कश्मीर के पहाड़ी गाँव में पश्मीना प्रजाति की एक भेड़ रहती थी, उसके पूरे शरीर में नर्म-मुलायम लम्बे खूबसूरत सफ़ेद बाल थे, जिस वजह से वह भेड़ बेहद आकर्षक लगती थी |

एक दिन घास चरते-चरते वह भेड़ जंगल में पहुँच गयी | तभी कुछ शिकारियों का दल उस जंगल से गुजर रहा था | जैसे ही उन शिकारियों की नजर उस पश्मीना भेड़ पर पड़ी, वे उसके खूबसूरत नरम सफ़ेद बाल और खाल को पाने के लिए उत्सुक हो गये |

भेड़ को जब खतरा लगा, वह गाँव की तरफ भागने के बजाय जंगल की तरफ भागने लगी | शिकारियों ने उसका पीछा करना शुरू कर दिया |

भेड़ भागते-भागते, एक घनी झाड़ी के पीछे छुप गयी |

थोड़ी देर में शिकारी भी उसका पीछा करते हुए वहाँ आ पहुँचे, पर वे झाड़ी के पीछे छुपी भेड़ को देख नहीं पा रहे थे | काफी देर तक भेड़ को खोजने के बाद, वे आगे बढ़ गये |

उनके जाने के बाद, भेड़ अपनी होशियारी पर बड़ी प्रसन्न हुई | इस ख़ुशी में भेड़ ने उस घनी झाड़ी के पत्तों को चबाना शुरू कर दिया | कुछ ही देर में, वह काफी झाड़ी खा गयी |

उधर शिकारी उसे खोजते हुए, वापस उसी जगह पहुँच गये | भेड़ फिर से झाड़ी के पीछे छुप गयी, लेकिन अबकी बार झाड़ी घनी नहीं थी | शिकारियों ने भेड़ को देखकर, दबोच लिया |

भेड़ को अपने साथ ले जाते हुए, वे शिकारी आपस में बातें कर रहे थे- अगर यह भेड़ उस झाड़ी को नहीं खाती, तो हम इसे कभी पकड़ नहीं पाते | अपने रक्षाकवच को यह खुद ही चबा गयी |

यह सुनकर भेड़ को बड़ा दुःख हुआ, उसने खुद ही अपने बुरे वक़्त का सहारा मिटा दिया, जिस वजह से उसकी ऐसी दुर्गति हुई |


प्रिय दोस्तों, अच्छा वक़्त आने पर उन चीजों या मित्रों के साथ बुरा बर्ताव नहीं करना चाहिए, जो आपके बुरे वक़्त में आपके साथ थे, क्योंकि वक़्त फिर बदल जायेगा | अगर आप बुरे वक़्त के सच्चे साथियों को ही खो दोगे, तो फिर बुरे वक़्त में आपकी दुर्गति निश्चित है | धन्यवाद|



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एक प्रसिद्ध बाबा थे, उनके भक्तिमय जीवन की बड़ी ख्याति थी, वे प्रतिदिन जप-ध्यान वगैरह करके अपने भक्तों को प्रवचन देते थे | उनके लाखों अनुयायी और भक्त देश-दुनिया में फैले हुए थे, वे सभी भक्त बाबा की सेवा में सदैव तत्पर रहते थे | भक्तों की अटूट सेवा से बाबा ने पूरा जीवन बड़े आराम से गुजारा |

जब बाबा की मृत्यु हो गयी, बाबा की आत्मा स्वर्ग के द्वार पर पहुँची | द्वार पर देवदूत, मृत लोगों से उनके शुभ-अशुभ कर्मों का ब्यौरा माँग रहे थे | बड़ी देर बाद बाबा की बारी आयी, देवदूत ने पूछा- तुम बताओ, तुमने अपने जीवन में क्या अच्छे काम किये ? ऐसे काम बताओ जिनका तुमको पुण्य मिलेगा |

देवदूत की बात सुनकर, बाबा ने ख़ुश होकर कहा- मेरा सारा जीवन प्रभु भक्ति में बीता है, मैंने सात बार सभी तीर्थों की यात्रा करी है |

देवदूत बोले- तुम अपनी तीर्थयात्रा का जिक्र हमेशा अपने प्रवचन में करते रहते थे, उन तीर्थयात्रा का बखान सुन-सुनकर तुम्हारे अनुयायियों ने धरती में तुम्हारा जीवन सुखमय बना दिया था, इसलिए यहाँ तुम्हें उन तीर्थयात्रा का कोई पुण्य नहीं मिलेगा, उन तीर्थयात्रा का पुण्य तुम धरती में भोग चुके हो | कोई अन्य पुण्य काम किया हो तो बताओ ?

