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बंदरी की शिक्षा



छोटे बंदरों का लालन-पालन उनकी माँ करती है, पेड़ पर चढ़ना-उतरना और एक पेड़ से दूसरे पेड़ में कूदने-फाँदने की शिक्षा भी उन्हीं की माँ देती है |

ऐसे ही एक ‘भूरी‘ नाम की बंदरी थी, उसका एक बेटा था, उसके थोड़ा बड़े होने पर भूरी बंदरी उसे पेड़ों पर चढ़ने-उतरने की शिक्षा देने लगी, फिर एक दिन उसने अपने बच्चे से कहा- आज तेरी शिक्षा का आखिरी दिन है, यूं समझ यह परीक्षा की घड़ी है; इसके बाद तू स्वयं परिपक्व हो जायेगा, अपना भोजन स्वयं ढूँढेगा और आगे का जीवन अपनी इच्छा से जियेगा | आज तुझे इस लम्बे पेड़ की सबसे ऊपरी शाखा तक चढ़कर, नीचे उतरना है |

बच्चा तेजी से पेड़ पर चढ़ने लगा और पल भर में सबसे ऊपरी शाखा तक पहुँच गया, फिर वह उसी तेजी से नीचे उतरने लगा, जब वह आधा उतर गया तभी उसकी माँ ने उसे सचेत किया- बेटा, आराम-आराम से देखभाल कर आना, पेड़ पर बहुत काई जमी है, फिसलने का डर है |

वह बच्चा धीरे से संभलकर नीचे उतर आया |

नीचे उतरने के बाद उसने अपनी माँ से पूछा- माँ, इतने ऊँचे पेड़ में जब मैं ऊपर चढ़ रहा था, तब तुमने कुछ नहीं बोला; पर जब मैं नीचे उतर रहा था, तब आधे में पहुँचते ही तुमने आराम-आराम से उतरने को क्यों कहा ? जब पेड़ पर चढ़ गया तो उतर भी जाता ही |

भूरी बंदरी ने कहा- बेटा, तू जानता था इस चिकने पेड़ पर उतनी ऊँचाई तक चढ़ना कठिन काम है, इसलिये ऊपर जाते समय तू खुद ही सावधान था; पर जब तू नीचे उतरने लगा, तो कहीं तू अति-आत्मविश्वास में आकर फिसल ना जाये, यही सोच के मैंने तुझे सचेत किया | मंजिल के करीब होने पर अति-आत्मविश्वास में आकर गलती होने की आशंका बढ़ जाती है |


प्रिय दोस्तों, आत्मविश्वास हमें मंजिल तक पहुँचाने में मददगार होता है, लेकिन जरा सा भी अति-आत्मविश्वास हमें मंजिल से पहले ही फिसला कर गिरा सकता है, इसलिये अति-आत्मविश्वास से दूरी बनाये रखें | धन्यवाद|



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