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राजदरबार की शाही खीर



फ्रांस के राजा पेपिन के मंत्रिमंडल का राज्य-मंत्री वृद्ध हो रहा था, इसलिए एक नये राज्य-मंत्री की जरूरत महसूस हुई | राजा पेपिन ने राज्य-मंत्री की नियुक्ति हेतू एक प्रतियोगिता का आयोजन किया, जिसमें राज्य के सभी विद्वान युवकों ने भाग लिया, उनमें से तीन विद्वान युवक समान रूप सफल रहे |

राजा पेपिन को सिर्फ एक राज्य-मंत्री की जरूरत थी, इसलिए राजा ने तीनों विद्वानों के साथ तीन अलग-अलग दिन रात्रि-भोज करने की युक्ति निकाली, जिससे तीनों विद्वानों का निजी रूप से परीक्षण हो जायेगा और उचित राज्य-मंत्री का चुनाव होगा |

पहले दिन, पहले विद्वान के साथ भोज किया गया | भोज के सबसे आखिरी में राजदरबार की शाही खीर प्रस्तुत की गयी |

पहले विद्वान ने सारा भोज करने के बाद, सबसे आखिरी में बड़े चाव से खीर खायी; पूरे भोज के दौरान उसने कुछ बात नहीं करी |

राजा पेपिन ने भोज के अंत में पूछा- आज का शाही भोज ख़ासतौर पर तुम्हारे लिए बनवाया गया था, तुमको यह सब कैसा लगा?

पहले विद्वान ने थोड़ा सोचकर, गंभीर भाव से कहा- वो तो ठीक है, पर इस खीर में कमी रह गयी, ये देखो छोटा सा चावल का छिलका इसमें रह गया, जिसने सारा स्वाद खराब कर दिया |
इतना कहकर वह चुप हो गया |

दूसरे दिन, राजा ने दूसरे विद्वान के साथ वैसा ही भोज किया, अबकी बार राजा ने जानबूझकर खीर में चावल का छोटा सा छिलका रख दिया |

दूसरे विद्वान की तारीफें रुक नहीं रही थी, भोज के शुरू होने से लेकर और भोज के खत्म होने तक वह सिर्फ तारीफें करता रहा | उसने भी खीर खायी, लेकिन उसने चावल के छोटे से छिलके के विषय में कोई प्रतिक्रिया नहीं करी |

तीसरे दिन, राजा ने तीसरे विद्वान के साथ भी वैसा ही भोज किया, इस बार भी राजा ने जानबूझकर खीर में चावल का छोटा सा छिलका रख दिया |

तीसरे विद्वान ने पहले विद्वान की तरह शुरू से आखिरी तक कुछ नहीं कहा |

राजा ने भोज के अंत में उससे पूछा- तुमको भोज कैसा लगा?

तीसरे विद्वान ने कहा- महाराज, शाही भोज परम स्वादिष्ट था, पर इसमें एक कमी रह गयी, चावल का छोटा सा छिलका खीर में रह गया, जिसने शाही भोज के स्वाद को अंत में थोड़ा फीका कर दिया, लेकिन एक चावल के छिलके से हम सारे शाही भोज की गुणवत्ता को कम नहीं कर सकते |

फिर उसने राजा को अलग-अलग पकवान के गुण-दोष बताये और एक विधि बतायी जिस विधि से खीर बनाने पर खीर बेहद स्वादिष्ट बनती है |

चौथे दिन फैसले की घड़ी आ गई, राजा ने तीसरे विद्वान को राज्य-मंत्री के रूप में नियुक्त किया |

रानी, शुरू से अंत तक इस प्रतियोगिता में राजा के साथ थी | रानी ने राजा से पूछा- महाराज, आपने तीसरे विद्वान को राज्य-मंत्री क्यों बनाया? जबकि चावल का छिलका तो पहले विद्वान ने भी महसूस कर लिया था |

राजा ने समझाया- पहला विद्वान नुक्ताचीनी आलोचक है, वह सिर्फ नुक्ताचीनी करता है | वह अच्छाइयों को नजरअंदाज करता है, सिर्फ कमियाँ ढूँढता है और उन कमियों का समाधान भी नहीं करता | ऐसे नुक्ताचीनी आलोचक से राज्य का भला नहीं होगा |
दूसरा विद्वान चापलूस है, उसे अपना उल्लू सीधा करना है | वह कमियों को दबा देता है, अच्छाइयों का ज्यादा ही गुणगान करता है | ऐसा चापलूस भी राज्य का भला नहीं कर सकता |
तीसरा विद्वान समीक्षक है, वह कमियाँ भी देखता है, अच्छाइयाँ भी देखता है | अच्छाइयों को और अच्छा बनाने की बात करता है, कमियों को सुधारने की बात करता है, उसके पास कमियों के समाधान हैं | ऐसा शुद्ध समीक्षक ही राज्य का भला कर सकता है |

प्रिय दोस्तों, हमारे आसपास नुक्ताचीनी आलोचक, चापलूस और समीक्षक मौजूद रहते हैं | कृपया अपनी मित्रमंडली और निकटतम लोगों में समीक्षकों को ही जगह दीजिये, क्योंकि नुक्ताचीनी आलोचक और चापलूसों से कभी किसी का भला नहीं हुआ है | आने वाली पीढ़ी को समीक्षक बनाइये, तभी देश-समाज-परिवार-स्वयं की उन्नति होगी | धन्यवाद|



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