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लकड़हारे की ताकत



एक लकड़हारा, लकड़ियाँ बेचने गाँव से दूर शहर जाता था, फिर जितना कमाता उसी में अपने परिवार का गुजारा करता था |

एक दिन उसके गाँव में सत्तर लुटेरों के एक गिरोह ने आक्रमण कर दिया, उस समय लकड़हारा शहर गया हुआ था | लुटेरों ने पूरा गाँव लूट लिया, जिन लोगों ने उनका विरोध किया, उन्होंने उन्हें मार दिया |

शाम को लकड़हारा जब घर आया, उसने अपनी बीवी और बेटे को मृत पाया | गाँव के एक बुजुर्ग ने जब सारा कांड सुनाया, तो लकड़हारे का शरीर दुःख और गुस्से से भर गया |

लकड़हारा अपनी बीवी और बेटे को बेहद प्यार करता था, उसने उन लुटेरों से प्रतिशोध लेने का संकल्प ले लिया |

उस रात उसने उन लुटेरों का पीछा किया और रातभर में सारे सत्तर लुटेरों का सिर अपनी कुल्हाड़ी से काट डाला, इस तरह सब लुटेरों को मारकर उसने अपना प्रतिशोध पूरा किया |

अगले दिन उसकी इस बहादुरी की खूब चर्चा होने लगी | राजा को जब यह बात पता चली कि एक सामान्य लकड़हारे ने सत्तर लुटेरों को अकेले दम पर मार डाला, तो उन्होंने उस लकड़हारे को अपने दरबार में बुलाकर खूब सम्मान किया |

राजा ने लकड़हारे से कहा- तुमने बहुत हिम्मत का काम किया है, तुम्हारी बहादुरी की चर्चा दूर-दूर तक है, क्यों ना तुम हमें अपनी बहादुरी का एक नमूना दिखाओ ! तुम जितने लोगों को धराशायी करोगे, तुम्हें उतना गुना इनाम मिलेगा |

राजा के आदेश पर एक आयोजन हुआ, जिसमें लकड़हारे को सत्तर लोगों से मुकाबला करना था | भीड़ जमा हो गयी, हर कोई लकड़हारे की ताकत देखने के लिए उत्सुक था | मुकाबला शुरू हुआ, पर यह क्या ! लकड़हारा तो आधे लोगों से भी मुकाबला नहीं कर पाया और हार मान ली |

राजा ने पूछा- अब क्या हुआ ?

लकड़हारे के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था, फिर उसने तबीयत खराब होने का बहाना बना के अपनी लाज रखी |

राजा ने लकड़हारे को उचित इनाम देकर विदा किया, फिर राजा ने अपने मंत्री से पूछा- लकड़हारा अब आधे लोगों से भी क्यों नहीं भिड़ पाया ? मुझे तो उसकी तबीयत ठीक लग रही थी, कहीं ऐसा तो नहीं कि उसने सत्तर लुटेरों को मारा ही नहीं था और झूठी प्रशंसा बटोर रहा था |

मंत्री ने समझाया- महाराज, लकड़हारे ने ही लुटेरों को मारा होगा, लुटेरों को मारते समय लकड़हारे के सिर पर प्रतिशोध सवार था, उसे सिर्फ मारना था, उन कठिन परिस्थितियों में उसकी ताकत बढ़ गयी थी; जबकि अब उसे इनाम के लिए लड़ना था, यह इनाम उसके लिए इतना मायने नहीं रखता, क्योंकि इनाम में मिले रुपये खर्च करने के लिए उसके पास परिवार नहीं है, सो उसने अब जान जोखिम में डालना उचित नहीं समझा |

प्रिय दोस्तों, कभी-कभी विपरीत परिस्थितियों में हमारी क्षमता कई गुना बढ़ जाती है, तब असंभव सा प्रतीत होने वाला काम भी आसानी से हो जाता है, भले ही बाद में हम उसका आधा भी ना कर पायें | ध्यान रहे, विपरीत परिस्थितियों में जो अपने हौसले को बढ़ा देते हैं, वही कुछ कर-गुजर जाते हैं | धन्यवाद|



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