एक बार चिड़ियाघर के कर्मचारियों ने एक प्रयोग किया, उन्होंने एक शेर को एक बड़े से पिंजरे में डाला और साथ ही उस पिंजरे में एक हिरन को भी डाल दिया |

उम्मीद अनुसार, शेर ने तुरंत झपट्टा मारकर उस हिरन को खा दिया | इसके बाद चिड़ियाघर के कर्मचारियों ने पिंजरे के बीचों-बीच में काँच की एक मजबूत दीवार लगाई, जिससे उस पिंजरे के दो हिस्से हो गए | पहले हिस्से में शेर को रखा गया तथा दूसरे हिस्से में फिर से एक हिरन रखा गया |

जैसे ही शेर की नजर हिरन पर पड़ी, वह बड़ी फुर्ती से उसकी ओर झपटा, लेकिन इस बार वह काँच की मजबूत दीवार से टकराया और रुक गया, पर उसने हार नहीं मानी | वह थोड़ी-थोड़ी देर में बड़ी फुर्ती से हिरन की ओर लपकता, और काँच की दीवार से टकराता रहता |

दूसरी ओर, हिरन पहले तो बहुत डर गया, लेकिन जब बार-बार कोशिशों के बाद भी शेर उसकी तरफ नहीं आ पाया, तो वह हिरन भी आराम से रहने लगा |

चिड़ियाघर के कर्मचारी, शेर और हिरन को बाहर से खाना दिया करते थे ; पर शेर को तो ताजा हिरन खाने की इच्छा थी, इसलिए वह हिरन की ओर बार-बार लपकता और काँच की दीवार से टकराकर रुक जाता | दो दिन तक लगातार कोशिश करने के बाद शेर की हिम्मत जवाब देने लगी |

शेर की हिम्मत को कम होता देख, चिड़ियाघर के कर्मचारियों ने काँच की मजबूत दीवार को हटाकर उस जगह पर पतले काँच की दीवार लगा दी | शेर अब भी दिन में एक-दो बार हिरन की तरफ आने की कोशिश करता, लेकिन अब उसकी रफ़्तार धीमी और सुस्त होती थी ; काँच की पतली दीवार होने के बावजूद, वह उसे पार नहीं कर पाता था | चिड़ियाघर के कर्मचारी बाहर से जो खाना देते, वह उसे ही खाता था ; हिरन को मारकर खाने के लिए संघर्ष करने का ख्याल उसने त्याग दिया था |

धीरे-धीरे, शेर के हमले बंद हो गए | कुछ दिनों बाद, चिड़ियाघर के कर्मचारियों ने काँच की पतली दीवार हटाकर पतला सा पारदर्शी परदा लगा दिया | मगर शेर ने तो मानो इस ओर ध्यान देना ही छोड़ दिया था, उसने अब हिरन की तरफ आने की कोशिश भी नहीं करी |

कुछ दिनों बाद, कर्मचारियों ने यह परदा भी हटा दिया, लेकिन शेर अब पिंजरे के आधे हिस्से में ही घूमता रहता और हिरन की तरफ नहीं आता था |

चिड़ियाघर में जो भी आता, शेर और हिरन को एक ही पिंजरे में बंद देखकर रोमांचित हो उठता ; जब इस बारे में चिड़ियाघर के कर्मचारियों से पूछा जाता कि आखिर ऐसा कैसे हुआ ? तो चिड़ियाघर के कर्मचारी यही कहते- दरअसल शेर ने कोशिश करना छोड़ दिया है, जिस वजह से उसने हार मान ली है, जबकि शेर और हिरन के बीच अब कोई बाधा नहीं है |

इस तरह शेर और हिरन की जोड़ी उस चिड़ियाघर में लोगों के लिए बहुत दिनों तक रोमांचक बनी रही |

प्रिय दोस्तों, इसी तरह जो इंसान मुश्किलों से हारकर बैठ जाता है, सफलता उससे दूर हो जाती है | परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, लेकिन हार मानने वाला इंसान आसान परिस्थितियों को भी पार नहीं कर पाता ; इसलिए कोशिश करना कभी मत छोड़ो, सफलता जरूर मिलेगी | धन्यवाद|



