम थे |

दाई ने कहा- मौलवी जी, अबकी बार तो आपने भोजन कर लिया है, पर अगली बार मैं पहले से बताकर आऊँगी ताकि आप मेरे बने पकवान कबूल करें |

मौलवी जी ने मुस्कराकर सहमती जतायी |

दाई के चले जाने के बाद, एक शिष्य ने मौलवी जी से पूछा- मौलवी जी, वो दाई इतने प्यार से पकवान लेकर आयी थी, आपने कबूल क्यों नहीं किया? फिर आपने कुछ खाया भी तो नहीं है |

इस पर मौलवी जी ने समझाते हुए कहा- तुम्हारी बात वाजिब है; हकीम, दाईयों जैसे शरीफों(सज्जनों) से कुछ भी लेना मेरे गैरत(स्वाभिमान) के खिलाफ है, वे लोग इस दुनिया के दुःख-दर्द को अपनी आँखों से देखते हैं, ऊपर वाले की तरह लोगों की मदद का काम करते हैं, फिर अपना मेहनताना पाते हैं | मैं उनकी कमाई से कुछ भी कबूल नहीं सकता, वे लोग इज्जतमंद होते हैं |

इस तरह मौलवी जी ने अपने शिष्यों को लोगों का सम्मान करना सिखाया |


प्रिय दोस्तों, हमारे आस-पास भी कई ऐसे लोग हैं जो समाज हित का काम करके अपनी आजीविका कमा रहे हैं, ऐसे लोग समाज के दर्द-कष्ट को कम करने का काम करते हैं ; उनका सम्मान कीजिये, वे सम्मान-योग्य हैं | धन्यवाद|




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