प्रसिद्ध बहुशास्त्र ज्ञानी लियोनार्डो डा विन्ची को अपना कामकाज देखने के लिए एक युवक की जरुरत थी, इस विषय में उन्होंने अपने कुछ मित्रों से कहा |

कुछ दिन बाद, एक मित्र ने दो युवकों को लियोनार्डो के पास भेजा | पहला युवक बहुत पढ़ा-लिखा था, उसके पास कई उच्च स्तरीय सर्टिफिकेट और डिग्रियाँ थी जबकि दूसरा युवक सामान्य पढ़ा-लिखा था |

जब दोनों युवक लियोनार्डो से मिले, तो कई सारी डिग्रियाँ होने के बावजूद लियोनार्डो ने पहले युवक को नौकरी पर नहीं रखा, बल्कि दूसरा युवक जिसके पास कोई ख़ास बड़ी डिग्री नहीं थी, उसे नौकरी पर रख लिया |

जब लियोनार्डो के मित्र को यह बात पता चली, तो उसने लियोनार्डो से पूछा- क्या मैं जान सकता हूँ कि तुमने एक सामान्य डिग्रीधारी युवक को नौकरी पर क्यों रखा जबकि मैंने एक उच्च स्तरीय डिग्रीधारी युवक को भी तुम्हारे पास भेजा था ?

लियोनार्डो ने बताया- मित्र, जिस युवक का मैंने चयन किया है, उसके पास पहले डिग्रीधारी युवक से ज्यादा बड़ी डिग्रियाँ हैं |

मित्र ने असमंजस भाव से पूछा- लेकिन मैंने तो उसके पास सामान्य डिग्रियाँ ही देखी थी !

लियोनार्डो ने समझाया- मित्र, चयनित युवक ने मेरे कमरे में आने से पूर्व मुझसे अनुमति मांगी | अंदर आने के बाद, वह तब तक शांति से खड़ा रहा जब तक कि मैंने उसे बैठने को नहीं कहा | मैंने उससे जो भी सवाल पूछे उसने बिना घुमाए-फिराए उनके संक्षिप्त जवाब दिए और बातचीत खत्म होने के बाद, मेरी इजाजत लेकर नम्रतापूर्वक चला गया | उसने कोई खुशामद नहीं करी, न ही किसी की सिफारिश लेकर आया था, ज्यादा पढ़ा-लिखा न होने के बावजूद उसे स्वयं की योग्यता और ईमानदारी पर पूर्ण विश्वास था, ऐसी कीमती डिग्रियाँ बहुत कम लोगों के पास होती हैं | उधर पहले युवक के पास इनमें से कोई भी विशेषता नहीं थी, वह सीधा कमरे में चला आया, बिना आज्ञा कुर्सी पर बैठ गया और अपनी योग्यता के विषय में बात करने के बजाय तुमसे अपनी जान-पहचान के बारे में बताने लगा, अब तुम ही बताओ कि उसकी उच्च डिग्रियों की क्या कीमत है ?

मित्र के पास कोई जवाब नहीं था, उसे लियोनार्डो की बात अच्छे से समझ आ गयी थी |

प्रिय दोस्तों, अच्छा व्यवहार और आचरण से सम्पन्न व्यक्ति सबसे बड़ा डिग्रीधारी होता है, क्योंकि अच्छा आचरण और मेहनती बनना किसी उच्च डिग्री हासिल करने से कम नहीं है | धन्यवाद|



   
चीन के पश्चिमी जंगलों में जंगली मुर्गे-मुर्गियों का एक झुण्ड रहता था, उनमें से एक मुर्गा हमेशा अपनी सुंदरता की वजह से उदास रहता था | वह मुर्गा जब दूसरे पंछियों को देखता, उसे अपने मटमैले-काले रंग पर बहुत शर्म महसूस होती |

उसी जंगल में सुनहरे तीतरों का एक झुण्ड भी रहता था | जब वह मुर्गा, सुनहरे तीतरों के झुण्ड को देखता तो वह उनके आकर्षक और खूबसूरत सुनहरे रंग को देखकर बेहद प्रभावित हो जाता, फिर मन ही मन सोचने लगता- हे भगवान, तुमने इन्हें इतना सुंदर रंग-रूप दिया है | काश ! तू मुझे भी ऐसा ही सुंदर रंग-रूप देता तो कितना अच्छा होता |

