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भटकता हुआ कस्तूरी मृग



रामदयाल शुद्ध व्यापारी थे, हर समय मुनाफा-नुकसान का ही सोचते थे, जिस काम में उन्हें फायदा नजर आता उसी काम को किया करते; लेकिन उनका बेटा ब्रजदयाल एकदम उलट था, बचपन से ही उसे प्रभुभक्ति और पूजा-पाठ में रुचि थी, हर समय ईश्वर की आराधना और खोज में लगा रहता था |

यही सब बातें रामदयाल की चिंता का विषय थी, इतना बड़ा व्यापार और बेटा वैरागी बना बैठा था | कितना समझाया, कितना मनाया, सभी सुख-सुविधाओं का लोभ दिखाया, पर ब्रजदयाल का ह्रदय सांसारिक सुखों से अलग ही भागता था, वह परिवार की जिम्मेदारियों को त्यागकर कहीं एकांतवाश में जाना चाहता था |

जैसे ही ब्रजदयाल युवा हुआ, रामदयाल ने यह सोचकर उसकी शादी कर दी कि कहीं जवान बेटा घर-परिवार का त्याग करके सन्यासी न बन जाये |

शहर के सबसे बड़े रईस की खूबसूरत बेटी से ब्रजदयाल की शादी हो गयी, लेकिन ब्रजदयाल का मन फिर भी कहीं भागता रहता था |

एक रात अपनी सभी जिम्मेदारियों को त्यागकर, ब्रजदयाल घर-बार सब छोड़ के चला गया | उसने सभी तीर्थों की यात्रा करी, मंदिरों-घाटों में प्रभु की आराधना करी; ईश्वर की चाह में वह जगह-जगह गया, पर ईश्वर कहीं नहीं मिले, हर जगह सांसारिक बातें ही नजर आ रही थी |

उसने तप करने का मन बना लिया और वह हिमालय के घने वन में चला गया | हिमालय के घनघोर वन में पहुँचकर एक कस्तूरी मृग दिखा, वो उस कस्तूरी मृग को बड़े ध्यान से देखने लगा |

कस्तूरी मृग की नाभि के पास एक ग्रंथि होती है जिससे बहुत ही तीव्र सुगंध निकलती रहती है, पर कस्तूरी मृग इस बात से अनजान इधर-उधर उस सुगंध की तलाश करता रहता है; जगह-जगह जाता, हर फूल-पत्ती को सूंघता, मगर वह सुगंध नहीं मिल पाती जो उसकी नाभि से आती है, उस सुगंध की तलाश में वो अपना सारा जीवन लगा देता है, हासिल कुछ नहीं होता |

ब्रजदयाल ने मन ही मन सोचा- काश ! यह कस्तूरी हिरन एक बार शांत मन से खुद की ही आत्मा में ढूँढता, तो इसे इतना भटकना नहीं पड़ता, ऐसा करता हूँ मैं इसे बता कर आता हूँ |

ब्रजदयाल जैसे ही उसकी तरफ बढ़ा, कस्तूरी मृग किसी खतरे की आशंका में तेजी से भाग गया |

उस समय ब्रजदयाल को समझ में आ गया कि उसकी हालत भी कस्तूरी मृग जैसी ही है, वह भी ईश्वर की खोज में जगह-जगह भटक रहा है, जबकि ईश्वर उसके ही अन्दर है | अगर कभी कोई यह बात उसे बताता, तो वह कस्तूरी मृग की तरह और दूर भाग जाता था | अपने जीवन की जिम्मेदारियों से भागकर वह ऐसी चीज की तलाश में लगा है जो उसी के अन्दर समायी हुई है | उस दिन उसे अपनी गलती का अहसास हुआ, वह ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर वापस आ गया, फिर हमेशा अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाहण ईमानदारी और पूरी निष्ठा से करने लगा |

प्रिय दोस्तों, कई बार हमें भी ईश्वर की खोज करने की इच्छा होती है, तो ध्यान रहे ईश्वर हमारे सद्कर्मों में समाया है | आप नित्य प्रति अपने कर्मों को ईमानदारी और जनकल्याण की भावना से करिये, यह सब पूजा-पाठ से बढ़कर है, यही ईश्वर प्रिय है | धन्यवाद|



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