देवदूत की बात सुनकर बाबा गंभीर सोच में पड़ गये, उन्होंने थोड़ा सोचकर कहा- मैं प्रतिदिन भगवान का ध्यान करता था, प्रभु भक्ति में लीन रहता था |

इस बात पर देवदूत ने कहा- तुम्हारी प्रभु भक्ति भी एक दिखावा थी, जो तुम अपने भक्तों और अनुयायियों को दिखाने के लिए करते थे | जब भी तुम्हारे अनुयायी आस-पास होते, तुम जप-ध्यान करने लगते, इसलिए इसका पुण्य भी नहीं मिलेगा |

यह सुनने के बाद, बाबा गर्दन झुकाए चुपचाप खड़े रहे |

देवदूत ने फिर पूछा- तुम कोई अन्य पुण्य कर्म बताओ ?

बाबा को कोई ऐसा काम याद नहीं आया, जो वो बता सकें, फिर उन्होंने कहा- मेरे लाखों भक्त मुझे पूजते थे, सदैव मेरी सेवा में तत्पर रहते थे |

देवदूत ने कहा- यहाँ ये सब नहीं देखा जाता कि किसके कितने अनुयायी और भक्त थे, यहाँ कर्मों का हिसाब देखा जाता है | तुमने कुछ पुण्य कर्म नहीं किया, झूठे दिखावे से लाखों लोगों को बेवकूफ बना के मजे से अपना जीवन जिया है, इसलिए तुम पाप के भागी हो |

ऐसा कहकर देवदूत ने बाबा को उनके झूठे आडम्बरों की सजा दी |

प्रिय दोस्तों, अपने नित्य कर्मों को पूरी ईमानदारी और लगन से करिये, वही पुण्य कर्म हैं, दिखावटी पूजा-पाठ करना पुण्य कर्म नहीं है | दिखावटी पूजा-पाठ और आडम्बर करने वालों से दूर रहना चाहिए, ऐसे लोग अपने समय के साथ दूसरों की समय-ऊर्जा भी बर्बाद करते हैं | धन्यवाद|



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गुरु श्यामाधर अपने आश्रम के बाहर बैठकर अपने शिष्यों को ज्ञान दे रहे थे |

तभी उनके एक शिष्य ने पूछा- गुरूजी, प्रेम का हमारे जीवन में क्या महत्व है ? क्या प्रेम को मापा जा सकता है ?

गुरु श्यामाधर उसकी बात सुनकर चुप रहे और अपना ज्ञान पूरा करने लगे |

वह शिष्य कुछ पल तक जवाब की प्रतीक्षा में खड़ा रहा, फिर अपने स्थान पर बैठने लगा, तभी गुरु ने उससे पूछा- तुमने अपने गले में क्या पहना है ?

शिष्य ने कहा- यह मोतियों की माला है, मेरी माँ की निशानी है | अपने जीवन के अंतिम समय में उन्होंने मुझे यह माला बड़े प्यार से दी थी, इसे मैं हमेशा पहने रखता हूँ |

यह सुनकर, गुरु ने शिष्य से वह माला माँगी |

शिष्य ने बिना कुछ सोचे, वह माला अपने गले से उतारकर गुरु को दे दी |

गुरु ने तुरंत ही वह माला दूर फेंक दी |

सब शिष्य यह देख बड़ा अचंभित हो गये, और वह शिष्य आश्चर्य में चिल्लाया- यह आपने क्या कर दिया ? अब मुझे उस माला को ढूँढने जाना होगा, वह मेरे लिए बेशकीमती है | सब कुछ छोड़कर, अब मुझे उस माला को किसी भी कीमत पर ढूँढना होगा |

