एक बार एक भिखारी किसी नगर में भीख माँगने निकला | वह पहली बार इस नगर में आया था, इसलिए उसे यहाँ से अच्छी भीख मिलने की उम्मीद थी | वह नगर में सुबह से शाम तक भीख माँगता रहा, इस तरह उसे पर्याप्त अनाज मिल गया |

शाम को वह खुश होकर अपने घर लौट रहा था, तभी उसे राजा की सवारी आती हुयी दिखाई दी, वह भी राजा की सवारी देखने के लिए एक किनारे बैठ गया | जब राजा की सवारी उसके नजदीक आयी, तो वह यह देखकर आश्चर्यचकित रह गया कि राजा अपने रथ से उतरकर उसकी ओर आ रहे हैं |

राजा, भिखारी के पास आये और उसके सामने हाथ फैलाते हुए बोले- मुझे आपसे कुछ भीख चाहिए |

यह सुनकर भिखारी असमंजस में पड़ गया, वह मन ही मन सोचने लगा- जिसका पूरे राज्य पर हक़ है, जो अथाह संपत्ति का स्वामी है, वह एक भिखारी से भीख क्यों माँग रहा है ?

राजा ने भिखारी के मन की शंका का समाधान करते हुए कहा- दरअसल राज्य-ज्योतिषी ने बताया कि राज्य पर संकट आने वाला है | उन्होंने मुझे कहा कि आज मार्ग में जो पहला भिखारी मिलेगा, वह अपनी श्रद्धा से भीख में मुझे जो देगा, उसके चार टुकड़े करके राज्य के चारों कोनों में रखने से राज्य का संकट टल जायेगा |

राजा की बात सुनकर, भिखारी ने अपनी झोली में हाथ डाला और मुट्ठी भर अनाज निकालने लगा | तभी उसके मन में ख्याल आया- आज पर्याप्त अनाज मिला है, इसे भी राजा को दे दूँगा तो घर क्या ले जाउँगा !
यह सोचकर उसने अनाज के सिर्फ दो दाने निकालकर कहा- महाराज, मेरे पास इस समय अनाज के दो दाने ही बचे हैं |

राजा ने प्रसन्नतापूर्वक धन्यवाद भाव से कहा- आपका बहुत-बहुत धन्यवाद ! आपकी यह छोटी सी भीख भी राज्य की रक्षा के लिए पर्याप्त है |

फिर राजा ने अपने सिपाही की ओर इशारा किया, जिसने सोने के सिक्कों से भरे संदूक में से दो सिक्के निकालकर भिखारी के कटोरे में रख दिए | यह देखकर, भिखारी पुनः असमंजस में पड़ गया |

इस पर राजा ने कहा- राज्य-ज्योतिषी ने कहा था, पहले मिलने वाला भिखारी श्रद्धा से जितनी भी गिनती की चीजें दे, उसके बदले उसे उतनी ही सोने की मुहरें दे देना |

ऐसा कहकर, राजा ने अनाज के दो दानों के चार टुकड़े किये और अपने सिपाहियों के साथ राज्य के चारों कोनों की ओर चल पड़ा |

भिखारी अपनी बेवकूफी पर अफ़सोस करते हुए सोच रहा था- काश ! मैं राजा को अनाज देने में संकोच नहीं करता, तो आज मेरी जीवनभर की गरीबी मिट जाती | लेकिन अब अफ़सोस करने का कोई अर्थ नहीं था, वह सोने के दो सिक्कों को पकड़कर अपने घर की ओर चल पड़ा |

प्रिय दोस्तों, जनहित के कार्य में अपनी सामर्थ्य के अनुसार उदारतापूर्वक दान देने से उस दान के बदले किसी न किसी दीर्घ लाभ की प्राप्ति अवश्य होती है | अतः जनहित के कार्य में अपने सामर्थ्य के अनुसार दान अवश्य करना चाहिए | धन्यवाद|



जरुर पढ़ें :





एक बार एक शेर ने युवा होने पर अपने परिवार से कहा- अब मैं जवान और ताकतवर हो गया हूँ, इसलिए अब मैं अपना शिकार स्वयं पकडूँगा और उसे स्वयं खाऊँगा |