भगवान बुद्ध एक गाँव में उपदेश दे रहे थे, सभी लोग शांति से उनके उपदेश सुन रहे थे, तभी वहाँ एक गुस्सैल शराबी व्यक्ति आया, जिसे बुद्ध की बातें बकवास लग रही थी |

वह शराबी कुछ देर तक सुनता रहा, फिर अचानक ही बोलने लगा- तुम ढोंगी-पाखंडी हो, बड़ी-बड़ी बातें करके लोगों को बेवकूफ बनाना ही तुम्हारा काम है, तुम्हारी बातों से मुझ पर कोई असर नहीं होने वाला, ऐसी बेतुकी बातों का मैं विरोध करता हूँ |

उसके मुँह से निकले कटु वचन सुनकर भी बुद्ध शांत रहे, बुद्ध को शांत देखकर उस शराबी व्यक्ति का क्रोध और अधिक बढ़ गया, वह बुद्ध को गालियाँ देते हुए वहाँ से चला गया |

अगले दिन जब उस व्यक्ति का क्रोध और नशा उतर गया, तो उसके जानने वालों ने उसे उसकी हरकतों के बारे में बताया ; जिसे सुनकर वह पछतावे की आग में जलने लगा और बुद्ध को ढूँढता हुआ उसी स्थान पर जा पहुँचा ; लेकिन बुद्ध तो अपने शिष्यों के साथ दूसरे गाँव की ओर निकल चुके थे |

उस व्यक्ति ने बुद्ध के बारे में लोगों से पूछा और जहाँ बुद्ध प्रवचन दे रहे थे, वहाँ पहुँच गया | बुद्ध को देखते ही वह उनके चरणों में गिर पड़ा और उनसे क्षमा माँगने लगा |

बुद्ध ने आश्चर्य भाव से पूछा- कौन हो भाई ? किस बात की क्षमा माँग रहे हो ? आखिर बात क्या है ?

उस व्यक्ति ने रोते हुए कहा- मैं वही हूँ जिसने शराब के नशे में कल आपसे बहुत बुरा व्यवहार किया था | मैं बहुत शर्मिंदा हूँ, मेरा जीवन अंधकारमय है, मैं पापी और बुरा हूँ |

बुद्ध ने पूछा- क्या तुम उस बुरे वक़्त को बदल सकते हो ?

उस व्यक्ति ने दुखी होकर कहा- नहीं, इसी बात का पछतावा है !

बुद्ध ने समझाया- जब तुम उस बुरे वक़्त को बदल नहीं सकते, फिर उसके लिए पछतावा क्यों कर रहे हो | बीता हुआ बुरा कल तो कल गुजर गया, तुम अभी पुरानी बुरी बातों में ही अटके हो ! तुम्हें अपनी गलती का अहसास हो गया, तुमने पश्चाताप कर लिया, अब तुम आज में प्रवेश करो और अपना जीवन नए तरीके से शुरुआत करो | अपनी बुराइयों को याद करते रहने के बजाय अपनी अच्छाइयों को निखारो |

इस तरह बुराइयों से भरे अतीत को पीछे छोड़कर, उस व्यक्ति ने अच्छे मार्ग को अपनाया |

प्रिय दोस्तों, बुरी बातें और बुरी घटनाऐं याद करते रहने से वर्तमान और भविष्य दोनों प्रभावित होते हैं | बीते हुए बुरे कल की वजह से आज को मत बिगाड़ो, आज में जियो, यही आगे बढ़ते रहने का उचित और सुगम तरीका है | धन्यवाद|



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किसी शहर में एक धनवान व्यक्ति रहता था, वह गरीबों से नफरत करता था, और अपनी धन-दौलत पर घमंड करता था | जब उसका बेटा विदेश से पढ़ाई पूरी करके वापस अपने देश लौटा, तब एक दिन वह अपने बेटे को अमीरी-गरीबी में अंतर दिखाने के लिए पास के एक गाँव में ले गया |

गाँव में पहुँचकर उसने अपने बेटे को पूरा गाँव घुमाया, इसके बाद जब वे घर लौटने लगे, तो रास्ते में पिता ने बेटे से पूछा- तुम्हें आज अमीरी-गरीबी में अंतर पता चल गया होगा, तुमने देखा कि गरीबों का जीवन कैसा होता है ?