गुरु ने शांत भाव से समझाते हुए कहा- वह माला तुम्हे मिल जायेगी और साथ में तुम्हारे सवाल का जवाब भी मिल जायेगा | जैसे अपनी माँ की दी हुई माला तुम्हारे लिए बेशकीमती है, वैसे ही प्रेम का हमारे जीवन में बहुमूल्य स्थान है | अपनी माँ की दी हुई माला को खोने के डर से तुम परेशान हो गये, ऐसे ही प्रेम हमारे जीवन में नहीं रहेगा, तो हमारा जीना मुश्किल हो जायेगा | प्रेम ही है जिससे जीवन चल रहा है, अतः प्रेम बेशकीमती है |

प्रिय दोस्तों, भले ही आधुनिक युग में हर चीज की तुलना की जा सकती है, पर एक प्रेम ही ऐसा है जो अतुलनीय है | प्रेम की कीमत या महत्व को मापा नहीं जा सकता, उसको मापने का कोई पैमाना नहीं है, प्रेम है तो जीवन है | धन्यवाद|



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केरल के समुद्र तट पर रहने वाले एक ब्राह्मण के घर रोज एक कौआ आता था | ब्राह्मण के घर जो भी बचा-कुचा भोजन होता, वह कौए को खिला देता | इस तरह कौआ मजे से दिन गुजार रहा था |

एक सुबह ब्राह्मण के घर में आसमान से एक हंस उतरा | ब्राह्मण और उसकी पत्नी, हंस को देख बड़ा प्रसन्न हुए और हंस की खातिरदारी में जुट गये, हंस के लिए तरह-तरह के पकवान बनाने लगे |

हंस की इतनी आवभगत देख, कौए को ईर्ष्या होने लगी | वह हंस के पास आकर सुनाते हुए बोला- ये लोग बेकार ही तुम्हारी इतनी सेवा कर रहे हैं, तुम मुझसे उड़ान में जीत के दिखाओ तो मानूं !

हंस ने समझाया- भैया, मेरे साथ प्रतियोगिता करने से तुम्हारा कोई फायदा नहीं होगा | मैं यहाँ पर थोड़ी देर रुकूँगा फिर अपने गंतव्य की ओर चल पडूँगा |

कौए ने शेखी बघारते हुए कहा- मैं उड़ने में पारंगत हूँ, उड़ने की मुझे सैकड़ों विधियाँ आती हैं, तुम मेरे सामर्थ्य के सामने नहीं टिक पाओगे |

हंस ने फिर समझाया- भैया, मैं मीलों दूर तक उड़ने वाला पक्षी हूँ, मुझे अभी बहुत दूर जाना है, तुमसे प्रतियोगिता करके मैं अपना समय खराब नहीं करना चाहता |

कौए ने मजाक बनाकर कहा- बड़ी-बड़ी बातें करने से कुछ नहीं होता, मेरे से हारने का डर लग रहा है इसलिए तुम मुझे बातों में हराना चाहते हो |

हंस को अपना उपहास सहन नहीं हुआ, हंस ने कहा- मैं सागर को पार करके दूसरे देश जा रहा हूँ, जो वहाँ पहले पहुँचेगा वही जीतेगा |

इसके बाद, हंस और कौआ समुद्र की ओर उड़ पड़े |

समुद्र के ऊपर कौआ पूरे जोश के साथ तरह-तरह की कलाबाजियाँ करता हुआ उड़ रहा था, तेज-तेज उड़ने के कारण कौआ हंस से काफी आगे निकल गया | उधर हंस अपनी सामान्य गति से उड़ रहा था |

थोड़ी देर बाद, कौए की शक्ति क्षीण होने लगी, उसे विश्राम करने के लिए किसी जमीन या पेड़ की जरूरत महसूस हुई, परन्तु दूर-दूर तक पानी के अलावा कुछ नजर नहीं आ रहा था | हंस भी कौए के पास आ पहुँचा |

कौआ बेहद थका और समुद्र में गिरने की हालत में पहुँच चुका था, यह देखते हुए हंस ने पास आकर पूछा- अरे कौए ! तुम्हारा शरीर सागर में गिरने की अवस्था में लग रहा है, क्या तुम इसी विधि से उड़ते हो ?