इस तरह वह युवा शेर अपने परिवार से अलग होकर रहने लगा |

एक दिन उस युवा शेर ने एक सुँअर का शिकार किया, और बड़े ही चाव से उसको खा रहा था | तभी वहाँ एक गीदड़ आया, जो शेर के शिकार को ललचाई नजरों से देखने लगा |

शेर ने गीदड़ की नजर अपने शिकार पर देखी, तो उसने गीदड़ को भगा दिया |

कुछ देर बाद वह गीदड़ अपने एक साथी गीदड़ को बुला लाया, और वे दोनों गीदड़ शेर के शिकार को ललचाई नजरों से देखने लगे |

शेर ने फिर से उन दोनों गीदड़ को अपनी ताकत से डराकर भगा दिया |

इस तरह यह क्रम कुछ देर तक चलता रहा ; शेर, गीदड़ों को भगाता और वे गीदड़ अपने साथ एक अन्य गीदड़ को ले आते |

देखते ही देखते, गीदड़ परिवार के काफी सारे गीदड़ जमा हो गये, उनकी तादाद इतनी ज्यादा हो गयी कि अब शेर का उनको डराकर भगाना संभव नहीं था |

फिर उन सब गीदड़ों ने मिलकर शेर को ही भगा दिया और मजे से शिकार को खाने लगे |

शेर एक किनारे बैठकर, उन गीदड़ों को अपना शिकार खाते देख रहा था, जिसे उसने बड़ी मेहनत से पकड़ा था | उस समय शेर को परिवार का महत्व समझ में आया, उसे अपनी गलती का अहसास हुआ और वह वापस अपने परिवार के पास चला गया |

प्रिय दोस्तों, परिवार की एकता ही आपकी असली ताकत है | अगर परिवार में एकता हो, तो कमजोर से कमजोर सदस्य भी बलशाली बन जाता है | एक अकेला ताकतवर शेर, गीदड़ों के परिवार की एकता के सामने नहीं टिक सकता | धन्यवाद|



जरुर पढ़ें :





दस वर्षीय एक लड़के को एक दिन उसके स्कूल के अध्यापक ने एक पत्र दिया और कहा- यह पत्र घर जाकर अपनी माँ को दे देना |

उस लड़के ने घर आकर, वह पत्र अपनी माँ को दिया | माँ ने जैसे ही वह पत्र पढ़ा, उनकी आँखों में आँसू आ गये और वह जोर-जोर से रो पड़ी | जब उस बच्चे ने अपनी माँ को रोते हुए देखा, तो उसने अपनी माँ से पूछा- माँ, इसमें ऐसा क्या लिखा है, जो तू रो रही है ?

माँ ने आँसू पोंछकर, हँसते हुए कहा- बेटा, इसमें लिखा है कि आपका बच्चा बहुत होनहार है, वह अपने सहपाठियों से काफी तेज है | हमारा स्कूल आपके बेटे के लिए बहुत छोटे स्तर का है और हमारे अध्यापक भी इतने प्रशिक्षित नहीं हैं, जो हम इसे अच्छे से पढ़ा सके, इसलिए आप इसे किसी अच्छे से स्कूल में दाखिला दिलाएं |

उस बात को कई वर्ष बीत गये, वह लड़का बहुत प्रसिद्ध आविष्कारक बन चुका था, पर उस लड़के की माँ का अब स्वर्गवास हो गया था |

एक दिन वह अपनी पुरानी यादगार वस्तुओं को देख रहा था, तभी उसे एक पत्र दिखा, जो उसकी माँ की फोटोओं के साथ रखा हुआ था | उसने उस पत्र को उत्सुकतावश खोलकर पढ़ा, पत्र को पढ़ते ही उसकी आँखों से आँसू निकल आये |

यह वही पत्र था, जो उसे बचपन में उसके अध्यापक ने दिया था, जिसमें लिखा था- “ आपका बेटा बौद्धिक तौर पर मंदबुद्धि है, इसलिए हम उसे स्कूल से निकाल रहे हैं | आप उसकी पढाई की व्यवस्था कहीं दूसरी जगह कर लीजिये | “

