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वीरबुद्धि का वाद-विवाद



राजा चन्द्रगुप्त के शासनकाल में वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता था, जिसमें दूर-दूर के राज्यों से कई विद्वान जन प्रतिभाग करते थे | एक बार वाद-विवाद प्रतियोगिता में एक विद्वान आये, जिनका नाम वीरबुद्धि था |

वाद-विवाद प्रतियोगिता शुरू हुई, लेकिन वीरबुद्धि से कोई नहीं जीत पाया ; जिस भी विषय में वाद-विवाद किया जाता, वीरबुद्धि उस विषय में ऐसे तर्क-वितर्क देते कि सामने वाला निशब्द हो जाता, इस तरह वीरबुद्धि वाद-विवाद प्रतियोगिता जीत गए |

फिर आने वाले प्रत्येक साल, वे वाद-विवाद प्रतियोगिता में अव्वल आते ; सभी लोग उनके ज्ञान की बहुत तारीफें किया करते, इससे वीरबुद्धि को अपने ज्ञान पर अभिमान हो गया और यह अभिमान उनके व्यवहार में साफ़ झलकने लगा | अपने ज्ञान के आगे वे किसी को कुछ नहीं समझते थे, क्योंकि कोई भी उनसे तर्क-वितर्क में नहीं जीत पाता था |

ऐसे ही एक साल, वाद-विवाद प्रतियोगिता में वीरबुद्धि अव्वल स्थान पर चल रहे थे, लेकिन इस बार प्रियलता नाम की एक विद्वान महिला भी वाद-विवाद प्रतियोगिता में वीरबुद्धि के समकक्ष आगे बढ़ रही थी |

जैसी संभावना थी, वैसा ही हुआ | वाद-विवाद प्रतियोगिता के अंतिम चरण में वीरबुद्धि और प्रियलता के मध्य विभिन्न विषयों में वाद-विवाद चलने लगा |

दोनों हर क्षेत्र में बराबरी से अपने-अपने तर्क दे रहे थे, एकाएक प्रियलता ने वीरबुद्धि से पूछा- आप पिछले कुछ सालों से वाद-विवाद प्रतियोगिता में अजेय रहे हो, अब मेरे एक प्रश्न का उत्तर दें | बताएं कि वह कौन सी चीज है जिसे जानने के बाद कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता, जिसे जानने के बाद अमरता प्राप्त हो जाती है और हर चाह मिट जाती है ?

इस पर वीरबुद्धि ने कहा- वो चीज है, अनंत ज्ञान | उसे जानने से इंसान अविनाशी बन जाता है, लेकिन कोई उसे जान नहीं सकता, क्योंकि उसे जानने वाला कोई नहीं है |

यह सुनकर प्रियलता ने कहा- आपका कहना ठीक है, लेकिन आपने कहा कि उसे जानने से इंसान अविनाशी बन जाता है और फिर आप कहते हो, कोई उसे जान नहीं सकता ; इन दो बातों में क्या समानता है ? लगता है आपने सिर्फ तर्क-वितर्क में ही प्रवीणता हासिल करी है, वास्तविक ज्ञान हासिल करने में रूचि नहीं दिखाई, आप तो अपनी ही बात में उलझ गए !

इस बात पर वीरबुद्धि को कोई जवाब नहीं सूझा, और यही बात निर्णायक बनी, जिसने प्रियलता को वाद-विवाद प्रतियोगिता में विजयी बनाया | उस दिन वीरबुद्धि को अहसास हुआ, जिस तर्क-वितर्क, वाद-विवाद में प्रवीणता हासिल करके वह अपने को महाज्ञानी समझ बैठे, आज उसी तर्क-वितर्क में खुद ही उलझ गए, जबकि वास्तविक ज्ञान इस वाद-विवाद से परे है |

प्रिय दोस्तों, वाद-विवाद और तर्क-वितर्क में दक्षता हासिल करने का अर्थ ज्ञान अर्जन नहीं है, वास्तविक ज्ञान तर्क-वितर्क और वाद-विवाद से बढ़कर होता है | धन्यवाद|



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