कौए ने करुण भाव से कहा- हे महान हंस ! तुम्हारी खातिरदारी देख, मैं तुमसे जलने लगा था | तुम्हे नीचा दिखाने के लिए मैंने तुमसे उड़ने की प्रतियोगिता करनी चाही, मैं बेवकूफ था, कृपा करके मेरे प्राण बचा लो |

हंस को कौए पर दया आ गयी, उसने कौए को अपनी पीठ में बिठाया और ब्राह्मण के घर पर छोड़ दिया |


प्रिय दोस्तों, अपने को श्रेष्ठ दिखाने के चक्कर में जो झूठी डींगे मारते हैं, वो भ्रम में जीते हैं, इसलिए कभी भी अपने को श्रेष्ठ दिखाने के चक्कर में फालतू की शेखी नहीं बघारनी चाहिए, वरना मुँह की खानी पड़ती है | धन्यवाद|



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किसी जंगल में एक शिकारी युवक रहता था | वह रोज जंगली जानवरों का शिकार करता, फिर उनके मांस से अपना पेट भरता और उनकी हडि्डयों को शहर के किसी दलाल में चोरी-छुपे बेचकर अपनी आजीविका चलाता था |

एक दिन वह जंगल में पूरा दिन भटकता रहा, उसे कोई शिकार नहीं मिला | वह वापिस अपने निवास की ओर लौटने लगा, तभी उसे झाड़ी के पीछे एक तेंदुआ नजर आया |

शिकारी युवक ने तुरंत अपनी बंदूक तानकर, उस तेंदुए पर दो गोलियाँ चलाई | उसका निशाना एकदम सटीक था, दोनों गोली सीधा तेंदुए के पेट में जाकर लगी |

गोली लगने से घायल तेंदुआ भड़क उठा, उसने भी बड़ी फुर्ती से शिकारी युवक पर हमला करके अपने तीखे दाँतों से उसकी गर्दन नोच डाली | इससे शिकारी युवक की वहीं पर मौत हो गयी |

उधर गोली लगने से घायल तेंदुआ भी तड़प-तड़पकर मर गया | इस तरह शिकारी और शिकार दोनों ही आस-पास मरे पड़े थे |

कुछ देर बाद, वहाँ से एक लोमड़ी अपने बच्चे के साथ गुजरी | लोमड़ी का बच्चा बड़ा जिद्दी था, अपनी माँ की कोई बात नहीं मानता, हर समय वो काम करता जिस काम के लिए मना किया जाता | लोमड़ी अपने बच्चे को हमेशा समझाती रहती, पर वह बच्चा एक नहीं सुनता था |

लोमड़ी और उसके बच्चे ने जब शिकारी युवक और तेंदुए को मृत पड़ा देखा, तो उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा |

लोमड़ी ने अपने बच्चे से कहा- आज तो हमें बिना मेहनत के ही ढेर सारा भोजन मिल गया, लेकिन उस शिकारी युवक के हाथ में खतरनाक हथियार है, उसे बाद में आराम से खायेंगे, पहले तेंदुए को खाकर अपनी भूख शांत करते हैं |

लोमड़ी का बच्चा अपनी हरकत से बाज नहीं आया, और उछल-कूदकर उस शिकारी युवक के पास पहुँच गया | लोमड़ी ने काफी मना किया, पर वह नहीं माना |

अपनी जिद्दी आदत की वजह से उस लोमड़ी के बच्चे ने शिकारी युवक के हाथ की बंदूक का ट्रिगर दबा दिया, जिससे एक धाँय की आवाज आयी और गोली निकलकर सीधा उसकी माँ पर जा लगी, उसकी वहीं मौके पर मौत हो गयी |

इस तरह उस लोमड़ी के जिद्दी बच्चे को अनजान चीजों के प्रति जिद न करने की सीख तो जरूर मिली, पर तब तक काफी देर हो चुकी थी |


प्रिय दोस्तों, कई बार हम भी अनजान कार्यों और चीजों के प्रति तीव्र जिज्ञासा दिखाकर किसी की नहीं सुनते, उसकी हमें बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है | अतः अनजान जिज्ञासा के प्रति उत्सुकता दिखाने से पहले एक बार उस क्षेत्र के जानकारों और अपने बड़े-बुजुर्गों की राय पर जरूर गौर करना चाहिए | धन्यवाद|