ये कोई काल्पनिक कहानी नहीं है, बल्कि सत्य घटना है | ये कहानी बल्ब (bulb) और ग्रामोफ़ोन का आविष्कार करने वाले महान आविष्कारक “ थॉमस अल्वा एडिसन ” की है, जो कि बचपन में Austim नामक एक मानसिक बीमारी से ग्रसित थे, लेकिन अपनी माँ के प्रोत्साहन और मेहनत से एक महान आविष्कारक बन गये | यदि उनकी माँ ने उस पत्र को वैसा ही पढ़कर सुना दिया होता, जैसा कि अध्यापक ने लिखा था, तो हम आज भी लालटेन या मोमबत्ती जलाकर ही जी रहे होते |

उस पत्र को पढ़कर एडिसन हैरान रह गये और घण्टों रोते रहे, और फिर उन्होंने अपनी डायरी में लिखा- “ एक महान माँ ने बौद्धिक तौर पर कमजोर बच्चे को सदी का महान आविष्कारक बना दिया | ”

प्रिय दोस्तों, सच्चा प्रोत्साहन मिलने पर कमजोर और मंदबुद्धि बच्चा भी अपने इरादे मजबूत करके, बड़ा काम कर सकता है | अपने बच्चों को प्रोत्साहित करने वाली माँ, अपने बच्चों की सच्ची साथी होती है | धन्यवाद|



जरुर पढ़ें :





सेठ करोड़ीमल धन-दौलत के पुजारी थे, धन-दौलत का उन्हें इतना मोह था कि वे दिन-रात धन-दौलत कमाने के चक्कर में लगे रहते थे | उनके जीवन का सिर्फ एक ही मकसद था, शहर का सबसे धनवान व्यक्ति बनना, इस चक्कर में ना उन्हें खाने का होश रहता था और ना ही कोई अनुशासित जीवनशैली थी |

अपनी चाहत के अनुसार, एक दिन वह शहर के सबसे धनी व्यक्ति बन गये | इस ख़ुशी में उन्होंने एक बड़ा महलनुमा घर बनवाया | गृहप्रवेश के दिन उन्होंने विशाल भोज रखा, भोज अच्छे से निपट गया, सारे मेहमान चले गये, तो आराम करने के लिए वे भी अपने कमरे में आ गये |

जैसे ही वे बिस्तर में लेटे, उन्हें एक आवाज सुनाई पड़ी- मैं तुम्हारी आत्मा हूँ, और अब मैं तुम्हारा शरीर छोड़कर जा रही हूँ |

सेठ करोड़ीमल घबराकर बोले- हे आत्मा ! यह तुम क्या करने जा रही हो ? तुम्हारे बिना मेरा शरीर निष्प्राण हो जायेगा | इतनी सुख-सुविधाओं से सुसज्जित यह महल जैसा घर मैंने तुम्हारे लिए ही तो बनवाया है, ताकि तुम मेरे शरीर के साथ यहाँ आराम से रह सको |

आत्मा बोली- यह मेरा घर नहीं है, मेरा घर तो तुम्हारा शरीर था, तुम्हारा स्वास्थ्य ही उसकी मजबूती थी | करोड़ों-अरबों रुपये कमाने के चक्कर में तुमने अपने शरीर की नींव हिला दी है, अब इस घर को ब्लड-प्रेशर, डायबिटीज, मोटापा, कमर-दर्द, हाइपरटेंशन जैसी बीमारियों ने घेर लिया है | तुम ना ठीक से चल पाते हो, ना खा पाते हो, और ना सो पाते हो ; ऐसे बेकार जर्जर शरीररूपी घर में अब मैं कैसे रह सकती हूँ, तुम ही बताओ ?

सेठ ने पश्चाताप करके कहा- मैं सब ठीक कर दूँगा, अच्छे से अच्छे डॉक्टरों को दिखाउँगा, पर तुम कहीं मत जाओ |

आत्मा ने धिक्कारा- अपनी जीवनशैली को अनुशासित करने के बजाय, हर छोटी-छोटी बात में हमेशा दवाइयाँ खाने से तुम्हारा शरीर खोखला हो गया है, अब कोई भी डॉक्टर तुम्हारे बेकार शरीर को ढहने से नहीं रोक पायेगा | इस बेकार शरीर में मेरी हालत फटीचर हो गयी है |