यह सुनकर बेटा बोला- हाँ पापा, मैं समझ गया हूँ कि कौन गरीब है और कौन अमीर ! आपने मुझे यहाँ लाकर सच्चाई दिखा दी, वरना मैं तो अब तक अमीरी और गरीबी को अलग ही नजरिये से देखता था |

यह सुनकर पिता का सीना धन-दौलत के अभिमान से फूल गया, उसने सोचा कि उसका बेटा अपनी अमीरी को पहचान गया है, यही सोचकर उसने बेटे से फिर पूछा- अच्छा बताओ बेटा, तुम्हें अमीरी-गरीबी में क्या अंतर पता चला और तुम यहाँ आकर क्या समझे ?

इस पर बेटे ने जवाब दिया- मैंने यहाँ आकर देखा कि ये लोग हमसे ज्यादा खुश और संपन्न हैं | हमारे पास एक पालतू कुत्ता है, इनके पास कई सारे पालतू जानवर हैं | हमारे घर में छोटा सा गार्डन है, इनके पास तो विशाल खेत-खलियान हैं | हमारे पास एक स्वीमिंग पूल है, इनके पास पूरी नदी है | हमें अपना भोजन खरीदना पड़ता है, ये अपना अनाज खुद उगाते हैं ; हमें नरम-मुलायम गद्दे में भी नींद नहीं आती, पर इन्हें कठोर तख्त में भी गहरी नींद आती है | हम मोटापा घटाने के लिए जिम जाते हैं, ये प्राकृतिक रूप से चुस्त-दुरस्त हैं | हमारे ए.सी. की हवा में वो शीतलता नहीं, जो यहाँ की शुद्ध प्राकृतिक हवा में है | हमारे रिश्ते पैसे और फायदे से जुड़े रहते हैं, इनके रिश्ते दिल से जुड़े हैं | धन्यवाद पापा, मुझे यहाँ लाकर यह अहसास दिलाने के लिए कि अमीरी धन-दौलत से नहीं आती, ये तो बिना धन-दौलत के भी बहुत अमीर हैं |

बेटे की बात सुनकर पिता की अमीरी का घमंड चकनाचूर हो गया, उसे अपनी झूठी अमीरी के दिखावे पर बड़ी शर्मिंदगी हुई | उसे अहसास हो गया कि अमीर होने के मूल्य धन-दौलत पर निर्भर नहीं करते, वे उन छोटी-छोटी बातों पर निर्भर करते हैं जिन्हें धन-दौलत की चमक में नजरअंदाज कर दिया जाता है |

प्रिय दोस्तों, असली अमीर वह नहीं, जो धनवान है ; असली अमीर वह है, जिसके जीवन में खुशियाँ हैं, जो स्वस्थ है और जिसके पारिवारिक रिश्ते मधुर हैं | धन्यवाद|



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यह कोई डेढ़ हजार वर्ष पहले की घटना है | चीन के सम्राट को खरगोश बहुत पसंद थे, उन्होंने ऐलान किया कि जो चित्रकार, खरगोश का सबसे जीवंत चित्र बनाएगा, वह राज्य का भावी कलागुरु होगा और उसे पुरस्कार भी दिया जायेगा |

जगह-जगह से चित्रकार आए, उन्होंने अलग-अलग तरह से खरगोश के खूबसूरत चित्र बना रखे थे | सभी चित्रों को राज्यसभा में पेश किया गया ; सम्राट ने राज्य के सबसे वृद्ध चित्रकार को बुलाया, जो कि वर्तमान कलागुरु थे |

उस वृद्ध चित्रकार ने खुद को उन चित्रों के साथ एक बड़े भवन में बंद कर लिया, पूरा दिन चित्रों को जाँचने-परखने के बाद उसने कहा- एक भी चित्र जीवंत नहीं है !

सम्राट ने हैरानीपूर्वक पूछा- तुम ऐसा कैसे कह सकते हो ?

