A+ A-

कौए की जलन



केरल के समुद्र तट पर रहने वाले एक ब्राह्मण के घर रोज एक कौआ आता था | ब्राह्मण के घर जो भी बचा-कुचा भोजन होता, वह कौए को खिला देता | इस तरह कौआ मजे से दिन गुजार रहा था |

एक सुबह ब्राह्मण के घर में आसमान से एक हंस उतरा | ब्राह्मण और उसकी पत्नी, हंस को देख बड़ा प्रसन्न हुए और हंस की खातिरदारी में जुट गये, हंस के लिए तरह-तरह के पकवान बनाने लगे |

हंस की इतनी आवभगत देख, कौए को ईर्ष्या होने लगी | वह हंस के पास आकर सुनाते हुए बोला- ये लोग बेकार ही तुम्हारी इतनी सेवा कर रहे हैं, तुम मुझसे उड़ान में जीत के दिखाओ तो मानूं !

हंस ने समझाया- भैया, मेरे साथ प्रतियोगिता करने से तुम्हारा कोई फायदा नहीं होगा | मैं यहाँ पर थोड़ी देर रुकूँगा फिर अपने गंतव्य की ओर चल पडूँगा |

कौए ने शेखी बघारते हुए कहा- मैं उड़ने में पारंगत हूँ, उड़ने की मुझे सैकड़ों विधियाँ आती हैं, तुम मेरे सामर्थ्य के सामने नहीं टिक पाओगे |

हंस ने फिर समझाया- भैया, मैं मीलों दूर तक उड़ने वाला पक्षी हूँ, मुझे अभी बहुत दूर जाना है, तुमसे प्रतियोगिता करके मैं अपना समय खराब नहीं करना चाहता |

कौए ने मजाक बनाकर कहा- बड़ी-बड़ी बातें करने से कुछ नहीं होता, मेरे से हारने का डर लग रहा है इसलिए तुम मुझे बातों में हराना चाहते हो |

हंस को अपना उपहास सहन नहीं हुआ, हंस ने कहा- मैं सागर को पार करके दूसरे देश जा रहा हूँ, जो वहाँ पहले पहुँचेगा वही जीतेगा |

इसके बाद, हंस और कौआ समुद्र की ओर उड़ पड़े |

समुद्र के ऊपर कौआ पूरे जोश के साथ तरह-तरह की कलाबाजियाँ करता हुआ उड़ रहा था, तेज-तेज उड़ने के कारण कौआ हंस से काफी आगे निकल गया | उधर हंस अपनी सामान्य गति से उड़ रहा था |

थोड़ी देर बाद, कौए की शक्ति क्षीण होने लगी, उसे विश्राम करने के लिए किसी जमीन या पेड़ की जरूरत महसूस हुई, परन्तु दूर-दूर तक पानी के अलावा कुछ नजर नहीं आ रहा था | हंस भी कौए के पास आ पहुँचा |

कौआ बेहद थका और समुद्र में गिरने की हालत में पहुँच चुका था, यह देखते हुए हंस ने पास आकर पूछा- अरे कौए ! तुम्हारा शरीर सागर में गिरने की अवस्था में लग रहा है, क्या तुम इसी विधि से उड़ते हो ?

कौए ने करुण भाव से कहा- हे महान हंस ! तुम्हारी खातिरदारी देख, मैं तुमसे जलने लगा था | तुम्हे नीचा दिखाने के लिए मैंने तुमसे उड़ने की प्रतियोगिता करनी चाही, मैं बेवकूफ था, कृपा करके मेरे प्राण बचा लो |

हंस को कौए पर दया आ गयी, उसने कौए को अपनी पीठ में बिठाया और ब्राह्मण के घर पर छोड़ दिया |


प्रिय दोस्तों, अपने को श्रेष्ठ दिखाने के चक्कर में जो झूठी डींगे मारते हैं, वो भ्रम में जीते हैं, इसलिए कभी भी अपने को श्रेष्ठ दिखाने के चक्कर में फालतू की शेखी नहीं बघारनी चाहिए, वरना मुँह की खानी पड़ती है | धन्यवाद|



जरुर पढ़ें :