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फ्रांस के राजा पेपिन के मंत्रिमंडल का राज्य-मंत्री वृद्ध हो रहा था, इसलिए एक नये राज्य-मंत्री की जरूरत महसूस हुई | राजा पेपिन ने राज्य-मंत्री की नियुक्ति हेतू एक प्रतियोगिता का आयोजन किया, जिसमें राज्य के सभी विद्वान युवकों ने भाग लिया, उनमें से तीन विद्वान युवक समान रूप सफल रहे |

राजा पेपिन को सिर्फ एक राज्य-मंत्री की जरूरत थी, इसलिए राजा ने तीनों विद्वानों के साथ तीन अलग-अलग दिन रात्रि-भोज करने की युक्ति निकाली, जिससे तीनों विद्वानों का निजी रूप से परीक्षण हो जायेगा और उचित राज्य-मंत्री का चुनाव होगा |

पहले दिन, पहले विद्वान के साथ भोज किया गया | भोज के सबसे आखिरी में राजदरबार की शाही खीर प्रस्तुत की गयी |

पहले विद्वान ने सारा भोज करने के बाद, सबसे आखिरी में बड़े चाव से खीर खायी; पूरे भोज के दौरान उसने कुछ बात नहीं करी |

राजा पेपिन ने भोज के अंत में पूछा- आज का शाही भोज ख़ासतौर पर तुम्हारे लिए बनवाया गया था, तुमको यह सब कैसा लगा?

पहले विद्वान ने थोड़ा सोचकर, गंभीर भाव से कहा- वो तो ठीक है, पर इस खीर में कमी रह गयी, ये देखो छोटा सा चावल का छिलका इसमें रह गया, जिसने सारा स्वाद खराब कर दिया |
इतना कहकर वह चुप हो गया |

दूसरे दिन, राजा ने दूसरे विद्वान के साथ वैसा ही भोज किया, अबकी बार राजा ने जानबूझकर खीर में चावल का छोटा सा छिलका रख दिया |

दूसरे विद्वान की तारीफें रुक नहीं रही थी, भोज के शुरू होने से लेकर और भोज के खत्म होने तक वह सिर्फ तारीफें करता रहा | उसने भी खीर खायी, लेकिन उसने चावल के छोटे से छिलके के विषय में कोई प्रतिक्रिया नहीं करी |

तीसरे दिन, राजा ने तीसरे विद्वान के साथ भी वैसा ही भोज किया, इस बार भी राजा ने जानबूझकर खीर में चावल का छोटा सा छिलका रख दिया |

तीसरे विद्वान ने पहले विद्वान की तरह शुरू से आखिरी तक कुछ नहीं कहा |

राजा ने भोज के अंत में उससे पूछा- तुमको भोज कैसा लगा?

तीसरे विद्वान ने कहा- महाराज, शाही भोज परम स्वादिष्ट था, पर इसमें एक कमी रह गयी, चावल का छोटा सा छिलका खीर में रह गया, जिसने शाही भोज के स्वाद को अंत में थोड़ा फीका कर दिया, लेकिन एक चावल के छिलके से हम सारे शाही भोज की गुणवत्ता को कम नहीं कर सकते |

फिर उसने राजा को अलग-अलग पकवान के गुण-दोष बताये और एक विधि बतायी जिस विधि से खीर बनाने पर खीर बेहद स्वादिष्ट बनती है |

चौथे दिन फैसले की घड़ी आ गई, राजा ने तीसरे विद्वान को राज्य-मंत्री के रूप में नियुक्त किया |

रानी, शुरू से अंत तक इस प्रतियोगिता में राजा के साथ थी | रानी ने राजा से पूछा- महाराज, आपने तीसरे विद्वान को राज्य-मंत्री क्यों बनाया? जबकि चावल का छिलका तो पहले विद्वान ने भी महसूस कर लिया था |

