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रामकृष्ण परमहंस की प्रार्थना



रामकृष्ण परमहंस महान संत और विचारक थे, ईश्वर की प्राप्ति के लिए उन्होंने कठोर साधनामय जीवन बिताया | वे सर्वधर्म उपासक थे और माँ काली के भक्त थे, कहते हैं माँ काली ने उन्हें दर्शन भी दिए थे |

एक बार, संत परमहंस के आश्रम के बगल वाले गाँव में भयंकर महामारी और अकाल फ़ैल गया |

उन्ही दिनों नरेन्द्र नामक शिष्य हिमालय में जाकर ईश्वरीय तत्व की तपस्या करना चाहता था, इस वजह से वह अपने गुरु संत परमहंस से आज्ञा लेने आया, तो संत परमहंस ने कहा- पुत्र, हमारे आसपास के लोग भूख से तड़प रहे हैं, बीमारी और भुखमरी की पीड़ा चारों ओर फ़ैल रही है, समाज अस्त-व्यस्त है और इस स्थिति में तुम हिमालय की किसी एकांत गुफा में ध्यानमग्न होकर साधना में लीन रहोगे, जबकि समाज और आश्रम के सहकर्मियों को तुम्हारी जरुरत है |

बालक नरेन्द्र भी दृढ़-इच्छा से आया था, उसने क्षमा भाव से कहा- गुरुदेव, मैं साधना से अर्जित ज्ञान को समूचे विश्व में बाँटना चाहता हूँ, इसलिए मुझे ज्ञानार्जन के लिए साधना करने जाना ही होगा, मुझे आशीर्वाद देकर आज्ञा दीजिये |

संत परमहंस बालक नरेन्द्र को रोकना नहीं चाहते थे, वे जानते थे नरेन्द्र का उद्देश्य राष्ट्रहित है; लेकिन उस समय आश्रम और गाँव को नरेन्द्र की ज्यादा जरूरत थी, फिर भी उन्होंने अपने परम शिष्य नरेन्द्र को आशीर्वाद देकर जाने दिया |

बालक नरेन्द्र जैसे ही आश्रम से बाहर निकला ; आकाश में घनघोर बादल छा गये, बिजली चमकने लगी, तेज हवा के साथ मूसलाधार बारिश शुरू हो गयी, इतनी भयंकर बारिश कि नरेन्द्र के लिए आगे बढ़ना मुश्किल हो गया |

बालक नरेन्द्र वापस आया और बोला- गुरुदेव, आपने यह क्या कर दिया !

संत परमहंस ने शांत भाव से कहा- मैं तुम्हे रोकना नहीं चाहता था, पर तुम्हे रोकना भी जरूरी था | दो अत्यंत जरूरी काम में से पहले वह काम करना चाहिए जिसकी तत्काल जरूरत है | तुम्हारा उद्देश्य विश्व कल्याण है, लेकिन इस समय गाँव वालों को हमारी सख्त जरूरत है, इसलिए मैंने भगवान से प्रार्थना की और भगवान ने तुम्हे रुकने का सन्देश अपने आप भिजवा दिया |

तब बालक नरेन्द्र ने कुछ दिन आश्रम में रूककर, अपने आश्रम बंधुओं के संग बीमारों की सेवा करी | यही बालक नरेन्द्र आगे चलकर स्वामी विवेकानन्द के रूप में जग प्रसिद्ध हुए |

प्रिय दोस्तों, शुद्ध ह्रदय और निष्कपट मन से प्रभु-प्रार्थना की जाए, तो प्रभु कोई ना कोई रास्ता जरूर दिखलाते हैं | दूसरी बात, बड़े उद्देश्य की पूर्ति के लिए छोटे जरूरी कामों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए | धन्यवाद|



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