वृद्ध चित्रकार ने कहा- मैंने सभी चित्रों को बारी-बारी से असली खरगोशों के झुण्ड के सामने रखा, लेकिन उन खरगोशों ने उन चित्रों के खरगोश को पहचाना तक नहीं ; एक भी खरगोश उन चित्रों के समीप नहीं आया, इसलिए ये चित्र जीवंत नहीं हो सकते |

तब सम्राट ने उसे ही चित्र बनाने का आदेश दिया, उस वृद्ध चित्रकार ने दो वर्ष का समय माँगा |

छः महीने बाद, सम्राट ने कुछ लोगों को वृद्ध चित्रकार की खोज में भेजा | उन लोगों ने देखा कि वह वृद्ध चित्रकार जंगल में कुटिया बनाकर रह रहा है, उसने खरगोश पाल रखे हैं और दिनभर उसके आस-पास खरगोश मंडराते रहते हैं |

दो साल बाद, जब उस वृद्ध चित्रकार के बनाए चित्रों को असली खरगोशों के समीप रखा गया, तो सब खरगोश उन चित्रों के आस-पास मंडराने लगे, जैसे वे चित्र भी असली खरगोश हों |

राजा ने खरगोश के जीवंत चित्रों के पीछे का राज पूछा, तो वृद्ध चित्रकार ने कहा- खरगोश के जीवंत चित्र बनाने के लिए मुझे खरगोश बनना पड़ा, तभी मैं खरगोश के जीवंत चित्र बना पाया | मैंने खरगोश को भीतर से जाना कि वह क्या होता है ? उसकी आत्मा क्या है ? इसलिए मुझे उसके साथ रहना पड़ा | सम्राट, कोई भी काम तभी सफल होता है जब उसे अंतरात्मा से ग्रहण कर लिया जाए, यही इन जीवंत चित्रों की सफलता का राज है |

यह सुनकर राजा ने वृद्ध चित्रकार को खरगोश के जीवंत चित्रों के लिए सम्मानसहित ढेर सारा इनाम दिया |

प्रिय दोस्तों, किसी कर्म को करते हुए जब इंसान उसमें घुल-मिल जाता है, तब उसको अतुलनीय फल की प्राप्ति होती है | धन्यवाद|



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शैफाली और उसकी सास के बीच छोटी-छोटी बातों पर अक्सर झगड़ा होता रहता था | सास किसी ना किसी बहाने अपनी बहू शैफाली को खूब खरी-खोटी सुनाती रहती और यह सब सुन-सुनकर शैफाली भी सास को अपशब्द बोलती रहती थी |

उन दोनों के झगड़ों से उनके परिजन ही नहीं, आस-पास रहने वाले लोग भी परेशान रहते थे | सबने उन दोनों को बहुत समझाया, लेकिन उन पर कोई असर नहीं होता था |

एक दिन उन दोनों ने अखबार में किसी संत के बारे में पढ़ा, जो शहर में नए आये थे | उनकी ख्याति सुनकर, सास उनसे मिलने गयी और अपनी समस्या सुनाई- बाबा, मैं अपनी बहू से बड़ी परेशान हूँ, वह हमेशा मुझसे लड़ती रहती है | कुछ ऐसा उपाय बताओ, जिससे वह मुझसे लड़ना बंद कर दे |

संत ने सास को सौ मीठी गोलियाँ दी और कहा- जब भी तुम्हें बहू से कुछ कहना होगा, इनमें से एक मीठी गोली को अपने मुँह में डाल देना | ध्यान रहे, जब तक मीठी गोली मुँह में रहे, तब तक अपनी बात खत्म कर देना | इस तरह जब भी तुम्हें बहू से कुछ कहना हो, तब एक मीठी गोली मुँह में डाल देना |

उसी शाम, बहू भी चुपके से संत के पास आयी और अपनी समस्या सुनाई- बाबा, मेरी सास मुझे हमेशा बुरा-भला कहती रहती है | आप मुझे ऐसा उपाय बताओ, जिससे मेरी सास मुझे कुछ भी बुरा-भला ना कहे |

संत ने शैफाली को भी सौ मीठी गोलियाँ देकर कहा- जब भी तुम्हारी सास तुमको अपशब्द कहे, इनमें से एक मीठी गोली मुँह में डाल देना | ध्यान रहे, मीठी गोली तब तक रहनी चाहिए जब तक तुम्हारी सास अपनी बात खत्म नहीं करती |