एक दिन उस मुर्गे ने जंगल में बहुत से सुनहरे पंख बिखरे हुए देखे, जो सुनहरे तीतरों के खेलने-कूदने की वजह से गिर गए थे |

यह देखकर वह मुर्गा बेहद खुश हो गया और मन ही मन सोचने लगा- इन सुंदर सुनहरे पंखों को लगाकर मैं भी सुंदर रंग-रूप का मालिक बन जाऊँगा |

यह ख्याल मन में आते ही उसने सुनहरे तीतरों के बिखरे पंख उठाये और उन्हें अपनी पूँछ के आस-पास सजा दिया | इसके बाद मुर्गा इतराते हुए जंगल में घूमने लगा |

जंगल में जो भी पंछी उसे देखता, वह मन ही मन उस पर खूब हँसता |

उस मुर्गे को उसके झुण्ड और परिवार के अन्य मुर्गे-मुर्गियों ने बहुत समझाया कि सुंदर दिखने का ऐसा झूठा नाटक करना छोड़ दे और अपने वास्तविक रंग-रूप से ही प्यार करे |

परन्तु उस मुर्गे पर उनकी बातों का कोई असर नहीं हुआ, उसे लगा कि वे सब उसका सुंदर रंग-रूप देखकर ईर्ष्या कर रहे हैं, इसलिए फालतू की नसीहत दे रहे हैं |

कुछ देर बाद, वह मुर्गा जंगल में घूमते-घूमते सुनहरे तीतरों के झुण्ड के पास पहुँचा और मन ही मन सोचने लगा कि सुनहरे तीतर उसके सुंदर रंग-रूप की तारीफें करेंगे |

पर उसे देखते ही सुनहरे तीतरों ने जोर का ठहाका लगाया |

एक सुनहरे तीतर ने उपहास उड़ाते हुए कहा- देखो इस बेवकूफ मुर्गे को ! यह हमारे गिरे हुए पंखों को लगाकर हमारी नक़ल कर रहा है | आओ, इस नकलची मुर्गे को अपनी चोंचों और पंजों से सबक सिखाते हैं |

यह सुनते ही सभी तीतर मुर्गे पर टूट पड़े और मार-मारकर उसे अधमरा कर दिया |

मुर्गा भागा-भागा अपने झुण्ड के पास पहुँचा और सुनहरे तीतरों की शिकायत करने लगा- बचाओ, सुनहरे तीतरों ने बेवजह मुझ पर हमला कर दिया है |

इस बात पर एक बुजुर्ग मुर्गे ने समझाया- बेटा, गलती उनकी नहीं, गलती तुम्हारी है | हमने तुम्हें पहले ही समझाया था कि दिखावटी रंग-रूप के चक्कर में मत पड़ो, तुम जैसे हो उसी में सुंदर दिखते हो, लेकिन तुम नहीं माने | तुमने सुनहरे तीतरों के पंख लगाकर उनकी नक़ल उतारने के साथ स्वयं के रंग-रूप का भी अपमान किया है | जो जीव दूसरी प्रजाति के जीवों के रंग-रूप की नक़ल करने में लगा रहता है, वह सिर्फ अपमान ही पाता है |

उस अधमरे मुर्गे को अपनी गलती का अहसास हो चुका था, उसने उसी समय से बाहरी दिखावटी रंग-रूप की सुंदरता का मोह त्याग दिया |

प्रिय दोस्तों, ईश्वर ने हमें जिस रंग-रूप में बनाया है, उसी में संतुष्ट रहकर अपने कर्मों पर ध्यान देना चाहिए ; कर्मों की सुंदरता, रंग-रूप की सुंदरता से अधिक श्रेष्ठ होती है | धन्यवाद |





रमेश एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता था, अभी हाल ही में रमेश का तबादला लखनऊ से दिल्ली हो गया था, वह अपने परिवार सहित दिल्ली के एक मोहल्ले में किराये के मकान में शिफ्ट हो गया |

दिल्ली में शिफ्ट होने की अगली सुबह रमेश और उसके परिवार के सदस्यों ने देखा कि बगल पड़ोसी शर्मा जी के यहाँ से जोर-जोर से चिल्लाने और लड़ने-झगड़ने की आवाजें आ रही थी |