सेठ ने बहुत विनती करी, लेकिन आत्मा को रोकने का उनके शरीर में जरा भी सामर्थ्य नहीं था | एक गहरी साँस छोड़कर, आत्मा करोड़ीमल के शरीर से बाहर निकल गयी | सेठ करोड़ीमल का पार्थिव शरीर उस आलीशान हवेली में पड़ा रहा |

प्रिय दोस्तों, आपका अच्छा स्वास्थ्य, आपकी असली संपत्ति है | स्वस्थ शरीर नहीं, तो धन-दौलत का भी कोई मूल्य नहीं ; अच्छा स्वास्थ्य कमाना, धन-दौलत कमाने से अधिक कठिन काम है | धन्यवाद|



जरुर पढ़ें :





किसी राज्य के नये मुख्यमंत्री ने जिस दिन अपना पदभार ग्रहण किया, उसी दिन से राज्य की कानून व्यवस्था बिगड़ गयी | राज्य में चोरी, गुंडागर्दी, लूटपाट जैसी घटनाएँ बढ़ने लगी | जनता परेशान होने लगी, लेकिन मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के कान में जूँ तक नहीं रेंगी, वे लोग तो अपनी ही मौज में रहते थे | अधिकारी, कर्मचारी, सब जगह अराजकता का माहौल फैला हुआ था |

जब आम-जन की परेशानियाँ बढ़ने लगी, राज्य के कुछ विद्वान जन इस समस्या को लेकर पड़ोसी राज्य के प्रसिद्ध समाजसुधारक से मिलने गये और उनसे बोले- हमारे राज्य के मंत्री गैरजिम्मेदार बने हुए हैं, यदि ऐसा ही चलता रहा तो हमारे राज्य के लोगों का रहना मुश्किल हो जायेगा, फिर मजबूरन हमें अपनी जन्मभूमि छोड़कर दूसरे राज्य में पलायन करना होगा, कृपया हमारे मुख्यमंत्री को समझाएँ !

पड़ोसी राज्य के समाजसुधारक, उन लोगों के राज्य का हाल जानते थे, लिहाजा उन्होंने लोगों को आश्वस्त करते हुए कहा- आप लोग जाएँ, मैं जल्द ही कुछ उचित समाधान निकालूँगा |

कुछ दिन बाद वह समाजसुधारक, पड़ोसी राज्य के मुख्यमंत्री से मिलने आये | मुख्यमंत्री जी उन्हें जानते थे, उन्होंने समाजसुधारक का बड़े ही आदर-सत्कार से स्वागत किया |

बातों ही बातों में समाजसुधारक ने कहा- मैं आपसे एक प्रश्न पूछता हूँ ; यदि कुछ गुंडे-मवाली आपका अपहरण कर लें और आपके राज्य की कानून व्यवस्था आपको ढूँढने में असफल हो जाये, फिर वे अपहरणकर्ता आपको यातना दें, भूख-प्यास से आपके प्राण निकलने लगें, ऐसे में यदि वे लोग आपको अन्न-जल इस शर्त पर दें कि आप अपनी सारी संपत्ति उन्हें सौंप दोगे, तो आप क्या करोगे ?

मुख्यमंत्री ने सोचकर कहा- प्राण बचाने के लिए संपत्ति देनी पड़ेगी, संपत्ति फिर से कमाई जा सकती है |

यह सुनकर समाजसुधारक ने पुनः पूछा- अगर वे अपहरणकर्ता आपको यह कहकर आजाद कर दें कि आपको अपने राज्य से पलायन करना होगा और उनके मुखिया को राज्य का मुख्यमंत्री बनाना होगा, अन्यथा आपके प्राण ले लिए जायेंगे, तब आप क्या करोगे ?

मुख्यमंत्री ने असमंजस भाव से कहा- ऐसा करना बड़ा दुखद होगा, लेकिन प्राण बचाने के लिए पलायन करना ही बेहतर है | पर आप यह सब बेफिजूल के सवाल क्यों पूछ रहे हो ?