अगले दिन, जब सास को बुरा-भला कहना था तो पहले उसने एक मीठी गोली अपने मुँह में डाली | मीठी गोली इतनी स्वादिष्ट थी कि सास का पूरा ध्यान गोली के स्वाद में चला गया और बुरा-भला कहने के बजाय उसने मधुरता से अपनी बात कह दी |

वहीं जैसे ही सास ने एक शब्द कहा, शैफाली ने भी मीठी गोली अपने मुँह में डाल दी | इससे उसका ध्यान भी मीठी गोली के स्वाद पर चला गया और उसने भी चुपचाप अपनी सास की बात सुन ली |

कुछ दिन तक ऐसे ही चलता रहा, सास मधुरता भरे लहजे में बातें कहती और शैफाली भी चुपचाप सुन लेती | घर का माहौल एकदम शांत हो गया, सब घरवाले चकित हो गए, किसी को भी अचानक परिवर्तन का कारण समझ नहीं आया |

कुछ दिन बाद, वे सौ मीठी गोलियाँ ख़त्म हो गयी | इसलिए सास संत जी से मिलने पहुँची और उसी समय संयोगवश शैफाली भी संत जी से मिलने पहुँच गयी |

संत ने दोनों को एक साथ देखकर हँसते हुए पूछा- क्या हुआ, मीठी गोलियाँ ख़त्म हो गयी ?

दोनों ने हाँ में सहमती जताई और एक साथ कहा- बाबा, वे जादुई मीठी गोलियाँ और दे दीजिये !

संत ने समझाया- जादू उन मीठी गोलियों का नहीं, तुम्हारी जुबान का है | मीठी गोलियों के स्वादिष्ट स्वाद की वजह से तुम दोनों की जुबान मधुर हो गयी थी, इसलिए सब जुबान की मधुरता का जादू है, ना कि मीठी गोलियों का !

यह बात सुनकर, शैफाली और उसकी सास बहुत लज्जित हुई | उन्होंने तुरंत ही एक-दूसरे को गले लगाकर भविष्य में कभी नहीं झगड़ने का फैसला किया |

प्रिय दोस्तों, कर्कश वाणी तो आपके घनिष्ठ रिश्तों में भी कड़वाहट घोल देती है, जबकि मीठी वाणी अमृत समान है, जो आपके शत्रु को भी मित्र बना देती है | हमेशा मीठी वाणी बोलने का प्रयत्न करना चाहिए | धन्यवाद|



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एक शाम गुलाब के एक पौधे में विद्रोह भड़क उठा | पौधे की पत्तियों ने कहा- सब लोग गुलाब के फूलों की तारीफें करते हैं, हमें कोई नहीं पूछता, जबकि हम भी उतने ही कीमती हैं जितने कि गुलाब के फूल ; हम अपना अपमान नहीं सह सकते |

यह सुनकर पौधे का तना बोला- देखो, हम सब एक परिवार हैं | गुलाब के फूल तभी खूबसूरत खिलते हैं, जब हम उन्हें समुचित भोजन प्रदान करते हैं, इसलिए तारीफ भले ही गुलाब के फूलों की हो, लेकिन तारीफ का श्रेय हम सबको जाता है |

विद्रोही पत्तियाँ नहीं मानी, उन्होंने कहा- नहीं, हमारी अलग से तारीफ होनी चाहिए, जब हम गुलाब के फूलों को पोषक तत्व देते हैं, तभी गुलाब के फूल सुन्दर तरीके से खिलते हैं | अब हम दिखाके रहेंगे कि हमारा क्या महत्व है !

विद्रोह बढ़ने लगा, यह देखकर गुलाब के फूलों ने समझाया- भले ही लोग हमारी तारीफें करें, लेकिन यह बात सब जानते हैं कि पत्तियों का भी उतना ही महत्व है जितना फूलों का है | कृपया आप शांत हो जाएं और अपना जीवन ख़ुशी-ख़ुशी जियें, आखिर हम एक परिवार हैं |

विद्रोही पत्तियों ने किसी की नहीं सुनी, सबने समझाया, पर उन्होंने भी ठान ली कि अब गुलाब के फूलों को सबक सिखा के रहेंगे | उन्होंने कहा- हम सब मुरझा जायेंगे | फिर देखते हैं, हमारे बिना कैसे ये फूल ज्यादा दिन तक जिंदा रहते हैं |