किसी अनहोनी की आशंका से रमेश ने बाहर आकर एक अन्य पड़ोसी गुप्ता जी से लड़ाई-झगड़े का कारण पूछा, तो गुप्ता जी ने अनजान भाव से कहा- रमेश जी, ये रोज की कहानी है, इस ओर ध्यान मत दीजिए |

उस सुबह तो रमेश ने सामान्य पारिवारिक तनाव समझकर अपने कानों में परदा डाल दिया, लेकिन जब अगले दो दिन तक शर्मा जी के घर से सुबह-शाम लड़ने-झगड़ने और जोर-जोर से चिल्लाने की आवाजें आती रही, तो रमेश को यह सब देख-सुनकर अच्छा नहीं लगता था |

रमेश का पारिवारिक माहौल शांत और आनंदमय था, लेकिन पड़ोस में होने वाला सुबह-शाम का लड़ाई-झगड़ा भी तो सुना नहीं जाता था |

पड़ोस का अशांत माहौल, रमेश के दोनों बेटों के लिए भी एकदम नया था ; इसलिए तीसरे दिन जब रमेश ऑफिस से घर आया तो उसके छोटे बेटे ने पूछा- पापा, हमारे पड़ोसी इतना लड़ते-झगड़ते क्यों हैं ?

बड़े बेटे ने समझदारी दिखाते हुए कहा- क्योंकि क्रोध में इंसान मानसिक शांति खो देता है, इसलिए ये लोग लड़ते-झगड़ते-चिल्लाते हैं |

छोटे बेटे ने तपाक से पूछा- जब ये लोग एक ही घर में रहते हैं, फिर ये अपनी बातें धीमी आवाज में भी कर सकते हैं, इन्हें इतना चिल्लाने की क्या जरुरत है ?

इस सवाल पर रमेश ने दोनों बेटों को पास बुलाकर समझाया- जब दो व्यक्ति एक-दूसरे से नाराज होते हैं, तो वे एक-दूसरे पर गुस्सा करते हैं जिससे उनके दिलों के बीच दूरी बढ़ने लगती है, इस अवस्था में एक-दूसरे को बिना चिल्लाये नहीं सुना जा सकता है ; वे जितना ज्यादा गुस्सा करेंगे उनके दिलों के बीच की दूरी उतनी ज्यादा बढ़ जाएगी और उन्हें उतना ही ज्यादा चिल्लाना पड़ेगा, गुस्सा करने पर वे एक-दूसरे की भावनाओं को नहीं समझ पाते हैं और फिर एक-दूसरे से लड़ते-झगड़ते हैं | लेकिन यदि वे गुस्सा नहीं करते, एक-दूसरे के साथ प्रेम से रहते हैं, तब उन्हें एक-दूसरे पर चिल्लाना नहीं पड़ता, बल्कि वे आपस में धीरे-धीरे बातें करते हैं, क्योंकि उनके दिल एक-दूसरे के करीब होते हैं, वे एक–दूसरे की भावनाओं को समझते हैं और लड़ते-झगड़ते नहीं हैं | और जब वे एक-दूसरे से बेहद प्रेम करते हैं, तब वे बोलते भी नहीं हैं, बिना कहे नजरों ही नजरों में एक-दूसरे की भावनायें समझ जाते हैं | इसलिए अपने परिवार वालों और मित्रों के साथ हमेशा इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि तुम्हारे दिल हमेशा एक-दूसरे के करीब बने रहें ; ऐसा व्यवहार और कर्म मत करो जिससे तुम्हारे दिलों की बीच की दूरी बढ़ जाए, नहीं तो एक समय ऐसा आता है जब दिलों के बीच की दूरी इतनी अधिक बढ़ जाती है कि चिल्लाने पर भी दूसरे को तुम्हारी बातें और भावनायें समझ नहीं आती |

इस तरह रमेश ने अपने दोनों बेटों को जीवन की नेक सीख के साथ हमेशा प्रेम से रहने का संदेश दिया | कुछ दिन बाद, रमेश अपने परिवार सहित शहर की किसी दूसरी शांत जगह में शिफ्ट हो गया |

प्रिय दोस्तों, हमेशा ऐसे व्यवहार और कर्मों से बचना चाहिए जिससे एक-दूसरे के प्रति नाराजगी और क्रोध पैदा हो जाए, क्योंकि क्रोध रिश्तों में दरार पैदा करता है ; क्रोध जितना बढ़ता रहेगा, रिश्तों की दरार खाई में बदलती रहेगी | धन्यवाद|


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