तब वह समाजसुधारक बोले- मंत्री जी, यह बेफिजूल के सवाल नहीं हैं | जब आप अपने प्राणों की रक्षा के लिए अपना सबकुछ लुटा सकते हो, तो जरा अपने राज्य की जनता के विषय में भी सोचिए, जो राज्य की बिगड़ी कानून व्यवस्था और बढ़ती अराजकता से पलायन पर मजबूर हो गयी है |

समाजसुधारक की बात सुनकर, मुख्यमंत्री जी को अपनी गलती का अहसास हुआ | उसी दिन से उन्होंने स्वयं और अपने मंत्रिमंडल की कार्यप्रणाली को व्यवस्थित किया, तथा राज्य की कानून व्यवस्था में सुधार किया, जिससे सब कुशल-मंगल होने लगा |

प्रिय दोस्तों, जितना ऊँचा पद, उतनी बड़ी जिम्मेदारी | उच्च पदों पर आसीन गणमान्य जन अगर अपने अधिकारों का उपयोग जनहित को ध्यान में रखकर, विवेकपूर्ण ढंग से करेंगे, तो वे समाज के आदर्श बन जायेंगे | धन्यवाद|



जरुर पढ़ें :





ध्रुवशिला नाम का एक व्यक्ति, स्वामी चेतनानन्द के पास आकर बोला- गुरुदेव, मुझे जीवन के सत्य का पूर्ण ज्ञान है, मैंने शास्त्रों का बहुत ध्यान से अध्ययन किया है, फिर भी मेरा मन किसी काम में नहीं लगता ; जब भी कोई काम करने के लिए बैठता हूँ, मन भटकने लगता है, तब मैं वह काम छोड़ देता हूँ, इस अस्थिरता का कारण क्या है ?

स्वामी जी ने उसे रात तक इंतजार करने के लिए कहा |

रात होने पर स्वामी जी, ध्रुवशिला को एक झील के पास ले गये और झील में दिखते चाँद के प्रतिबिम्ब को देखकर बोले- कुछ देख रहे हो ?

ध्रुवशिला ने कहा- हाँ जी, मैं चाँद का प्रतिबिम्ब देख रहा हूँ |

स्वामी जी ने पूछा- तुम्हें यह प्रतिबिम्ब कैसा दिख रहा है ?

ध्रुवशिला बोला- स्पष्ट और सुन्दर प्रतीत हो रहा है, मानो चाँद झील में उतर आया हो |

तभी स्वामी जी ने झील में पत्थर मारा, जिससे चाँद का प्रतिबिम्ब अस्पष्ट और झिलमिल हो गया, तब स्वामी जी ने फिर से पूछा- अब क्या वही स्पष्ट और सुन्दर चाँद दिख रहा है ?

ध्रुवशिला ने मुस्कराकर कहा- नहीं स्वामी जी, अब कहाँ से दिखेगा ! आपने तो झील को ही अशांत कर दिया है |

स्वामी जी ने समझाया- बेटा, तुम्हारा मन इस झील की तरह है, और तुम्हारा ज्ञान चाँद के प्रतिबिम्ब की तरह है | तुमने ज्ञान को ग्रहण कर लिया, शास्त्रों को पढ़ लिया, लेकिन उस ज्ञान का स्पष्ट और सुन्दर प्रतिबिम्ब तुम्हारे मन पर तभी पड़ेगा, जब तुम अपने मन को शांत रखोगे ; तब तुम्हारे ज्ञान की सुन्दरता तुम्हारे जीवन में निखार ला देगी, जैसे शांत झील में दिखने वाले सुन्दर चाँद का प्रतिबिम्ब |

तब से ध्रुवशिला जो भी काम करता, शांत मन और एकाग्रता से करता ; इस तरह उसने अपने जीवन को सफल बनाया |

प्रिय दोस्तों, हमारा ज्ञान हमारे जीवन को सफल और सुन्दर तभी बनाएगा, जब हम एकाग्र और संयमित मन से उसे धारण करेंगे | चंचल और अस्थिर मन से धारण किया गया ज्ञान, अस्पष्ट और व्यर्थ जाता है | धन्यवाद|



जरुर पढ़ें :





