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बेशकीमती माला



गुरु श्यामाधर अपने आश्रम के बाहर बैठकर अपने शिष्यों को ज्ञान दे रहे थे |

तभी उनके एक शिष्य ने पूछा- गुरूजी, प्रेम का हमारे जीवन में क्या महत्व है ? क्या प्रेम को मापा जा सकता है ?

गुरु श्यामाधर उसकी बात सुनकर चुप रहे और अपना ज्ञान पूरा करने लगे |

वह शिष्य कुछ पल तक जवाब की प्रतीक्षा में खड़ा रहा, फिर अपने स्थान पर बैठने लगा, तभी गुरु ने उससे पूछा- तुमने अपने गले में क्या पहना है ?

शिष्य ने कहा- यह मोतियों की माला है, मेरी माँ की निशानी है | अपने जीवन के अंतिम समय में उन्होंने मुझे यह माला बड़े प्यार से दी थी, इसे मैं हमेशा पहने रखता हूँ |

यह सुनकर, गुरु ने शिष्य से वह माला माँगी |

शिष्य ने बिना कुछ सोचे, वह माला अपने गले से उतारकर गुरु को दे दी |

गुरु ने तुरंत ही वह माला दूर फेंक दी |

सब शिष्य यह देख बड़ा अचंभित हो गये, और वह शिष्य आश्चर्य में चिल्लाया- यह आपने क्या कर दिया ? अब मुझे उस माला को ढूँढने जाना होगा, वह मेरे लिए बेशकीमती है | सब कुछ छोड़कर, अब मुझे उस माला को किसी भी कीमत पर ढूँढना होगा |

गुरु ने शांत भाव से समझाते हुए कहा- वह माला तुम्हे मिल जायेगी और साथ में तुम्हारे सवाल का जवाब भी मिल जायेगा | जैसे अपनी माँ की दी हुई माला तुम्हारे लिए बेशकीमती है, वैसे ही प्रेम का हमारे जीवन में बहुमूल्य स्थान है | अपनी माँ की दी हुई माला को खोने के डर से तुम परेशान हो गये, ऐसे ही प्रेम हमारे जीवन में नहीं रहेगा, तो हमारा जीना मुश्किल हो जायेगा | प्रेम ही है जिससे जीवन चल रहा है, अतः प्रेम बेशकीमती है |

प्रिय दोस्तों, भले ही आधुनिक युग में हर चीज की तुलना की जा सकती है, पर एक प्रेम ही ऐसा है जो अतुलनीय है | प्रेम की कीमत या महत्व को मापा नहीं जा सकता, उसको मापने का कोई पैमाना नहीं है, प्रेम है तो जीवन है | धन्यवाद|



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