उस रात सारी पत्तियाँ मुरझा गयी |

सुबह माली आया, तो बड़ा आश्चर्यचकित हुआ, क्योंकि सारी पत्तियाँ मुरझाकर टूट चुकी थी, सिर्फ गुलाब के फूल और तना सही सलामत थे |

माली ने गुलाब के फूलों की जमकर तारीफें करी, फिर सूखी पत्तियों को उठाकर कूड़ेदान में डाल दिया ; कोई दया नहीं, कोई सहानुभूति नहीं ; बेचारी पत्तियाँ कूड़ेदान में मृत पड़ी थी | माली ने पौधे को खाद-पानी दिया और शाम तक एक नयी मुलायम पत्ती तने से उग आई |

यह देखकर, एक गुलाब के फूल ने तने से कहा- काश ! वे पत्तियाँ भी अपना जीवन ख़ुशी-ख़ुशी जी पाती, क्योंकि उनके जाने के बाद उनका महत्व शून्य हो गया है |

प्रिय दोस्तों, तैश में लिया गया फैसला नुकसानदायक होता है | यह दुनिया, जीवित और कामयाब जिंदगी जी रहे लोगों को ही महत्व देती है | इसलिए शान से ख़ुशी-ख़ुशी जियो ; परिस्थितियाँ कैसी भी हों, खुशियाँ ढूँढकर जियो | जो जीवित है, महत्व उसका है | धन्यवाद|



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राजा चन्द्रगुप्त के शासनकाल में वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता था, जिसमें दूर-दूर के राज्यों से कई विद्वान जन प्रतिभाग करते थे | एक बार वाद-विवाद प्रतियोगिता में एक विद्वान आये, जिनका नाम वीरबुद्धि था |

वाद-विवाद प्रतियोगिता शुरू हुई, लेकिन वीरबुद्धि से कोई नहीं जीत पाया ; जिस भी विषय में वाद-विवाद किया जाता, वीरबुद्धि उस विषय में ऐसे तर्क-वितर्क देते कि सामने वाला निशब्द हो जाता, इस तरह वीरबुद्धि वाद-विवाद प्रतियोगिता जीत गए |

फिर आने वाले प्रत्येक साल, वे वाद-विवाद प्रतियोगिता में अव्वल आते ; सभी लोग उनके ज्ञान की बहुत तारीफें किया करते, इससे वीरबुद्धि को अपने ज्ञान पर अभिमान हो गया और यह अभिमान उनके व्यवहार में साफ़ झलकने लगा | अपने ज्ञान के आगे वे किसी को कुछ नहीं समझते थे, क्योंकि कोई भी उनसे तर्क-वितर्क में नहीं जीत पाता था |

ऐसे ही एक साल, वाद-विवाद प्रतियोगिता में वीरबुद्धि अव्वल स्थान पर चल रहे थे, लेकिन इस बार प्रियलता नाम की एक विद्वान महिला भी वाद-विवाद प्रतियोगिता में वीरबुद्धि के समकक्ष आगे बढ़ रही थी |

जैसी संभावना थी, वैसा ही हुआ | वाद-विवाद प्रतियोगिता के अंतिम चरण में वीरबुद्धि और प्रियलता के मध्य विभिन्न विषयों में वाद-विवाद चलने लगा |

दोनों हर क्षेत्र में बराबरी से अपने-अपने तर्क दे रहे थे, एकाएक प्रियलता ने वीरबुद्धि से पूछा- आप पिछले कुछ सालों से वाद-विवाद प्रतियोगिता में अजेय रहे हो, अब मेरे एक प्रश्न का उत्तर दें | बताएं कि वह कौन सी चीज है जिसे जानने के बाद कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता, जिसे जानने के बाद अमरता प्राप्त हो जाती है और हर चाह मिट जाती है ?