विक्रम एक सम्पन्न परिवार से था, उसके पास अच्छी नौकरी, अच्छा घर, और एक कुशल पत्नी थी ; दोनों पति-पत्नी अपने गृहस्थ जीवन से बहुत खुश थे | एक दिन किसी कारणवश विक्रम की नौकरी चली गयी, हालाँकि उसने दूसरी नौकरी कर ली, लेकिन दूसरी नौकरी इतनी अच्छी नहीं थी | तब से धीरे-धीरे उनके जीवन में समस्याएँ आने लगी, साल भर पहले जो पति-पत्नी प्यार भरा जीवन जी रहे थे, उन्हें अब एक-दूसरे में कमियाँ नजर आने लगी |

उनके दोस्तों ने उन्हें कई सलाह दी, लेकिन अब उनके रिश्ते में पहले जैसा प्यार ना था, वे हर समय अपनी समस्याओं में उलझे रहते और एक-दूसरे में कमियाँ ढूँढ़कर झगड़ते रहते |

एक दिन, विक्रम का एक पुराना दोस्त मिलने आया, जो कि मनोवैज्ञानिक डॉक्टर था | आपसी मेल-मिलाप के बाद, विक्रम और उसकी पत्नी, डॉक्टर दोस्त के साथ बातों में मशगूल हो गये |

डॉक्टर दोस्त बातों ही बातों में समझ गया कि विक्रम और उसकी पत्नी के आपसी रिश्ते मधुर नहीं हैं | तभी डॉक्टर दोस्त ने वहीं टेबल पर रखा पानी का गिलास उठाकर पूछा- क्या तुम दोनों बता सकते हो कि इस पानी के गिलास का वजन कितना होगा ?

इस सवाल पर, विक्रम और उसकी पत्नी अपने-अपने अनुमान के हिसाब से जवाब देने लगे | विक्रम ने गिलास का वजन पचास ग्राम बताया, तो उसकी पत्नी ने अस्सी ग्राम बताया |

दोनों के जवाब सुनने के बाद, डॉक्टर दोस्त बोला- खैर, इस गिलास का वजन जो भी होगा ; वह ज्यादा मायने नहीं रखता | मायने यह रखता है कि मैं इसे कितनी देर तक उठाये रखता हूँ, अगर मैं इसे पाँच मिनट तक उठाये रखूँ, तो मुझे ख़ास फर्क नहीं पड़ेगा | लेकिन मैं इसे लगातार एक घंटे तक उठाकर रखूँ, तो मेरा हाथ दुखने लगेगा, और अगर मैं इसे दिनभर उठाकर रखूँ, तो यक़ीनन मेरा हाथ सुन्न पड़ जायेगा, जिससे मुझे काफी तकलीफ होगी |

यह सुनकर विक्रम और उसकी पत्नी ने डॉक्टर दोस्त की बात पर सहमती जताई |

डॉक्टर दोस्त ने आगे कहा- इसी तरह हमारी समस्याएँ भी होती हैं, अगर मैं किसी समस्या के बारे में कुछ देर के लिए चिंता करूँ, तो इससे मेरे मन पर ज्यादा बोझ नहीं पड़ेगा ; पर यदि मैं उसी के बारे में लगातार सोचता रहूँ, दिन-रात उसको लेकर परेशान रहूँ, फिर यकीनन मेरा तनाव बढ़ जायेगा, तब समस्या छोटी हो या बड़ी, मैं हर समय परेशान रहूँगा, हो सकता है मैं अवसाद का शिकार हो जाऊं |

इसलिए बेहतर यही है कि पति-पत्नी अपने जीवन में आने वाली हर समस्या पर विचार-विमर्श करके उसका जल्द से जल्द उपाय ढूँढ लें और अपने मन का बोझ हल्का करके, अपना अमूल्य जीवन प्यार से जियें |

डॉक्टर दोस्त की बात का विक्रम और उसकी पत्नी पर बड़ा असर पड़ा | तब से हर छोटी-बड़ी समस्या पर वे दोनों आपस में सलाह-विचार करते, और इस तरह उनका जीवन फिर से खुशहाल हो गया |

प्रिय दोस्तों, हर किसी के दांपत्य जीवन में समस्याएँ आती हैं, पर इसका मतलब यह नहीं कि हम उन समस्याओं को अपने मन में बसा लें और तनाव करें, इससे आपके आपसी रिश्ते पर तो बुरा असर पड़ेगा, साथ ही साथ स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ सकता है | पति-पत्नी दोनों मिलकर आपसी समस्याओं का निदान करें और अपने अनमोल रिश्ते को ख़ुशी-ख़ुशी जियें | धन्यवाद|



