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चन्द्रमणि का क्षमा भाव



कहीं दूर जुलाहों का गाँव था, वे लोग कपास से कपड़ा तैयार करते ; फिर उसी गाँव के चन्द्रमणि नाम के एक बुजुर्ग सज्जन, तैयार कपड़े को बाजार ले जाते और उससे जो आमदनी होती, उसे अपने पूरे गाँव में बाँटते ; इससे गाँव के सभी लोगों का गुजारा चलता |

एक दिन बाजार में एक युवक चन्द्रमणि के पास आया, वह बाजार के किसी बड़े कपड़ा व्यापारी का बेटा था | चन्द्रमणि के गाँव द्वारा बनाये कपड़ों की ख्याति से वह चिढ़ता था, इसलिए वह चन्द्रमणि को नीचा दिखाने के मकसद से आया था |

उसने चन्द्रमणि के लाये कपड़ों में से एक साड़ी उठाई और उसका दाम पूछा |

चन्द्रमणि ने बड़ी सज्जनता से उसका दाम, दो सौ रुपये बताया |

उस युवक ने साड़ी के दो टुकड़े करके कहा- मुझे सिर्फ आधी साड़ी चाहिए, आधी साड़ी का दाम क्या है?

चन्द्रमणि ने शांत भाव से कहा- सौ रुपया |

युवक ने फिर से उसके दो टुकड़े करके, उसमें से आधे टुकड़े का दाम पूछा |

चन्द्रमणि ने उसी शांत भाव से कहा- पचास रुपया |

इस तरह वह युवक साड़ी के टुकड़े करता रहा और चन्द्रमणि भी उसी अनुपात में दाम कम करके उसे बताते रहे |

जब साड़ी के छोटे से टुकड़े का दाम सिर्फ पाँच रुपये रह गया, तब उस युवक ने अपनी दौलत का घमंड दिखाते हुए, दो सौ रुपये निकालकर कहा- ये रहा तुम्हारी साड़ी का दाम, मैं तुम्हें यह दिखाना चाहता था कि तुम्हारी कीमत हमारे सामने पाँच रुपये के बराबर है | लो, अब अपनी साड़ी का पूरा दाम पकड़ो, तुम भी क्या याद रखोगे कि किस धनवान से पाला पड़ा था |

चन्द्रमणि ने रुपये लेने से इनकार करते हुए कहा- बेटा, जब तुमने साड़ी खरीदी ही नहीं, तो मैं उसका दाम कैसे ले सकता हूँ !

युवक के बार-बार कहने पर भी जब चन्द्रमणि ने रुपये नहीं पकड़े, युवक को अपनी गलती का अहसास होने लगा, उसने चन्द्रमणि से आग्रहपूर्वक साड़ी के रुपये पकड़ने को कहा |

चन्द्रमणि ने कहा- बेटा, भले ही इन साड़ियों का दाम कम हो, लेकिन इनकी मेहनत की कीमत बहुत ज्यादा है | हमारे गाँव के किसान सालभर खेत में पसीना बहाकर कपास पैदा करते हैं, उनकी पत्नियाँ कपास को धुनने और कातने का काम करती हैं, फिर पूरा गाँव उस धागे से साड़ियाँ बनाता है | सोचो, तुमने कितने लोगों की मेहनत बर्बाद कर दी ! अगर तुम यह साड़ी ले जाते तो ख़ुशी होती, पर तुमने इसे बर्बाद किया ; यह बर्बादी क्या दो सौ रुपये से भर जायेगी ?

यह सुनकर युवक की आँखों में आँसू आ गये, उसने अपने व्यवहार के लिए चन्द्रमणि के पैरों में गिरकर माफ़ी माँगी और पूछा- आपने मुझे ऐसा करने से रोका क्यों नहीं ?

चन्द्रमणि ने कहा- अगर मैं तुम्हें पहले रोक देता, तो शायद तुम्हारे दिल से हमारे प्रति ईर्ष्या नहीं जाती और ना ही तुम हमारी साड़ियों पर लगी मेहनत को समझ पाते |

इस तरह एक सामान्य जुलाहे चन्द्रमणि ने उस घमंडी युवक को मेहनत की कद्र करना सिखाया |

प्रिय दोस्तों, दया और क्षमा भाव के साथ किसी व्यक्ति को शिक्षा दी जाए, तो वह उस बुरे व्यक्ति के व्यवहार को बदलकर उसे सन्मार्ग पर ले आती है | धन्यवाद|



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