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अकबर-बीरबल और तीन मूर्तियाँ



एक बार एक प्रसिद्ध मूर्तिकार राजा अकबर से मिलने आया | मूर्तिकार ने राजा को तीन मूर्तियाँ देकर कहा- महाराज, ये तीन मूर्तियाँ मेरी बनाई सभी मूर्तियों में सर्वश्रेष्ठ हैं | आप इन्हें स्वीकार करें और सँभाल कर रखें |

राजा अकबर, साहित्य और कलाप्रेमी थे | उन्हें मूर्तिकार की बनाई मूर्तियाँ बेहद पसंद आयी, उन्होंने तीनों मूर्तियों को स्वीकार किया और मूर्तिकार को सौ सोने की मुहरें देकर विदा किया |

राजा अकबर ने तीनों मूर्तियों की देखभाल और सफाई के लिए एक कर्मचारी लगा दिया, जो हर रोज़ तीनों मूर्तियों पर लगी धूल साफ करता था |

एक दिन सफाई करते हुए, कर्मचारी से एक मूर्ति जमीन पर गिरकर टूट गयी |

जब यह बात राजा को पता चली, तो कर्मचारी को बंदी बना लिया गया | क्योंकि मूर्ति राजा को अत्यंत प्रिय थी, इसलिए कर्मचारी की इस गलती के लिए उसके दोनों हाथ काटने की सजा सुनाई गयी |

हाथ कटने से पहले कर्मचारी ने राजा से विनती करी कि वह आखिरी बार बाकी बची दोनों मूर्तियों को अपने हाथों से छूना चाहता है |

कर्मचारी की विनती स्वीकार कर ली गयी | कर्मचारी जैसे ही मूर्तियों के समीप आया, उसने बाकी बची दोनों मूर्तियों को जमीन पर पटककर तोड़ दिया |

राजा को यह देखकर बहुत ज्यादा गुस्सा आया, उन्होंने कर्मचारी के इस कृत्य के लिए उसे म्रत्युदंड की सजा सुनाई |

राजा अकबर के ख़ास मन्त्री बीरबल को जब यह पूरा वाकया पता चला, तो वे तुरंत कर्मचारी के पास आये और उससे पूछा- तुमने जानबूझकर बाकी बची दो मूर्तियाँ क्यों तोड़ी ?

कर्मचारी ने शालीनतापूर्वक जवाब दिया- हे अमात्य ! मूर्तियाँ चीनी मिट्टी की बनी हुई थी, आज नहीं तो कल, किसी न किसी के हाथ से बाकी बची दो मूर्तियों ने भी अवश्य टूटना था | भविष्य में अनजाने से मूर्ति टूटने पर किसी अन्य व्यक्ति को सजा न मिले, इसलिए मैंने बाकी बची दोनों मूर्तियों को स्वयं तोड़कर सारा दोष अपने ऊपर ले लिया |

बीरबल, कर्मचारी की भावनायें समझ गए थे कि उसने जानबूझकर मूर्ति नहीं तोड़ी थी | बीरबल ने कर्मचारी को बचाने के लिए एक युक्ति निकाली, वे एक बड़े से पात्र में चीनी मिट्टी लेकर राजा के समीप आकर बोले- महाराज, यह चीनी मिट्टी बहुत कीमती है, इसे मैंने बड़े जतन से हासिल किया है, कृपया आप इसे स्वीकार करें |

राजा अकबर ने मजाकिया लहजे में कहा- बीरबल, इस चीनी मिट्टी में ऐसा क्या ख़ास है, जो यह कीमती हो गयी ?

बीरबल ने जवाब दिया- महाराज, इसमें ऐसा तो कुछ भी ख़ास नहीं है, बस मुझे लगता है कि यह चीनी मिट्टी कीमती है |

राजा ने डाँटकर कहा- बीरबल, तुम ऐसी बेवकूफों जैसी हरकत कैसे कर सकते हो ! चीनी मिट्टी से ज्यादा कीमती, चीनी मिट्टी से बने बर्तन और मूर्तियाँ होती हैं |

बीरबल ने समझाते हुए कहा- महाराज, मैं भी तो आपको यही समझाना चाहता हूँ कि जिस प्रकार चीनी मिट्टी से अधिक मूल्यवान चीनी मिट्टी से बनी मूर्तियाँ हैं, उसी प्रकार कर्मचारी के किये कार्यों से अधिक महत्वपूर्ण उन कार्यों के पीछे की मंशा है | पहली बार कर्मचारी से मूर्ति अनजाने में टूट गयी थी, लेकिन दूसरी बार कर्मचारी ने बाकी बची दो मूर्तियाँ इसलिए तोड़ी क्योंकि उसके ह्रदय में जनहितैषी की भावना थी ; भविष्य में चीनी मिट्टी की नाजुक मूर्तियाँ टूटने पर कोई अन्य दंड का भागी न बनें इसलिए उसने स्वयं ही मूर्तियाँ तोड़ दी | ऐसे व्यक्ति को दंड देने का क्या अर्थ जो दूसरों की भलाई के विषय में सोचता है !

राजा अकबर को अपनी भूल का एहसास हुआ, उन्होंने दूसरों की भलाई के विषय में सोचने वाले उस कर्मचारी को तुरंत बंधन मुक्त कर दिया, साथ ही साथ बीरबल के तार्किक सुझाव के लिए बीरबल का धन्यवाद दिया |

प्रिय दोस्तों, जो व्यक्ति दूसरों की भलाई के विषय में सोचकर कार्य करते हैं, उनके कष्ट दूर करने के लिए भगवान कोई न कोई मदद अवश्य भेजते हैं | अतः दूसरों की भलाई के लिए कर्म करने से पीछे न हटें | धन्यवाद|