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वासुदेव का भव्य स्वागत



यह कहानी महाभारत से ली गयी है| श्रीकृष्ण, कौरवों और पांडवों की संधि का विचार लेकर हस्तिनापुर की ओर रवाना हुए |

महाराज धृतराष्ट्र को जब यह ज्ञात हुआ कि वासुदेव हस्तिनापुर आने वाले हैं, तो उन्होंने उनके स्वागत के लिये भव्य तैयारियाँ शुरू कर दी | हस्तिनापुर में सबसे सुन्दर भवन दु:शासन का था, जिसे महाराज के आदेश पर वासुदेव के लिये खाली कर दिया गया और ऐसे भव्य तरीके से सजाया गया मानो सारी सुन्दरता उसी भवन में खिल उठी हो | दुर्योधन के मन में प्रेम नहीं था, पर वह अपने पिता की आज्ञा पालन करते हुए दिखावटी प्रसन्नता से श्रीकृष्ण के स्वागत में जुटा था |

द्वारकाधीश श्रीकृष्ण का रथ हस्तिनापुर पहुँचा; दुर्योधन और उसके भाईयों ने राजधानी के मुख्य द्वार पर आकर श्रीकृष्ण का स्वागत किया |

श्रीकृष्ण के लिए सजाये गये भवन के समीप पहुँचते ही दुर्योधन ने कहा- गोविन्द, आप इस सुन्दर भवन में पधारें, इसे अति महत्वपूर्ण रूप से आपके लिए सजाया गया है, आप यहाँ जलपान और विश्राम कीजिये |

श्रीकृष्ण बोले- दुर्योधन, तुम्हारे मनोहर स्वागत के लिये धन्यवाद ! परन्तु मैं यहाँ एक संधिदूत बनकर आया हूँ, और एक दूत का परम धर्म है कि जब तक उसका कार्य संपन्न नहीं हो जाता, तब तक वह दूसरे पक्ष के यहाँ कुछ भी ग्रहण नहीं करता |

ऐसा सुनकर दुर्योधन को बुरा लगा, फिर भी स्वयं के भावों को नियंत्रित करके पूछा- गोविन्द, आप हमारे सम्बन्धी भी हो, आप हमारा निवेदन क्यों नहीं स्वीकार रहे हैं ?

श्रीकृष्ण ने जवाब दिया- दुर्योधन, भूख से अत्यंत व्याकुल मनुष्य कहीं भी भोजन कर सकता है, परन्तु जिसे भूख ना हो, वह भोजन तभी स्वीकार करता है जब सामने वाले के ह्रदय में उसके प्रति प्रेम हो | भूख से मैं व्याकुल नहीं हूँ और तुम्हारे ह्रदय में मुझे अपने लिए प्रेम नजर नहीं आ रहा है |

ऐसा कहकर द्वारकानाथ का रथ राजभवन की तरफ मुड़ गया, दु:शासन का भवन जिसे भव्य रूप से सजाया गया था, उसकी तरफ उन्होंने देखा तक नहीं |


प्रिय दोस्तों, भूख न होने पर उसी जगह भोजन किया जाता है जहाँ से प्रेम मिलता है | खासकर भगवान प्रेम के भूखे हैं, वे किसी सांसारिक सुख के भूखे नहीं होते हैं | धन्यवाद|




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