राजा ने समझाया- पहला विद्वान नुक्ताचीनी आलोचक है, वह सिर्फ नुक्ताचीनी करता है | वह अच्छाइयों को नजरअंदाज करता है, सिर्फ कमियाँ ढूँढता है और उन कमियों का समाधान भी नहीं करता | ऐसे नुक्ताचीनी आलोचक से राज्य का भला नहीं होगा |
दूसरा विद्वान चापलूस है, उसे अपना उल्लू सीधा करना है | वह कमियों को दबा देता है, अच्छाइयों का ज्यादा ही गुणगान करता है | ऐसा चापलूस भी राज्य का भला नहीं कर सकता |
तीसरा विद्वान समीक्षक है, वह कमियाँ भी देखता है, अच्छाइयाँ भी देखता है | अच्छाइयों को और अच्छा बनाने की बात करता है, कमियों को सुधारने की बात करता है, उसके पास कमियों के समाधान हैं | ऐसा शुद्ध समीक्षक ही राज्य का भला कर सकता है |

प्रिय दोस्तों, हमारे आसपास नुक्ताचीनी आलोचक, चापलूस और समीक्षक मौजूद रहते हैं | कृपया अपनी मित्रमंडली और निकटतम लोगों में समीक्षकों को ही जगह दीजिये, क्योंकि नुक्ताचीनी आलोचक और चापलूसों से कभी किसी का भला नहीं हुआ है | आने वाली पीढ़ी को समीक्षक बनाइये, तभी देश-समाज-परिवार-स्वयं की उन्नति होगी | धन्यवाद|



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रामकृष्ण परमहंस महान संत और विचारक थे, ईश्वर की प्राप्ति के लिए उन्होंने कठोर साधनामय जीवन बिताया | वे सर्वधर्म उपासक थे और माँ काली के भक्त थे, कहते हैं माँ काली ने उन्हें दर्शन भी दिए थे |

एक बार, संत परमहंस के आश्रम के बगल वाले गाँव में भयंकर महामारी और अकाल फ़ैल गया |

उन्ही दिनों नरेन्द्र नामक शिष्य हिमालय में जाकर ईश्वरीय तत्व की तपस्या करना चाहता था, इस वजह से वह अपने गुरु संत परमहंस से आज्ञा लेने आया, तो संत परमहंस ने कहा- पुत्र, हमारे आसपास के लोग भूख से तड़प रहे हैं, बीमारी और भुखमरी की पीड़ा चारों ओर फ़ैल रही है, समाज अस्त-व्यस्त है और इस स्थिति में तुम हिमालय की किसी एकांत गुफा में ध्यानमग्न होकर साधना में लीन रहोगे, जबकि समाज और आश्रम के सहकर्मियों को तुम्हारी जरुरत है |

बालक नरेन्द्र भी दृढ़-इच्छा से आया था, उसने क्षमा भाव से कहा- गुरुदेव, मैं साधना से अर्जित ज्ञान को समूचे विश्व में बाँटना चाहता हूँ, इसलिए मुझे ज्ञानार्जन के लिए साधना करने जाना ही होगा, मुझे आशीर्वाद देकर आज्ञा दीजिये |

संत परमहंस बालक नरेन्द्र को रोकना नहीं चाहते थे, वे जानते थे नरेन्द्र का उद्देश्य राष्ट्रहित है; लेकिन उस समय आश्रम और गाँव को नरेन्द्र की ज्यादा जरूरत थी, फिर भी उन्होंने अपने परम शिष्य नरेन्द्र को आशीर्वाद देकर जाने दिया |

बालक नरेन्द्र जैसे ही आश्रम से बाहर निकला ; आकाश में घनघोर बादल छा गये, बिजली चमकने लगी, तेज हवा के साथ मूसलाधार बारिश शुरू हो गयी, इतनी भयंकर बारिश कि नरेन्द्र के लिए आगे बढ़ना मुश्किल हो गया |

बालक नरेन्द्र वापस आया और बोला- गुरुदेव, आपने यह क्या कर दिया !