जरुर पढ़ें :





मदन मोहन मालवीय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए जगह-जगह जाकर धन इकठ्ठा कर रहे थे | एक बार, वे किसी सेठ के यहाँ बड़ी उम्मीद से गये, सेठ की दानशीलता के विषय में उन्होंने बहुत सुना था |

सेठ ने मालवीय जी को आदर भाव से बिठाया |

शाम का समय था, सेठ ने अपने बेटे को घर में मोमबत्तियाँ जलाने को कहा |

सेठ का बेटा, एक मोमबत्ती जलाता, फिर दूसरी मोमबत्ती जलाने के लिए माचिस की दूसरी तीली निकालता, इस तरह उसने तीन अलग-अलग तीलियों से तीन मोमबत्तियाँ जलाई |

जब वह चौथी मोमबत्ती जलाने के लिए माचिस की चौथी तीली निकाल रहा था, सेठ ने उसके पास आकर उसे डांटा कि वह हर एक मोमबत्ती के लिए माचिस की नयी तीली क्यों खर्च कर रहा है ? जली हुई मोमबत्ती से सभी मोमबत्तियों को क्यों नहीं जलाता !

यह देखकर मालवीय जी को बड़ा अजीब लगा, उन्होंने मन ही मन सोचा- यह सेठ तो एक माचिस की तीली के खर्च होने पर ही इतना गुस्सा कर रहा है, फिर यह विश्वविद्यालय के लिए क्या दान देगा ?

कुछ देर बाद, सेठ ने मालवीय जी के पास आकर उनके आने का कारण पूछा | मालवीय जी ने संकोच करते हुए बताया कि वे विश्वविद्यालय की स्थापना के उद्देश्य से उनसे चंदा माँगने आये हैं |

यह सुनकर सेठ ने उनके इस काम की बड़ी सराहना करी, फिर उन्होंने मालवीय जी को पच्चीस हजार रुपये का चंदा दिया, और उस रात मालवीय जी को अपने यहाँ रुकने का भी आग्रह किया |

अगली सुबह मालवीय जी प्रस्थान करने लगे, तो उन्होंने सेठ से पूछा- सेठ जी, आप बड़े ही नेक और दानवीर हो । इतने सम्पन्न होने के बावजूद आपने अपने बेटे को कल शाम माचिस की एक छोटी सी तीली के लिए क्यों डांटा ? उस समय मुझे लगा कि आप बहुत कंजूस होंगे |

सेठ ने मुस्कराकर कहा- मालवीय जी, कंजूस वह है, जो पर्याप्त साधन होने के बावजूद अपनी जरूरतों में कटौती करे ; किफायती वह है, जो अपनी जरूरतों की पूर्ति लायक भरपूर खर्चा करे ; और फिजूलखर्ची वह है, जो बेजरूरत खर्चा करे | मेरा बेटा फिजूलखर्ची कर रहा था, उसके द्वारा बेजरूरत माचिस की तीली बर्बाद करना भी फिजूलखर्ची थी ; आप समाज की भलाई के लिए काम कर रहे हो, इसलिए आपको दिये गये धन का सही उपयोग होगा |

इस तरह एक सम्पन्न सेठ ने मालवीय जी को कंजूस, किफायती और फिजूलखर्ची की उत्कृष्ट परिभाषा दी |

प्रिय दोस्तों, सम्पन्नता का अर्थ यह नहीं कि फिजूलखर्ची की जाए | ना कंजूस बनिये, ना फिजूलखर्ची बनिये ; सिर्फ किफायती बनिये | अगर हम फिजूलखर्च से बचेंगे और फिजूलखर्च होने वाला धन किसी अच्छे काम में लगा देंगे, तो देश-समाज-परिवार उन्नति करेगा | धन्यवाद|



जरुर पढ़ें :





कहीं दूर जुलाहों का गाँव था, वे लोग कपास से कपड़ा तैयार करते ; फिर उसी गाँव के चन्द्रमणि नाम के एक बुजुर्ग सज्जन, तैयार कपड़े को बाजार ले जाते और उससे जो आमदनी होती, उसे अपने पूरे गाँव में बाँटते ; इससे गाँव के सभी लोगों का गुजारा चलता |

