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झिलमिल चाँद



ध्रुवशिला नाम का एक व्यक्ति, स्वामी चेतनानन्द के पास आकर बोला- गुरुदेव, मुझे जीवन के सत्य का पूर्ण ज्ञान है, मैंने शास्त्रों का बहुत ध्यान से अध्ययन किया है, फिर भी मेरा मन किसी काम में नहीं लगता ; जब भी कोई काम करने के लिए बैठता हूँ, मन भटकने लगता है, तब मैं वह काम छोड़ देता हूँ, इस अस्थिरता का कारण क्या है ?

स्वामी जी ने उसे रात तक इंतजार करने के लिए कहा |

रात होने पर स्वामी जी, ध्रुवशिला को एक झील के पास ले गये और झील में दिखते चाँद के प्रतिबिम्ब को देखकर बोले- कुछ देख रहे हो ?

ध्रुवशिला ने कहा- हाँ जी, मैं चाँद का प्रतिबिम्ब देख रहा हूँ |

स्वामी जी ने पूछा- तुम्हें यह प्रतिबिम्ब कैसा दिख रहा है ?

ध्रुवशिला बोला- स्पष्ट और सुन्दर प्रतीत हो रहा है, मानो चाँद झील में उतर आया हो |

तभी स्वामी जी ने झील में पत्थर मारा, जिससे चाँद का प्रतिबिम्ब अस्पष्ट और झिलमिल हो गया, तब स्वामी जी ने फिर से पूछा- अब क्या वही स्पष्ट और सुन्दर चाँद दिख रहा है ?

ध्रुवशिला ने मुस्कराकर कहा- नहीं स्वामी जी, अब कहाँ से दिखेगा ! आपने तो झील को ही अशांत कर दिया है |

स्वामी जी ने समझाया- बेटा, तुम्हारा मन इस झील की तरह है, और तुम्हारा ज्ञान चाँद के प्रतिबिम्ब की तरह है | तुमने ज्ञान को ग्रहण कर लिया, शास्त्रों को पढ़ लिया, लेकिन उस ज्ञान का स्पष्ट और सुन्दर प्रतिबिम्ब तुम्हारे मन पर तभी पड़ेगा, जब तुम अपने मन को शांत रखोगे ; तब तुम्हारे ज्ञान की सुन्दरता तुम्हारे जीवन में निखार ला देगी, जैसे शांत झील में दिखने वाले सुन्दर चाँद का प्रतिबिम्ब |

तब से ध्रुवशिला जो भी काम करता, शांत मन और एकाग्रता से करता ; इस तरह उसने अपने जीवन को सफल बनाया |

प्रिय दोस्तों, हमारा ज्ञान हमारे जीवन को सफल और सुन्दर तभी बनाएगा, जब हम एकाग्र और संयमित मन से उसे धारण करेंगे | चंचल और अस्थिर मन से धारण किया गया ज्ञान, अस्पष्ट और व्यर्थ जाता है | धन्यवाद|



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