संत परमहंस ने शांत भाव से कहा- मैं तुम्हे रोकना नहीं चाहता था, पर तुम्हे रोकना भी जरूरी था | दो अत्यंत जरूरी काम में से पहले वह काम करना चाहिए जिसकी तत्काल जरूरत है | तुम्हारा उद्देश्य विश्व कल्याण है, लेकिन इस समय गाँव वालों को हमारी सख्त जरूरत है, इसलिए मैंने भगवान से प्रार्थना की और भगवान ने तुम्हे रुकने का सन्देश अपने आप भिजवा दिया |

तब बालक नरेन्द्र ने कुछ दिन आश्रम में रूककर, अपने आश्रम बंधुओं के संग बीमारों की सेवा करी | यही बालक नरेन्द्र आगे चलकर स्वामी विवेकानन्द के रूप में जग प्रसिद्ध हुए |

प्रिय दोस्तों, शुद्ध ह्रदय और निष्कपट मन से प्रभु-प्रार्थना की जाए, तो प्रभु कोई ना कोई रास्ता जरूर दिखलाते हैं | दूसरी बात, बड़े उद्देश्य की पूर्ति के लिए छोटे जरूरी कामों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए | धन्यवाद|



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इरविंग क्हान (Irving Kahn) एक अमेरिकी व्यापारी और निवेशक थे | इरविंग ने अपना कैरियर 1928 में शुरू किया और अपने 109 वर्ष के जीवनकाल के अंतिम दिन 24 फरवरी 2015 तक कार्य करते रहे |

अपने जीवन के अंतिम दिनों में भी वो हफ्ते के तीन दिन नियमित रूप से ऑफिस जाते और अपनी कंपनी क्हान ब्रदर्स ग्रुप का कार्यभार देखते |

बात इरविंग क्हान के 109वें जन्मदिन की है, इरविंग अपना 109वाँ जन्मदिन मना रहे थे | उनके ऑफिस में “पीटर” नाम का एक युवा कर्मचारी जो कि नया-नया आया था, ने अपने सहकर्मी से पूछा- इरविंग सर इतनी लम्बी उम्र तक भी काम कैसे कर पा रहे हैं ?

सहकर्मी ने कहा- सर कहते हैं, उनको अपनी उम्र का पता नहीं है, इसलिये वो कभी बूढ़े नहीं होते |
पीटर को समझ नहीं आया, तब सहकर्मी ने सुझाव दिया- यह सवाल तुम इरविंग सर से पूछना, वो तुम्हें अच्छे से समझा देंगे |

ऑफिस के कर्मचारी एक-एक करके इरविंग सर को तोहफे भेंट कर रहे थे |

पीटर ने अपना तोहफा भेंट करते समय कहा- सर, आपको जन्मदिन की ढेरों बधाई ! लेकिन एक सवाल मेरे मन में बार-बार आ रहा है, जिसका जवाब आपके अलावा यहाँ पर कोई नहीं दे सकता |

इरविंग क्हान ने मुस्कराकर हामी भरी |

पीटर ने पूछा- सर, आप 109 साल के हो गये हो | इतने बुढ़ापे में भी काम के प्रति इतना समर्पित कैसे हो ? आपकी उम्र के लोग पहले तो इस धरती पर मिलेंगे नहीं, और मिलेंगे, तो वे सिर्फ आराम करना ही पसंद करेंगे | इन सब के पीछे का राज क्या है ?

इरविंग क्हान ने मुस्कराकर कहा- बेटा, किसने कहा मैं बूढ़ा हो गया ! मैं अभी युवा हूँ, मेरे अन्दर आज भी वही जोश-जूनून है, जो इस कंपनी को शुरू करते समय था | यह जन्मदिन तो ख़ुशी मनाने का एक बहाना है, इन्सान की उम्र उसकी इच्छाशक्ति पर निर्भर करती है | अगर आपके पास हमेशा कुछ नया करने की इच्छाशक्ति होगी तो आप हमेशा कर्म के प्रति समर्पित रहोगे; अगर कुछ नया करने की इच्छाशक्ति नहीं होगी, तब आप युवा होकर भी बूढ़े बन जाओगे |

पीटर को समझ आ गया, अगर युवा बने रहना है, तो सदैव अपनी इच्छाशक्ति को जीवित रखना होगा |

इरविंग क्हान हमेशा अपने सहकर्मियों और कर्मचारियों के लिए प्रेरणास्रोत बने रहे |


प्रिय दोस्तों, सदैव कुछ नया करने की इच्छा आपको हमेशा युवा बनाये रखती है, आपका दिमाग रचनात्मक बना रहता है, इसलिए हमेशा कुछ नया करने की रचनात्मकता को बनाये रखो, फिर आप अपने जीवन से ऊबोगे नहीं और ना ही कभी बुढ़ापा आएगा | धन्यवाद|



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