इस पर वीरबुद्धि ने कहा- वो चीज है, अनंत ज्ञान | उसे जानने से इंसान अविनाशी बन जाता है, लेकिन कोई उसे जान नहीं सकता, क्योंकि उसे जानने वाला कोई नहीं है |

यह सुनकर प्रियलता ने कहा- आपका कहना ठीक है, लेकिन आपने कहा कि उसे जानने से इंसान अविनाशी बन जाता है और फिर आप कहते हो, कोई उसे जान नहीं सकता ; इन दो बातों में क्या समानता है ? लगता है आपने सिर्फ तर्क-वितर्क में ही प्रवीणता हासिल करी है, वास्तविक ज्ञान हासिल करने में रूचि नहीं दिखाई, आप तो अपनी ही बात में उलझ गए !

इस बात पर वीरबुद्धि को कोई जवाब नहीं सूझा, और यही बात निर्णायक बनी, जिसने प्रियलता को वाद-विवाद प्रतियोगिता में विजयी बनाया | उस दिन वीरबुद्धि को अहसास हुआ, जिस तर्क-वितर्क, वाद-विवाद में प्रवीणता हासिल करके वह अपने को महाज्ञानी समझ बैठे, आज उसी तर्क-वितर्क में खुद ही उलझ गए, जबकि वास्तविक ज्ञान इस वाद-विवाद से परे है |

प्रिय दोस्तों, वाद-विवाद और तर्क-वितर्क में दक्षता हासिल करने का अर्थ ज्ञान अर्जन नहीं है, वास्तविक ज्ञान तर्क-वितर्क और वाद-विवाद से बढ़कर होता है | धन्यवाद|



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अहान नाम का एक व्यक्ति फ़कीर रहमत के पास पहुँचा, और सिर झुकाकर बोला- सांसारिक बंधनों ने मुझे घेर रखा है, मैं सांसारिक बंधनों के दुःख से आजादी पाना चाहता हूँ, कृपया मुझे रास्ता बताओ |

फ़कीर रहमत ने कहा- बेटा, सांसारिक बंधनों ने तुम्हें नहीं घेरा है, बल्कि तुमने सांसारिक बंधनों को घेर रखा है |

वह व्यक्ति अनजान भाव से बोला- मैं कुछ समझा नहीं !

तभी उधर से एक किसान, अपने बैल को ज़बरदस्ती खींचता हुआ ले जा रहा था | यह देखकर, फ़कीर ने उस किसान की ओर इशारा करके पूछा- क्या तुम बता सकते हो, उस किसान और बैल में से कौन किससे बंधा है ?

अहान ने तपाक से जवाब दिया- साफ़ दिख रहा है, बैल उस किसान से बंधा है |

फ़कीर ने फिर पूछा- अच्छा, अब यह बताओ कि कौन किसका मालिक प्रतीत होता है ?

अहान को यह मामूली सा प्रश्न लगा, उसने मुस्कराते हुए कहा- मालिक तो वह किसान ही है, कोई पशु भला मनुष्य का मालिक कैसे हो सकता है !

थोड़ी देर बाद किसान और बैल, साथ-साथ भागते हुए नजर आने लगे | गौर से देखने पर पता चला, बैल रस्सी तोड़कर भाग रहा था |

यह देखकर फ़कीर ने फिर से पूछा- अब बताओ वह किसान क्या करेगा ?

अहान ने हँसते हुए कहा- सामान्य सी बात है, वह किसान उस बैल को पकड़ने के लिए और ज्यादा तेजी से भागेगा, ताकि उसे पकड़ सके |

अहान का जवाब सुनकर, फ़कीर ने समझाते हुए कहा- तुम्हारी हालत भी उस किसान जैसे है ; जब उसके हाथ में बैल की रस्सी थी, तुम्हे लगा कि बैल उससे बंधा है, बैल का मालिक वह है, लेकिन वास्तव में वह किसान बैल से बंधा है, बैल उसका मालिक है | तभी तो बैल के भागते ही वह उसके पीछे-पीछे भागने लगा | ऐसे ही इंसान अपने सांसारिक बंधनों से अनजान बना रहता है, यही उसके सांसारिक बंधनों के दुःख का कारण है |

इस तरह अहान को समझ आया- यदि अपने सांसारिक बंधनों के दुःख से आजादी चाहिए, तो पहले अपने सांसारिक बंधनों को समझना होगा |

प्रिय दोस्तों, सांसारिक बंधनों को समझना, सांसारिक बंधनों के दुःख को दूर करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है | धन्यवाद|



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