एक दिन बाजार में एक युवक चन्द्रमणि के पास आया, वह बाजार के किसी बड़े कपड़ा व्यापारी का बेटा था | चन्द्रमणि के गाँव द्वारा बनाये कपड़ों की ख्याति से वह चिढ़ता था, इसलिए वह चन्द्रमणि को नीचा दिखाने के मकसद से आया था |

उसने चन्द्रमणि के लाये कपड़ों में से एक साड़ी उठाई और उसका दाम पूछा |

चन्द्रमणि ने बड़ी सज्जनता से उसका दाम, दो सौ रुपये बताया |

उस युवक ने साड़ी के दो टुकड़े करके कहा- मुझे सिर्फ आधी साड़ी चाहिए, आधी साड़ी का दाम क्या है?

चन्द्रमणि ने शांत भाव से कहा- सौ रुपया |

युवक ने फिर से उसके दो टुकड़े करके, उसमें से आधे टुकड़े का दाम पूछा |

चन्द्रमणि ने उसी शांत भाव से कहा- पचास रुपया |

इस तरह वह युवक साड़ी के टुकड़े करता रहा और चन्द्रमणि भी उसी अनुपात में दाम कम करके उसे बताते रहे |

जब साड़ी के छोटे से टुकड़े का दाम सिर्फ पाँच रुपये रह गया, तब उस युवक ने अपनी दौलत का घमंड दिखाते हुए, दो सौ रुपये निकालकर कहा- ये रहा तुम्हारी साड़ी का दाम, मैं तुम्हें यह दिखाना चाहता था कि तुम्हारी कीमत हमारे सामने पाँच रुपये के बराबर है | लो, अब अपनी साड़ी का पूरा दाम पकड़ो, तुम भी क्या याद रखोगे कि किस धनवान से पाला पड़ा था |

चन्द्रमणि ने रुपये लेने से इनकार करते हुए कहा- बेटा, जब तुमने साड़ी खरीदी ही नहीं, तो मैं उसका दाम कैसे ले सकता हूँ !

युवक के बार-बार कहने पर भी जब चन्द्रमणि ने रुपये नहीं पकड़े, युवक को अपनी गलती का अहसास होने लगा, उसने चन्द्रमणि से आग्रहपूर्वक साड़ी के रुपये पकड़ने को कहा |

चन्द्रमणि ने कहा- बेटा, भले ही इन साड़ियों का दाम कम हो, लेकिन इनकी मेहनत की कीमत बहुत ज्यादा है | हमारे गाँव के किसान सालभर खेत में पसीना बहाकर कपास पैदा करते हैं, उनकी पत्नियाँ कपास को धुनने और कातने का काम करती हैं, फिर पूरा गाँव उस धागे से साड़ियाँ बनाता है | सोचो, तुमने कितने लोगों की मेहनत बर्बाद कर दी ! अगर तुम यह साड़ी ले जाते तो ख़ुशी होती, पर तुमने इसे बर्बाद किया ; यह बर्बादी क्या दो सौ रुपये से भर जायेगी ?

यह सुनकर युवक की आँखों में आँसू आ गये, उसने अपने व्यवहार के लिए चन्द्रमणि के पैरों में गिरकर माफ़ी माँगी और पूछा- आपने मुझे ऐसा करने से रोका क्यों नहीं ?

चन्द्रमणि ने कहा- अगर मैं तुम्हें पहले रोक देता, तो शायद तुम्हारे दिल से हमारे प्रति ईर्ष्या नहीं जाती और ना ही तुम हमारी साड़ियों पर लगी मेहनत को समझ पाते |

इस तरह एक सामान्य जुलाहे चन्द्रमणि ने उस घमंडी युवक को मेहनत की कद्र करना सिखाया |

प्रिय दोस्तों, दया और क्षमा भाव के साथ किसी व्यक्ति को शिक्षा दी जाए, तो वह उस बुरे व्यक्ति के व्यवहार को बदलकर उसे सन्मार्ग पर ले आती है | धन्यवाद|



जरुर पढ़ें :



MARI themes

Powered by Blogger.